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मधुबनी की बारीक रेखाओं में आस्था और संस्कृति के रंग भरतीं सुनीता सिसोदिया

15 वर्षों से चित्रकला को साधना मानकर रच रहीं अपनी अलग पहचान
मंदसौर। महीन रेखाओं का अनुशासन, रंगों की जीवंतता और हर आकृति में छिपा कोई भाव—मधुबनी चित्रकला की यही खूबसूरती मंदसौर की कलाकार सुनीता सिसोदिया को करीब 15 वर्षों से लगातार अपनी ओर खींच रही है। उनके लिए चित्रकला महज रंगों और रेखाओं को कागज पर उतारने की कला नहीं, बल्कि मन की भावनाओं, आस्था और भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्त करने का माध्यम है।मधुबनी की पारंपरिक शैली से प्रभावित सुनीता ने इसे अपनी कला-साधना और पहचान का हिस्सा बना लिया। देवी-देवताओं, पौराणिक प्रसंगों, नारी शक्ति, प्रकृति और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े विषय उनके प्रिय हैं। खासकर देवी-देवताओं के चित्र बनाते समय उनकी कोशिश रहती है कि चित्र में केवल आकृति की सुंदरता न आए, बल्कि श्रद्धा और सकारात्मक भाव भी दिखाई दें। उनका मानना है कि कलाकार जिस भावना से कोई चित्र रचता है, उसका स्पर्श देखने वाले तक भी पहुंचता है।
उनकी कला की खासियत पारंपरिक मधुबनी शैली की बारीकी के साथ विषयों की भावपूर्ण प्रस्तुति है। वे महीन रेखाओं, आकृतियों और रंगों के माध्यम से चित्र में एक कथा रचने का प्रयास करती हैं। उनके लिए अच्छा चित्र वह है जिसे देखकर दर्शक केवल उसकी सुंदरता की प्रशंसा न करे, बल्कि उसके पीछे छिपी कहानी, संस्कृति और भावना को भी महसूस करे। पारंपरिक शैली को आधार बनाते हुए वे विषय और प्रस्तुति में नए प्रयोग करने से भी नहीं हिचकतीं।
मंदसौर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत उनके लिए प्रेरणा का एक और महत्वपूर्ण स्रोत है। भगवान पशुपतिनाथ मंदिर, शिवना नदी, स्थानीय लोकजीवन और क्षेत्र की परंपराओं को मधुबनी शैली में चित्रित करने की उनकी इच्छा है। इसके जरिए वे चाहती हैं कि मंदसौर की स्थानीय संस्कृति और विरासत को भी लोककला के माध्यम से व्यापक पहचान मिले।
कला के क्षेत्र में उन्हें विभिन्न सम्माननीय लोगों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों से मिली सराहना और प्रोत्साहन ने उनकी कला-यात्रा को नई ऊर्जा दी है। सुनीता इसे अपनी उपलब्धि के साथ एक जिम्मेदारी भी मानती हैं। उनका प्रयास है कि हर नई कलाकृति में पहले से कुछ नया और बेहतर करने की कोशिश दिखाई दे।
अब उनकी आकांक्षा अपनी कला को मंदसौर से प्रदेश, देश और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जाने की है। वे चाहती हैं कि मधुबनी चित्रकला के माध्यम से भारतीय आस्था, संस्कृति और परंपराओं की सुंदरता नई पीढ़ी और दुनिया के सामने पहुंचे तथा युवा भी इस समृद्ध पारंपरिक कला से जुड़ें।
सुनीता के लिए कला एक पहचान से कहीं आगे है। वह उनकी भावनाओं की भाषा है, श्रद्धा का स्वर है और वर्षों से चली आ रही एक ऐसी साधना है, जिसमें मधुबनी की हर बारीक रेखा के साथ भारतीय संस्कृति का कोई रंग धीरे-धीरे आकार लेता है।
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