‘अजीबोगरीब’ कार्यप्रणाली, बिना लैब रिपोर्ट के किसानों पर दर्ज हो रहे झूठे केस?

बिना लैब जांच के सीधे जेल… क्या सीबीएन को सता रहा रिपोर्ट में मॉर्फिन ‘जीरो’ आने का डर
नीमच/रतलाम। डोडाचूरा (Poppy Straw) की आड़ में चल रहे कानून के दोहरे रवैये पर अब तक का सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है! मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में रोजाना दर्ज हो रहे डोडाचूरा मुकदमों के पीछे नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) की एक ऐसी ‘अजीबोगरीब’ कार्यप्रणाली सामने आई है, जिसने न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अफीम, स्मैक और अन्य खतरनाक ड्रग्स पकड़े जाने पर उनका सैंपल तुरंत फॉरेंसिक लैब (Chemical Examiner) भेजा जाता है, लेकिन डोडाचूरा केस में बिना किसी केमिकल रिपोर्ट के ही चार्जशीट (चालान) बनाकर आरोपियों को सीधे अदालत में पेश किया जा रहा है!
विधिक जानकारों और जानकारों का मानना है कि चीरा (Lancing) लगने के बाद डोडा पोस्त में मॉर्फिन का अंश घटकर 0.2% से भी कम (महज नाममात्र) रह जाता है।
क्या सीबीएन को इस बात का डर सता रहा है कि अगर जब्त डोडाचूरा की वैज्ञानिक जांच कराई गई, तो लैब रिपोर्ट में मॉर्फिन की मात्रा नगण्य या ‘शून्य’ आएगी? और अगर मॉर्फिन ही नहीं मिला, तो फिर NDPS एक्ट की धाराएं खुद-ब-खुद हवा में उड़ जाएंगी?
कानून का तकाजा है कि किसी भी पदार्थ को ‘मादक पदार्थ’ साबित करने के लिए उसकी फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट सबसे अहम दस्तावेज होती है। लेकिन डोडाचूरा मामलों में बिना लेबोरेटरी रिपोर्ट के केस बनाए जा रहे हैं। बिना जांच रिपोर्ट पुष्टि के किसानों और आरोपियों को 10 से 20 साल तक की कठोर सजा का जोखिम झेलना पड़ रहा है।
विसंगति : अगर माल में नशा साबित करने वाली वैज्ञानिक रिपोर्ट ही नहीं है, तो कानून की नजर में यह मामला कितना टिकेगा?
मध्यप्रदेश से लेकर राजस्थान तक हर दिन डोडाचूरा जब्ती की खबरे आ रही हैं, पर सैंपलिंग और जांच प्रक्रिया को बाईपास करके केस दर्ज करना सीधे तौर पर वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या केंद्रीय गृह और वित्त मंत्रालय इस विसंगति का संज्ञान लेंगे या फिर बिना ‘केमिकल टेस्ट’ के किसानों को सलाखों के पीछे धकेलने का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?
इधर डोडा पोस्त/ डोडा चूरा को NDPS एक्ट से ही बाहर करने में जुटे हैं MP पुलिस के DIG मनोज कुमार सिंह:-
आईपीएस मनोज कुमार सिंह मध्यप्रदेश के अफ़ीम उत्पादक जिले नीमच, मंदसौर में पुलिस अधीक्षक रहे, इसके बाद रतलाम रेंज DIG रहे, उन्होंने डोडा चूरा की इस गंभीर समस्या से किसानों को झूझते हुए नज़दीकी से देखा, एमपी सरकार ने वर्ष 2015 से डोडा चूरा के ठेके देना बंद कर दिए, न तो सरकार डोडा चूरा ख़रीद रही है और न ही केस इसे बेच पाते हैं अगर बेचे तो पुलिस या सीबीन एनडीपीएस एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज कर जेल में डाल दिया जाता है क्योंकि NDPS एक्ट में डोडाचूरा शामिल है! आईपीएस मनोज कुमार सिंह ने अध्ययन में पाया कि डोडा चूरा में मार्फ़िन की मात्रा 0.2 % से भी कम है, ऐसे में इसे एनडीपीएस एक्ट से बाहर रखा जाना चाहिए! उन्होंने रतलाम DIG रहते हुए 29 पन्नो की रिपोर्ट केंद्र सरकार (वित्त मंत्रालय)और राज्य सरकार को भेजी थी, इसके बाद एमपी, राजस्थान सहित कई राज्यों में डोडा चूरा को एनडीपीएस एक्ट से बाहर किए जाने की मांग ने जोर पकड़ लिया था, यह मांग लगातार किसान कर रहे हैं लेकिन सरकार ध्यान नहीं दे रही है!
क्या डोडा चूरा को जल्द से जल्द एनडीपीएस एक्ट से बाहर किया जाना चाहिए?
क्या नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को जब्त किए जा रहे डोडा चूरा के सैंपल की लैब जांच करवाना चाहिए, अगर मार्फ़िन की मात्रा बहुत कम (.0.2%) है तो एनडीपीएस एक्ट का केस बनाना बंद कर देना चाहिए? इस पर आपकी क्या राय है कृपया कमेंट्स में ज़रूर बताएं!



