
कथा के तीन घंटे महत्वपूर्ण नहीं है, बाकी के इक्कीस घंटे महत्वपूर्ण है कि आपने जीवन में क्या उतारा?-लोकेशानंद महाराज
ताल ब्यूरो चीफ शिवशक्ति शर्मा
कथा में आनंद ही आनंद बरस रहा. बलिहारी ऐसे सतगुरु की…भगवान आदिनाथ नारायण जी, द्वारकाधीश जी, महा लक्ष्मी जी को प्रणाम करते हुए महाराज जी ने कहा…”सदा सेव्यति महाभागवत कथा”
हमें कथा के सेवन सानिध्य मे रहना चाहिए। हर जीवन का परम लक्ष्य है ‘नर से नारायण ‘. कथा नारायण का बोध कराती है। विभिन्न देह रूपो में रहकर जीवन मरण का चक्र चलता रहता है,84 लाख योनियों में 84लाख चक्कर लगाते रहता है।
‘पाई न जेहि परलोक संवारा ‘
शहीद,वीर, संत पूज्य होते हैं। धरती पर भक्त, महा पुरुषों का यश अनंत होता हैं। और भक्तों में नरसी मेहता, मीरा बाई संत ज्ञानेश्वर आज भी अमर है। महाराज ने कहा भागवत जी का संदेश अजर अमर नारायण की भक्ति करे। कथा के 3 घंटे महत्वपूर्ण नहीं है, बाकी के 23 घंटे आपने जीवन मे क्या उतारा वह महत्वपूर्ण है।
भक्त एवं भगतडा में अंतर है हमें भक्त बनना है।
सनातन में प्रथम पूज्य गणपति जी है।बीजे भगवान परम है।
सबसे पहले सनकादिक जी ने नारद जी को। दूसरे गोकर्ण जी ने, तीसरे सूत जी महाराज ने नेमीसारन्य में 1000वर्ष का सत्र हुआ और 87000ऋषि मुनि के के बीच कथा का प्राकट्य हुआ। प्रथम स्कन्द के तृतीय अध्याय में स्पष्ट लिखा है भगवान का नाम नारायण है। संसार में पहला भजन कीर्तन नारद जी की वीणा से निकला। श्रीमन नारायण नारायण, भगवान और लक्ष्मी जी के समक्ष।
दूसरों के दुःख से जिसका मन द्रवित हो वह संत है।
हम कृष्ण को मानते हैं पर कृष्ण की बात नहीं मानते इसलिए भगतडे है। माता कुंती ने भगवान से वरदान में दुःख मांगा। हमें दुख दिजिये दुःखी थे तो आप हमारे साथ रहें, लाक्षा गृह हो, वनवास हो आप सदैव साथ रहें, जैसे ही राजपाट आया आप छोड़कर द्वारिका जा रहे हैं।
सुख में भगवान को नहीं भूलना चाहिए। लड़ाई झगड़े से कुछ नहीं होता, पुरी जिंदगी धृतराष्ट्र ने पाण्डव से बैर रखा, अंत में युधिष्ठिर की ही रोटी खाना पड़ी।
अंतिम समय में कोई साथ नहीं होता, एक दिन सबको छोड़कर जाना है, हम एक दिन मरेंगे यही सत्य हैं।।
संतो का संग सत्य हैं, 16वर्ष संतो की टोली रहेगी तो समझ में आयेगा, 1600सीख बताओ तो एक समझ में आती हैं।
जनता को पकड़ा तो जनार्दन दूर थे,अब जनार्दन से प्रीति, प्रगाढ़ता बड़ी है। हमें किसी भी कारण किसी का रास्ता नहीं रोकना चाहिए। बाधक नहीं साधक बनो। धूल न उड़े यह ध्यान रहे। हर साधक अपने आसपास धूल उड़ने से रोके।मां के जैसा कोई हितैषी नहीं हो सकता।
भगवान के मंदिर में दान से सेवा से हमारी कीर्ति अमर होती हैं।


