दलौदामंदसौर जिला

संघ शताब्दी वर्ष के तहत दलौदा मंडल में विराट हिंदू सम्मेलन संपन्न

10 गांवों से जुटे हजारों समाजजन, संतों के सानिध्य में हुआ आयोजन

दलौदा। राजकुमार जैन।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत क्षेत्र में आयोजित की जा रही हिंदू सम्मेलनों की श्रृंखला के तहत रविवार को दलौदा मंडल में विराट हिंदू सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सम्मेलन में दलौदा, दलौदा रेल, एलची, पिपलिया मुझावर, नाइखेड़ी, टोलखेड़ी,  बानीखेड़ी, निम्बाखेड़ी, फतेहगढ़ व नई फतेहगढ़ सहित 10 गांवों से सर्व हिंदू समाज के लोग एकत्रित हुए।

कृषि उपज मंडी परिसर में आयोजित इस सम्मेलन में संतों के सानिध्य के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने समाज को संगठन, संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का संदेश दिया। आयोजकों के अनुसार सम्मेलन में 10 गांवों के हजारों हिंदू समाजजन शामिल हुए। सम्मेलन में सानिध्य प्रदान करने वाले साधु संतों को निजी विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा मार्च पास्ट कर व सलामी देकर सम्मेलन में आगवानी की। स्कूली विद्यार्थियों द्वारा सामाजिक समस्याओं व राष्ट्र प्रेम से जुड़ी विभिन्न प्रस्तुतियां दी।

मुख्य वक्ता विद्या भारती मालवा प्रांत मंदसौर विभाग समन्वयक राघवेंद्र देराश्री ने कहा कि भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करते रहे हैं। इस समाज में यदि हिंदू जागृत नहीं रहा है, तो समाज की जो स्थिति बनती है, उससे हम सब भले भाति परिचित हैं। हम सब जानते हैं आज संघ को 100 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। संघ कार्य राष्ट्र का कार्य है और निश्चित तौर पर राष्ट्रीय 100 वर्ष पूर्ण होने का उत्साह हम सब के मन में है, लेकिन क्या यह 100 वर्ष पूर्ण होना हम सबके लिए पर्याप्त है? तो विचार आता है कि 100 वर्ष की संघर्ष यात्रा के पश्चात 100 वर्ष के इस अनुभव कार्य के पश्चात 100 वर्ष तक इस संगठन के कार्य को करने के पश्चात भी आज समय समाज के अंदर अनेक ऐसी बातें ऐसी चुनौतियां खड़ी है, जो देश को खोखला कर रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 में विजयदशमी के दिन जब नागपुर में हुई होगी तो निश्चित ही हम सब जानते हैं की स्थापना के पीछे इस संघ के कार्य के पीछे कोई नहीं कोई बड़ा उपदेश रहा होगा हम सोच सकते हैं कि आज से 100 वर्ष पूर्व जब हम स्वतंत्र नहीं थे। विदेशी शासक हम सब के मध्य में थे, कभी इस देश के समाज की क्या स्थिति रही होगी, बार-बार के आक्रमण के पश्चात इस देश के समाज के ऊपर जिस प्रकार के कुठाराघात हुए हैं। उससे हमारी संस्कृति हमारा भारत, जिसकी परंपराएं समृद्ध हुआ करती थी, जिसकी संस्कृति पवन हुआ करती थी वह संस्कृति को परंपराओं को भिन्न भिन्न करके विदेशी शासको ने समाज को कमजोर कर दिया था ऐसी स्थिति में नागपुर के छोटे से बालक देशों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में की। बालक केशव प्रारंभिक काल से ही देशभक्त राष्ट्रभक्त था और उसके मन में आक्रांताओं के प्रति विदेशी सत्ता के प्रति आक्रोश की भावना थी। यह भावना धीरे-धीरे आगे चलकर इतनी प्रचंड हो गई कि उनके मन में एक विचार आया स्वाधीनता के लिए जो आंदोलन चल रहे हैं, समाज के अंदर जो प्रयास चल रहे हैं वह प्रयास काफी नहीं है, यदि हमको इन समस्त प्रयासों के पश्चात भी स्वतंत्रता मिल गई तो वर्तमान समाज की जो स्थिति है वह ठीक नहीं लगती। यही देखकर डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की स्थापना का उद्देश्य एकमात्र हम सबको समझ में आता है कि जाति, वर्ग, भाषा और अन्य प्रकार के भेद में बटे जनसमुदाय को एक करना। यदि हिंदू एक होगा यदि एक होकर के अपने धर्म और संस्कृति को समझेगा ओर अपनी अपनी पावन परंपराओं को समझेगा। अपने मातृभूमि के प्रति अपना श्रद्धा भाव रखते हुए मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य को समझेगा तभी यह संगठित समाज स्वाधीनता का सच्चा आनंद ले सकता है और इस भाव से जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना की गई। उस समय निश्चित तौर पर अनेक प्रकार के सामाजिक आंदोलन अनेक प्रकार की सामाजिक संस्थाएं अनेक प्रकार के सामाजिक संगठनों के साथ-साथ संघ के स्वयंसेवक अभी कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्र को स्वतंत्र करने के कार्य में जुड़ गए।

जैन सन्त आचार्य महेंद्रसागर सूरीश्वर जी ने अहिंसा के सिद्धांत पर जोर देकर कहा कि कोई किसी का मर्डर क्यों करेगा…. कोई आतंकवादी क्यों बनेगा…. कोई देश में हमला क्यों करेगा… देश के साथ गद्दारी क्यों करेगा…. क्योकि जो एकजुट होगा वह खुद ना तो देश को आच आने देगा और ना माता-पिता के साथ कभी तिरस्कार का प्रयास करेगा। आप कल्पना करो यदि इस संसार के जितने लोग हैं यदि अहिंसा के व्रत को अपनालें तो विश्व की शांति होने में ज्यादा देर नही लगेगी। आज जो बायोवेपंस हथियार की हम सुनते हैं कि यह हमला अब मिसाइल आदि से नहीं होगा बल्कि जीवों के द्वारा हमला किया जाएगा, लेकिन अहिंसा की भावना को उन्नत करने का प्रयास करें एक दूसरे के प्रति मन को बिगड़े नहीं बल्कि सद्भावना आदर्श सम्मान का भाव लेकर आए तो निश्चित तौर पर अहिंसा की स्थापना होगी और अहिंसा जो है यह हमारे देश में संगठनों को मजबूत करेगी और सज्जन लोगों को आगे बढ़ने का मौका देंगे और इन्हीं के बल पर हमारे देश का विकास होगा। दूसरा विचार है कि अहिंसा के साथ हमें एक काम और करना अहिंसा के साथ यदि हम अपने व्यक्तित्व को अपने आसपास वालों को यदि हम श्रमशीलता सिखाते हैं यदि हम जागृति के साथ जीना सिखा दे तो हमारे देश की जो 140 करोड लोग हैं। 140 करोड लोग मिलकर के इस विश्व में देश के स्थान को सर्वोपरि होने में बहुत समय नहीं लगाएंगे, लेकिन आज हमारी स्थिति कैसी है। आज हमारे जो उत्पादकता है वह खत्म हो रही है। आज हमारे देश के अधिकांश लोग या तो नशे से ग्रस्त है जो नशा हमारे देश के युवा शक्ति को खत्म करने में लगा हुए है। नशा यदि खत्म हो जाए तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो अपने परिवार की तरफदारी अपने कुटुंब की जवाबदारी और अपने समाज की जवाबदारी वहां करने में सक्षम है लेकिन बुद्धि का दुरुपयोग होता है शक्ति का रस होता है जब व्यक्ति नशा करता है और कुछ लोग यह सोशल मीडिया मोबाइल समझे कि हमारा कितना समय कितनी ऊर्जा इन अलसी के कार्यों में जा रही है कि हमारा देश बहुत आगे बढ़ जाएगा और भारत माता की जय भारत माता की जाए तो भारत माता की जय होगी कैसे पार्क में देख लो किसी भी भूत पर देख लो रेलवे स्टेशन पर देख लो एयरपोर्ट पर देख लो बस व्यक्ति क्या कर रहा है बस मोबाइल हमारा है ना तो उसकी रचनात्मक शक्ति का उपयोग हो रहा है और ना उसकी शमशीलता का उपयोग हो रहा है ना मानसिक शक्ति का विकास हो रहा है व्यक्तिगत तौर पर देखें।

 

 

सम्मेलन की तैयारियों को लेकर पूर्व में दलौदा स्थित कण-कण बालाजी मंदिर में लगातार बैठकें आयोजित की गई थीं। इन बैठकों में विभिन्न व्यवस्थाओं के लिए समितियों का गठन कर जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। गठित समितियों द्वारा घर-घर जाकर पीले चावल व निमंत्रण पत्र देकर समाजजनों को सम्मेलन में आमंत्रित किया गया।

सम्मेलन के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। संतों के आशीर्वाद एवं वरिष्ठजनों के मार्गदर्शन से उपस्थित समाजजनों में उत्साह और एकजुटता का भाव देखने को मिला। सम्मेलन उपरांत सर्व हिंदू समाज के लिए सामूहिक भोजन की व्यवस्था की गई, जिसमें सभी श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। आयोजकों के आह्वान पर दिनभर प्रतिष्ठान भी बंद रखे गए।

 

 

रामधुन टोलियों ने किया नगर भ्रमण, हनुमान मंदिर पर हुआ संगम

आयोजन को सफल बनाने के लिए पूर्व दिनों में प्रतिदिन विभिन्न रामधुन टोलियां अपने-अपने क्षेत्रों में नगर भ्रमण कर रही थीं। अंतिम दिन दलौदा नगर की 11 रामधुन टोलियों का संगम बस स्टैंड स्थित हनुमान मंदिर पर हुआ। यहां से सभी टोलियां सामूहिक रूप से रामधुन गाते हुए मंडी परिसर स्थित सम्मेलन स्थल पहुंचीं, जहां विधिवत कलश स्थापना की गई।

आयोजकों ने सम्मेलन को ऐतिहासिक बताते हुए सभी सहयोगियों, कार्यकर्ताओं, युवाओं व समाजसेवियों के प्रति आभार व्यक्त किया और इसे हिंदू समाज की एकता व संगठन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

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