आध्यात्ममंदसौर जिलासीतामऊ
शिवमहापुराण कथा के तीसरे दिन डॉ नागर जी ने कथा के माध्यम से मंदिर जाने और पूजा अर्चना करने आदि कि समझाइश दी

सोशल मीडिया पर ज्योतिर्लिंग को लेकर भ्रम फैलाने पर व्यास पीठ से चेतावनी देते हुए डा मिथिलेश जी नागर ने कहा कि ज्योर्तिमय खंभ है न कि लिंग

सीतामऊ।ब्रह्मा विष्णु के बीच एक दुसरे को बड़ा बताने कि होड़ लग गई। और झगड़ा होने लगा। लड़ाई इतनी बढ़ी कि शस्त्र चलने लगें दोनों और से शस्त्र इतने भयानक चलें कि संसार का विनाश हो जाता उसको रोकने के लिए ज्योति खंभ प्रगट हुआ जिसमें दोनों तरफ के शस्त्र समाहित हो गये दोनों देवता ने देखा कि इतना विशाल खंभ दोनों छोर ढुंढने लगे ब्रह्मा जी आकाश और विष्णु पाताल कि और छोर देखने नहीं मिला तो केतकी पुष्प को गवाह बनाकर पृथ्वी पर पहुंचे ब्रह्मा जी और विष्णु जी दोनों मिले दोनों में विष्णु जी ने सत्य कहा तो ब्रह्मा जी ने झूठ बोला और कहा कि मैंने छोर देख लिया ये कैतकी फुल गवाह है। अग्नि मय प्रकाश खंभ निराकार रूप से शंकर प्रकट हुए और ब्रह्मा जी के झुठ बोलने वाले मुख को हटा दिया। और पूजा नहीं होने का श्राप दिया।जब से ब्रह्मा जी कि पूजा नहीं होती है। उक्त ज्ञानामृत छोटी काशी सीतामऊ के रामेश्वरम धाम प्रांगण में आयोजित शिवपुराण कथा के तृतीय दिवस कि कथा श्रवण कराते हुए डॉ मिथिलेश जी नागर ने कही।डॉ नागर जी ने आगे कहा कि तारक लिंग के नाम से उस लिंग कि स्थापना हुई।शिव लिंग नहीं है शंकर का निराकार रूप ज्योर्तिमय रुप कि पूजा हो रही है।ज्योति’ का अर्थ प्रकाश और ‘लिंग’ का अर्थ प्रतीक है।
सोशल मीडिया पर भगवान शंकर और ज्योर्तिलिंग को लेकर भ्रम फैला कर सनातन धर्म को बदनाम करने कि कोशिश करने वाले को कथा व्यास पीठ से डॉ नागर जी ने जबाव में कथा वृतांत श्रवण कराते हुए कहा कि ग्रंथों और श्लोकों के अनुसार, भगवान शिव के इस त्रिविध स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है—”आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। भूलोके च महाकालो लिंगत्रयं नमोस्तु ते”। इसके अनुसार आकाश में देवताओं द्वारा पूजित तारक लिंग, पाताल में नागों और देवताओं द्वारा पूजित हाटकेश्वर लिंग और पृथ्वी (मृत्युलोक) पर ऋषियों और मनुष्यों द्वारा पूजित महाकाल का स्वरूप उस दिव्य खंभ लिंग अर्थात खंब निराकार रुप में विराजमान है।
डॉ नागर जी ने शिवरात्रि का महत्व बताते हुए कहा कि संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव एक अंतहीन ज्योंतिर्लिंग (प्रकाश के स्तंभ) के रूप में प्रकट हुए। वह दिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत ज्योति स्तंभ के रूप में रूप में प्रकट हुए । इस रात्रि को शिवरात्रि माना जाता है। शंकर दर्शनार्थ रुप साकार रुप में और ज्योर्तिमय खंभ निराकार रूप में पूजा होती है। उसको ठंडा करने के लिए अभिषेक किया जाता है।
डॉ नागर जी ने मंदिर एवं धर्म स्थल पर कैसे जाना चाहिए कि समझाइश देते हुए कहा कि इस ब्रह्माण्ड में प्रकट हुए शिवमहापुराण के अनुसार शिवरात्रि के दिन आठों पहर कि पूजा का विधान है। अपने श्रद्धानुसार पूजा कम से कम तीन घंटे एक पहर करना चाहिए। पूजन के समय रुद्राक्ष माला या एक रुद्राक्ष पहनना चाहिए और दोनों फेफड़ों के बीच रुद्राक्ष रहें पुरुष तिलक चंदन और भस्म लगाकर पूजा करना चाहिए।
वहीं पाश्चात्य संस्कृति के होड़ में अंधाधुंध नकल करने लगी मातृशक्ति को सनातन धर्म को लेकर डॉ नागर जी ने कहा कि माताएं बाल बांधकर रखें खुल्ले बाल नहीं रखें मस्तिष्क ढककर कर पूजा सुहाग के चिन्ह सुहागन स्त्री के होना चाहिए।शिव योग जागृत करना है तो विधि-विधान से पूजा करें नहीं तो कितनी भी पूजा कर ले वो आपकी और से हो सकती है भगवान उसे स्वीकार नहीं करते हैं।
कल कि कथा में हिमाचल पर्वत में सती पार्वती का जन्म कथा होगी।
इस अवसर पर गुरुदेव ने कथा श्रवण और शिव पूजन करने से लाभान्वित हुए परिवार के पत्रों को पढ़कर सुनाया और कहा कि यह जो नास्तिक है उनके लिए तमाचा है
गुरुदेव ने उपस्थित भक्त जनों से आह्वान करते हुए कहा कि श्री शिवाम्बा ब्रह्मोत्थान सेवा संस्था द्वारा गुरुकुल ग्राम निनौरा धाम पिपलिया मंडी के पास तहसील मल्हारगढ़ में चल रहा है। जिससे बाहर भिक्षा वृत्ति कर रहे या जो अनाथ है उनके 100 बच्चों का आवासीय विद्यालय में जन्म दिवस विवाह आदि शुभ अवसर पर देने का आह्वान किया।
इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं स्वयंसेवकों समाज प्रमुखों, जनप्रतिनिधि गणों, पत्रकारों एवं वाल्मीकि समाज जनों ने भगवान देवाधिदेव महादेव कि पूजा अर्चना अभिषेक एवं गुरुदेव डॉ मिथिलेश जी नागर का वंदन अभिनंदन किया।



