ग्राम पंचायतों की गौशालाओं के संचालन में व्यापक स्तर पर फर्जीवाड़ा..!

ग्राम पंचायतों की गौशालाओं के संचालन में व्यापक स्तर पर फर्जीवाड़ा..!
रीवा। ग्राम पंचायतों में संचालित होने वाली गौशालाओं का संचालन ठीक से नहीं हो रहा है। कागजों में संचालन हो रहा है, फर्जी गाँवंश को रखे जाने की संख्या दर्ज कर ली जाती है, पशुपालन विभाग के अधिकारी उसी को सत्यापित कर देते हैं। फिर व्यवस्था के नाम पर लाखों का भुगतान होता रहता है। इस तरह से लगता है कि जिले में गौशालाओं के नाम पर करोड़ों का घोटाला हो रहा है। बावजूद इसके प्रशासन व ग्रामीण विकास विभाग कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा मवेशियों से किसान परेशान है, दिन रात वह खेतों की रखवाली करता है, इसे बाद भी फसल को बचाना मुश्किल हो जाता है।
निरीक्षण में मिलती है निरंक स्थिति
जब पंचायतों में संचालित गौशालाओं का आकस्मिक निरीक्षण होता है तो पता चलता है कि मौके पर गौवंश के नाम पर कुछ मिलता ही नहीं, कर्मचारियों के नाम पर भी कोई नही मिलता, पानी की व्यवस्था, चारा व भूसे की व्यवस्था भी नहीं मिलती। कहीं मृत मवेशी मौके पर मिल जाते हैं तो कहीं जर्जर स्थिति में गौशालाओं की स्थितियां पाई जाती हैं। किन्तु ऐसे मामलों में जब गौशालाओं के संचालकों को नोटिस जारी की जाती हे तो वे अपने फर्जीवाडे को छिपाने के लिये इस तरह से जबाब देते हैं जैसे सब कुछ ठीक हो। जांच करने वाले, निरीक्षण करने वाले अधिकारियों पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। टोटल सफेद झूठ के साथ जबाब प्रस्तुत कर दिया जाता है। कई जगह तो क्षमता से अधिक गौवंश की संख्या दिखाई जा रही है। मौके पर जब एक भी गोवंश नही मिलते और नोटिस जारी होती है तो जबाब में संचालक बताते हैं कि सभी गौवंश चरने के लिये भेज दिये गये थे। उनके साथ कर्मचारी भी गये थे। इसलिये मौके पर सब कुछ खाली मिला। किन्तु जहां भूसे का स्टाक नहीं मिलता एवं अन्य सामग्री भी नहीं मिलती वहां भी जबाब में झूठ गया जाता है। इसलिये समझा जा सकत क पंचायतों में जहां करोड़ों रूपये गौशालाओं के नाम पर खर्च हो रहे हैं वहां की व्यवस्था कितनी खराब है और किस तरह से गौशालाओं के नाम पर भ्रष्टाचार किया जा रहा है?
फिर भी कोई कार्रवाई क्यों नहीं..?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि निरीक्षण, नोटिस व जबाब के आधार पर गौशालाओं के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार को कब तक होने दिया जायेगा। गौशालाओं की वास्तविक स्थिति के अनुसार नियमित निगरानी, औचक निरीक्षण, भौतिम सत्यापन आदि जो जरूरी बाते हैं उनका विधिवत पालन क्यों नहीं किया जाता। औपचारिकता के नाम पर जब तक जांच व निरीक्षण के नाम पर इसी तरह से होता रहेगा तब तक भ्रष्टाचारियों को लूटने का अवसर मिलता ही रहेगा। क्योकि उन्हें गौवंश की सेवा
करने की कोई चिन्ता नहीं होती। उनके पास तो संचालन का अधिकार मिल गया तो यह मान लिया जाता है कि अब सब कुछ उनके ही हाथ में हैं। जैसा वे चाहेंगे वैसा ही होता रहेगा। फिर यहां का पशुपालन विभाग जो नोडल है और जिसकी जिम्मेदारी है, जनपद व विकास खण्ड स्तर पर जिसका अमला है, अधिकारी पदस्थ हैं वे क्या कर रहे हैं। रीवा जिला हो अथवा मऊगंज दोनो जिलों में ग्राम पंचायतों के माध्यम से और समूहों के माध्यम से संचालित होने वाली गौशालाओं में लूट का गोरखधंखा खुले आम चल रहा है। किन्तु सवाल यही है कि इस तरह के मामले में प्रभावी कार्रवाई कब होगी? क्या प्रशासन इस मामले में जानबूझ कर अनजान बने रहना चाहता है? किन्तु ऐसे मामलों में जब गौशालाओं के संचालकों को नोटिस जारी की जाती हे तो वे अपने फर्जीवाड़े को छिपाने के लिये इस तरह से जबाब देते हैं जैसे सब कुछ ठीक हो। जांच करने वाले, निरीक्षण करने वाले अधिकारियों पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। मौके पर जब एक भी गोवंश नहीं मिलते और नोटिस जारी होती है तो जबाब में संचालक बताते हैं कि सभी गौवंश चरने के लिये भेज दिये गये थे। उनके साथ कर्मचारी भी गये थे। इसलिये मौके पर सब कुछ खाली मिला। किन्तु जहां भूसे का स्टाक नहीं मिलता एवं अन्य सामग्री भी नहीं मिलती वहां भी जबाब में झूठ परोसा जाता है। इसलिये समझा जा सकता है कि पंचायतों में जहां करोड़ों रूपये गौशालाओं के नाम पर खर्च हो रहे हैं वहां की व्यवस्था कितनी खराब है और किस तरह से गौशालाओं के नाम पर भ्रष्टाचार किया जा रहा है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि निरीक्षण, नोटिस व जबाब के आधार पर गौशालाओं के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार को कब तक होने दिया जायेगा।



