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मंदसौर में ‘कबाड़ से करोड़’ योजना का खुलासा: स्कूल में सड़ रहे ट्रैफिक सिग्नल, नगर पालिका को चाहिए नए 22 लाख वाले ‘एलईडी सितारे’

मंदसौर में ‘कबाड़ से करोड़’ योजना का खुलासा: स्कूल में सड़ रहे ट्रैफिक सिग्नल, नगर पालिका को चाहिए नए 22 लाख वाले ‘एलईडी सितारे’

मंदसौर, 01 मई 2026/मंदसौर की जनता के टैक्स का पैसा कहाँ ‘सिग्नल’ दे रहा है, यह तस्वीर देखकर समझ आ जाएगा। कमला नेहरू स्कूल के पीछे कबाड़ में धूल फांक रहे ये पुराने ट्रैफिक सिग्नल चीख-चीखकर पूछ रहे हैं

“साहब, हमारी गलती क्या थी? लाल-पीली-हरी बत्ती तो हम भी जलाते थे!”

लेकिन नगर पालिका को ये ‘बूढ़े सिग्नल’ पसंद नहीं। इन्हें चाहिए 22 लाख के नए चमचमाते सिग्नल। ताज़ा टेंडर जारी हो चुका है। वाह रे विकास!

कबाड़ में ‘विकास’ की लाश, टेंडर में ‘कमीशन’ की प्यास

तस्वीर खुद गवाह है। टूटी-फूटी बॉडी, जंग खाए खंभे, और ऊपर से पाइप की माला पहने ये सिग्नल स्कूल परिसर में ऐसे पड़े हैं जैसे किसी भ्रष्टाचार की ‘एक्सीडेंट साइट’ हो। सवाल सीधा है:

1. जब ये सिग्नल पहले से मौजूद हैं तो इन्हें सुधारा क्यों नहीं गया?

2. अगर ये खराब हैं तो इन्हें नीलाम कर सरकारी खजाने में पैसा क्यों नहीं डाला गया?

3. स्कूल परिसर को कबाड़खाना बनाने का अधिकार किस ‘संविधान’ ने दिया?

*जनता का पैसा, परमात्मा का नहीं*

संविधान का *अनुच्छेद 266* कहता है कि सरकार का एक-एक पैसा ‘संचित निधि’ में जाता है और संसद/विधानसभा की मंजूरी के बिना खर्च नहीं हो सकता। *अनुच्छेद 14* समानता की बात करता है – तो फिर अधिकारी की नई गाड़ी और जनता के टूटे सिग्नल में इतना भेदभाव क्यों?

राज्य वित्त आयोग अधिनियम और *नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 130* साफ कहती है कि जनता के पैसे का उपयोग ‘लोक कल्याण’ में होगा। क्या कबाड़ को सड़ने देना और नया टेंडर निकालना ‘लोक कल्याण’ है या ‘जेब कल्याण’?

22 लाख का हिसाब:हवाई जहाज से सिग्नल तक

नेता जी कहते हैं- “हवाई जहाज जनता के पैसे से आता है, जहाज जनता के पैसे से आता है, सिग्नल भी जनता के पैसे से आएगा।”

बिल्कुल सही! लेकिन हवाई जहाज उड़ता है, जहाज चलता है। ये 22 लाख वाले सिग्नल कहीं ‘कागज़ों में ही न चल जाएं’? मंदसौर की जनता पूछ रही है कि जब शहर की सड़कों के गड्ढे ‘मून क्रेटर’ को टक्कर दे रहे हैं, नालियां ‘स्विमिंग पूल’ बनी हैं, तो प्राथमिकता नए सिग्नल हैं या पुराने का पोस्टमार्टम?

टेंडर राज’ का ग्रीन सिग्नल, जनता को रेड सिग्नल

यह खेल नया नहीं है। पहले सामान खरीदो, उसे कबाड़ बनाओ, फिर नया खरीदने का टेंडर निकालो। इस ‘आर्थिक चक्र’ में पिसती सिर्फ जनता है। CAG की रिपोर्टें भरी पड़ी हैं कि कैसे रखरखाव के अभाव में करोड़ों की संपत्ति कबाड़ हो जाती है। यह सीधा-सीधा *लोक धन का आपराधिक दुरुपयोग* है।

जनहित में जारी: अब जनता का ‘सिग्नल’

मंदसौर की जनता अब ‘ग्रीन सिग्नल’ का इंतज़ार नहीं करेगी। उसे चाहिए ‘राइट टू इन्फॉर्मेशन’ का ब्रह्मास्त्र।

मांगें साफ हैं:

1. टेंडर तुरंत रद्द हो और पुराने सिग्नलों की तकनीकी जांच कराई जाए।

2. स्कूल परिसर में कबाड़ फेंकने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर *लोक संपत्ति नुकसानी निवारण अधिनियम* के तहत कार्रवाई हो।

3. 22 लाख रुपये से पहले शहर के गड्ढे भरें, स्ट्रीट लाइट सुधरें, सफाई हो।

नेता-अधिकारी कान खोलकर सुन लें: जनता का पैसा ‘माल-ए-मुफ्त’ नहीं है। यह पसीने की कमाई है। इसे ‘सिग्नल-सिग्नल’ खेलकर बर्बाद किया तो अगली बार जनता वोटिंग मशीन पर ‘लाल बत्ती’ दबा देगी। और वह सिग्नल हमेशा के लिए ‘रेड’ रहेगा।

नोट: यह खबर जनहित में जारी। जिस अधिकारी या नेता को टेंशन हो, वो कबाड़ वाले सिग्नल को घर ले जाए और 22 लाख अपनी जेब से भर दे। संविधान इसकी इजाज़त देता है।

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