आलेख/ विचारमध्यप्रदेशरीवा

जब बैंक के बाबू ने खाता चेक किया, तो पता है क्या बोला? माता जी, आपके खाते में सिर्फ ₹16 बचे हैं!

जब बैंक के बाबू ने खाता चेक किया, तो पता है क्या बोला? माता जी, आपके खाते में सिर्फ ₹16 बचे हैं!

-विकास तिवारी रीवा

बूढ़ी माँ अपनी ‘विधवा पेंशन’ की उम्मीद में, चिलचिलाती धूप में कई किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुँची थीं। सोचा था, इस बार कुछ पैसे मिल जाएंगे तो महीने भर के राशन और दवा का इंतज़ाम हो जाएगा।

₹16…! ज़रा सोचिए, उस वक्त उस बेसहारा माँ के दिल पर क्या गुजरी होगी? सुनने की समस्या की वजह से उन्हें यह भी नहीं पता कि उनकी हक की पेंशन कहाँ, किस दफ्तर की फाइल में दम तोड़ चुकी है। बैंक वाले बताते हैं कि यह माँ हर महीने इसी उम्मीद में दूर से पैदल चलकर आती हैं, और हर बार इसी तरह खाली हाथ, अपनी सूनी आँखों में आँसू लिए वापस लौट जाती हैं। मध्य प्रदेश में सोशल सिक्योरिटी पेंशन के तहत इन बुजुर्ग और विधवा महिलाओं को हर महीने ₹600 मिलने का प्रावधान है। किसी रईस के लिए ₹600 महज़ एक शाम के नाश्ते का बिल हो सकता है, लेकिन इस माँ के लिए यह उनके स्वाभिमान और दो वक्त की रोटी का इकलौता सहारा है।

अब हमारे सिस्टम के कर्ता-धर्ताओं से कुछ तीखे सवाल

कागज़ी डिजिटल इंडिया का क्या फायदा? जब एक बुजुर्ग महिला को यह बताने वाला कोई नहीं है कि उसकी पेंशन ‘e-KYC’, ‘आधार लिंकिंग’ या ‘DBT’ के किस तकनीकी मकड़जाल में अटकी हुई है? बैंक और ब्लॉक के अधिकारियों की आत्मा कहाँ सोई है? जब एक असहाय बुजुर्ग महिला हर महीने दफ्तर के चक्कर काट रही है, तो क्या किसी एक भी बाबू का फर्ज नहीं बनता कि वो कुर्सी से उठकर उसकी समस्या का समाधान कर दे? क्या कागज़ों के नियम इंसानी जान से बड़े हैं? नियम बनते हैं जनता की सहूलियत के लिए, लेकिन यहाँ नियम ही गरीबों का गला घोंट रहे हैं।

यह सिर्फ एक माँ की कहानी नहीं है। , न जाने कितने ऐसे बुजुर्ग हैं जो ब्लॉक और बैंकों के चक्कर काटते-काटते दम तोड़ देते हैं, लेकिन उनकी पेंशन चालू नहीं होती।

बड़ी-बड़ी योजनाओं के होर्डिंग्स लगाने वाली सरकार और एयरकंडीशनर कमरों में बैठकर फाइलें सरकाने वाले अधिकारियों को तुरंत जागना चाहिए। अगर हकदार को उसका हक पाने के लिए भी भीख मांगनी पड़े, तो समझ लीजिए कि हमारा सिस्टम पूरी तरह वेंटिलेटर पर है। इस बेबस माँ की खामोश चीख का ज़िम्मेदार कौन है? आखिर कब मिलेगा इन्हें न्याय? क्या कोई साहब इनकी आवाज़ सुनेगा, या अगली बार फिर ये ₹16 का बैलेंस देखने पैदल ही आएंगी?

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