ग्रहस्थ में भगवान आता है पर जहां अभिमान है वहां नहीं आता है। जहां सेवा हो वहां अनुसिया संत श्री श्वासानंद

ग्रहस्थ में भगवान आता है पर जहां अभिमान है वहां नहीं आता है। जहां सेवा हो वहां अनुसिया संत श्री श्वासानंद

सीतामऊ। संत का संग और हरि कि कथा हर दिन घर पर नहीं होती है। हमारे पास सब कार्य के लिए समय है पर हरि भजन के लिए समय नहीं है। जिसके पास थोड़ा सा भी समय उसके लिए है तो वह सदैव आगे बढ़ता है उसे कोई नहीं रोक सकता है। उक्त ज्ञानामृत छोटी काशी सीतामऊ में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा प्रसंग में संत श्री श्वासानंद जी महाराज ने कहीं।संत श्री ने कहा यहां रह कर कितनी ही पूंजी इकट्ठी कर लो, सब यहीं रहेगा कितना भी पाप किया तो उसको चुकाना पड़ेगा।जो आपके द्वारा किया गया पूण्य ही साथ रहता और साथ जाता है । धन से सुख सुविधा ख़रीद सकते हैं पर स्वास नहीं जो लिखा है सब यही छोड़कर जाना पड़ता है। हम क्या करते हैं दुःख में दुनिया भर कि मान मन्नत करते देवरों में नाक रगड़ने जाते हैं।पर जब सुख में उसे याद करे तो दुख आ ही नहीं सकता है। करोड़ों का हार बंगला गद्दा सुख नहीं दे सकते हैं सुख तो गोपाल के भजन में है।
हे मां इस संसार का जीव अपने पुत्र कि शादी में इतना खर्च कर देता है कि दुसरे दिन उसका कोई औचित्य नहीं रहता है। ईश्वर को भूल जाता और ऐश्वर्य में लाखों खर्च कर देता है जबकि सब यही रह जाता है। सद कार्य में ध्यान नहीं दिया तो यहां ऐसे आये है ऐसे ही चले जायेंगे। आजतक किसी को अपने साथ धन दौलत लें जाते नहीं देखा और जो शरीर पर है वह भी निकाल लेते हैं।
दो प्रकार का धन है एक जो माया का धन जो सोना चांदी हीरे जवाहरात रुपया पैसा है और दुसरा रामरतन धन है। एक को चोर चुरा सकते हैं नष्ट हो सकता है और दुसरा रामरतन धन जो दिन रोज बढ़ता है।यह प्रभू का ध्यान उपासना व्रत यह साथ जाता है।अपनी मां देवहूति को ज्ञान दे रहे कि संसार कि कोई वस्तु में सुख नहीं है। रामरतन धन में ही सुख है।
संत श्री ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक बफर पार्टी में एक लड़के ने गुलाब जामुन में आंनद देख कर अधिक खा लिए पर कुछ देर बाद वह बिमार हो गया उसे अस्पताल ले गए जहां उसे भर्ती होने पड़ा तो फिर सुख आनंद कहा गया। संसारिक वस्तु व्यवस्था के लिए जीवन में सुख आनंद नहीं दे सकती है। जीवन का आनंद तो प्रभु के प्रति समर्पण भाव है।
कपील भगवान कहते हैं कि जगत एक सपना है।आंख खुली तो सब कुछ है आंख बंद हुई तो अपना कुछ नहीं है। कदर्म ऋषि हर कदम में अपनी इन्द्रियों को वश में कर चले ऐसे कदर्म ऋषि थे। हमसे भी कोई भूल नहीं हो किसी का अपमान नहीं हो
एक महलों में जाकर भी बहु दुखी है दुसरी झोपड़ी में में भी आनंद से रहती है क्योंकि वह एक बहु सुख में दुख और एक दुख में भी सुख ढुढती है। सुख दुख भगवान ने नहीं बनाए हमारे द्वारा बनाए गए हैं।
जितना उठा सको उतना ही उठाओ कर्जा भी दे सको उतना लो जितना दे सको। नहीं तो दुख ही दुख है। पति पत्नी ग्रहस्थ जीवन के पहिए हैं कभी पंचर नहीं होने चाहिए एक भी पंचर हुआ तो गाड़ी नहीं चल सकती है इस गाड़ी को ठीक रखने के लिए दोनों साथ चले। कभी किसी से जलन भाव नहीं प्रेम भाव रखो सबका आदर करो परिवार में देवरानी जेठानी सास बहू सभी आपस में प्रेम से रहोगे तो घर स्वर्ग बन जाएगा।
देवहुति कि नौ कन्या हुई एक अनुसुइया जिनका देव ऋषि नारद के मानस पुत्र अत्रि के साथ विवाह हुआ।
मां होती है वहां सब समान हो जाते हैं सभी बेटे बेटी बराबर होते हैं। पर जब बहु काम करती और उसके मन में इनको भोजन कब कराऊंगा का भाव आ जाता है तो यह दुःख और परिवार का आनन्द खत्म कर देता है। अनुसुइया खुश होकर आश्रम में 100 लोगों का रोज भोजन कराती थी।पूण्यदाई माता भी हुई मंदसौर में एक मां थी वह बाजार में एक रुपए कि भीख मांगती थी और भीख मांगकर उसने अपने जीवन काल में सात बार भागवत कथा कर
संत श्री ने कहा कि सत अभिमान भगवान कि भक्ति का करो धन दौलत का नहीं करोड़पति कि पत्नी और एक गरीब कि पत्नी दोनों ही एक पुरुष कि पत्नी है। करोड़पति कि पत्नी उसके पैसे कि नहीं और गरीब कि गरीबी कि नहीं है। गरीब कि पत्नी सेवा करती है और पैसे वाली कि पत्नी साड़ी निहारने में लगी रहती है।पर जिसने सेवा कि उसकी प्रशंसा कि जाती है।
संत श्री ने कहा कि ग्रहस्थ आश्रम एक तपोवन आश्रम है जहां राम कृष्ण कपील भगवान का जन्म हुआ है। ग्रहस्थ में भगवान आता है पर जहां अभिमान है वहां नहीं आता है। जहां सेवा हो वहां अनुसिया है उसमें अभिमान नहीं है।एक नारी वह है जो 50 करोड़ के शादी में भी व्यवधान पैदा कर देती है। थोड़ी थोड़ी बात में नाराज होती झगड़ने लगती है हट से हंसते खेलते परिवार में आग लगा देती है माता पिता से अलग करा देती है ।जब बहु आदर्श संस्कार कथा सुन समझती है तो सीता सावित्री देवहूति अनुसिया बन जाती है। कथा केवल वृद्ध के लिए नहीं बल्कि स्कूल में छोटी उम्र में ही जाना पड़ता है तभी बढ़े होकर पढाई पूरी होने पर डॉक्टर बनते हैं।
संत श्री ने कहा कि जब बहु ससुराल आती है तो ससुराल में सभी रहने वाले उसका परिवार है। वहां पति परमेश्वर है और उस परमेश्वर के साथ सभी कि सेवा करना उसका फर्ज है।
पतिवृता पति कि आज्ञा परिवार कि सेवा के पालन कि इतनी शक्ति कि भगवान ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों को छ महीने के बालक बना दिया और सती, लक्ष्मी और सरस्वती को भी वेकुंट से अपने घर बुला लिया। और इसी सती के तप से विष्णु से दत्तात्रेय ब्रह्मा से चंद्रदेव और शिव से दुर्वासा प्रगट हुए। पुत्रियां थीं अग्नि देव को आहुति पितृदेव को भोलेनाथ को शवदाह जो भी
दुःख का कारण हम ही हैं प्यार दोगे तो प्यार लोगे,दुख दोगे तो दुख मिलेगा, बुराई करोगे तो बुराई अपनी भी कोई करेगा जैसा बनना चाहता है वो वैसी सोच से बन जाता है। सोच बदल लो प्रेम दो प्रेम लो, सती कि बात याद रखना, सेवा करोगे तो सबको ठीक लगेगा।



