वर्दी का असली फर्ज: घायल को अपनी कार से अस्पताल भेज, खुद बाइक पर लिफ्ट लेकर पहुंचे डीआईजी
रतलाम रेंज डीआईजी निमिष अग्रवाल ने पेश की मानवता की ऐसी मिसाल, जिसे देखकर लोग बोले-अधिकारी हो तो ऐसा
मन्दसौर:- सड़क पर हुए एक हादसे ने शुक्रवार को जहां एक व्यक्ति को घायल कर दिया, वहीं उसी हादसे के बीच रतलाम रेंज डीआईजी निमिष अग्रवाल की संवेदनशीलता ने इंसानियत की एक ऐसी तस्वीर सामने रख दी, जिसकी जमकर सराहना हो रही है। डीआईजी ने यह साबित कर दिया कि बड़ी कुर्सी पर बैठना अलग बात है, लेकिन मुश्किल वक्त में किसी अनजान व्यक्ति के लिए खुद रुक जाना ही असली मानवीय नेतृत्व है।
रतलाम के नामली में कृषि उपज मंडी के सामने फोरलेन पर शुक्रवार को एक कंटेनर ने स्कूटी को पीछे से टक्कर मार दी। हादसे में पंचेड़ निवासी भेरुलाल पिता केशव जाट घायल हो गए। उनके सिर में चोट आई। हादसे के बाद मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई।
इसी दौरान जावरा से रतलाम की ओर आ रहे रतलाम रेंज डीआईजी निमिष अग्रवाल की नजर हादसे पर पड़ी। उन्होंने बिना देर किए अपना वाहन रुकवाया। वे मौके पर पहुंचे और घायल की स्थिति देखी। उस समय उनके सामने न कोई प्रोटोकॉल था, न पद की औपचारिकता—सिर्फ एक घायल व्यक्ति की जिंदगी और उसे तत्काल उपचार दिलाने की चिंता थी।
अपनी कार छोड़ दी घायल के लिए डीआईजी ने तत्काल निर्णय लेते हुए अपने ड्राइवर और गनमैन के साथ अपनी सरकारी कार से घायल भेरुलाल को रतलाम मेडिकल कॉलेज भेज दिया, ताकि उसे जल्द से जल्द उपचार मिल सके। हादसे में शामिल कंटेनर क्रमांक आरजे 41 जीबी 1468 का चालक भी मौके पर रुका रहा।
घायल अस्पताल पहुंचा तो डीआईजी ने खुद लिया ‘लिफ्ट’ का सहारा
घायल को अपनी कार से अस्पताल भेजने के बाद डीआईजी निमिष अग्रवाल ने अपने वाहन को ड्राइवर और गनमैन के साथ रतलाम रवाना कर दिया। इसके बाद खुद रतलाम पहुंचने के लिए उन्होंने फोरलेन पर एक बुलेट सवार से लिफ्ट ली और बाइक पर बैठकर रतलाम पहुंचे।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का इस तरह अपनी सुविधा और पद की परवाह किए बिना किसी घायल को प्राथमिकता देना लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।
यह सिर्फ मदद नहीं, नेतृत्व की जीवंत मिसाल
अक्सर वर्दी को अधिकार, पद और जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन डीआईजी निमिष अग्रवाल ने इस घटना में वर्दी का एक और चेहरा दिखाया—संवेदना का चेहरा।
उन्होंने न घायल से उसका परिचय पूछा, न यह देखा कि वह कौन है और कहां से आया है। उन्होंने सिर्फ इतना देखा कि एक इंसान सड़क पर घायल पड़ा है और उसे मदद की जरूरत है।
यही संवेदनशीलता पुलिसिंग की उस भावना को मजबूत करती है, जिसमें कानून-व्यवस्था के साथ-साथ जनसेवा और मानवता भी सर्वोच्च प्राथमिकता होती है।
लोगों के बीच बनी चर्चा—‘पद बड़ा हो तो दिल भी बड़ा होना चाहिए’
डीआईजी के इस कदम की मौके पर मौजूद लोगों और स्थानीय नागरिकों ने सराहना की। घटना ने यह संदेश दिया कि किसी अधिकारी की पहचान केवल उसकी वर्दी, पद या काफिले से नहीं होती, बल्कि वह आम आदमी के दर्द को कितनी तत्परता से महसूस करता है, इससे होती है।
डीआईजी निमिष अग्रवाल ने इस पूरे घटनाक्रम में जो किया, वह किसी औपचारिक आदेश का हिस्सा नहीं था। यह उनका तत्काल मानवीय निर्णय था—और शायद इसी वजह से यह घटना एक सामान्य सड़क हादसे से आगे बढ़कर मानवता की मिसाल बन गई।
एक घायल को अस्पताल पहुंचाने के लिए अपनी कार छोड़कर खुद बाइक पर लिफ्ट लेकर जाना—यह तस्वीर लंबे समय तक लोगों के जेहन में रहेगी।


