जनजातीय एवं लोक संस्कृति का संरक्षण आज की महती आवश्यकता – पद्मश्री अर्जुन सिंह धुर्वे

प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ़ एक्सीलेंस में जनजाति एवं लोक संस्कृति को समर्पित
दो-दिवसीय परिसंवाद का शुभारंभ
मंदसौर। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ़ एक्सीलेंस, राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मंदसौर के श्री कुशाभाऊ ठाकरे प्रेक्षागृह में जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, भोपाल के सौजन्य से त्रैमासिक श्रृंखला “लिखन्दरा” के अंतर्गत दो-दिवसीय परिसंवाद समारोह का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डिंडोरी के पद्मश्री से सम्मानित श्री अर्जुन सिंह धुर्वे, सुश्री फुलझरिया बाई, तथा घुमंतू जनजाति समुदाय के प्रांत संयोजक श्री रवि प्रताप सिंह बुंदेला उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप दीपन के साथ हुआ तत्पश्चात सभी आमंत्रित अतिथियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। आमंत्रित अतिथियों द्वारा कार्यक्रम की शुरुआत में एक गीत की प्रस्तुति बांसुरी एवं अन्य लोक वाद्य यंत्रों के साथ दी गई। कार्यक्रम की संयोजिका एवं हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ललिता लोधा ने आमंत्रित अतिथियों का परिचय दिया एवं समारोह की भूमिका रखी जो घुमंतू जनजातियों को केंद्र में रखकर बनाई जा रही टॉकिंग डिक्शनरी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. जे एस. दुबे ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि इस प्रकार का सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक महत्व का आयोजन अंचल में पहली बार आयोजित हो रहा है, जो जनजातीय एवं घुमंतू संस्कृतियों के संरक्षण, संवर्धन एवं शोध के नए आयाम स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
प्रथम वक्ता के रूप में सुश्री फुलझरिया बाई ने “बैगा समुदाय में श्री अन्न” विषय पर अपने विचार रखे। आपने स्वयं के द्वारा विभिन्न पौधों की देशज प्रजातियों के बीजों के संरक्षण एवं उनके सीड बैंक बनाने के अभियान को लेकर जानकारी प्रदान की। अपने संघर्षों एवं अनुभवों को साझा करते हुए आपने बताया कि किस प्रकार विपरीत परिस्थितियों में साहस के साथ बीजों को सहेजने की इस मुहिम को आगे बढ़ाया गया। आपने कहा कि विभिन्न प्रकार के औषधीय गुणों से भरपूर ये किस्में लगातार विलुप्त होती जा रही हैं एवं इनका संरक्षण अति आवश्यक है। आपने यह भी बताया कि उन्हें स्वयं कभी अस्पताल जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी; मोटे अनाज की विशेषता है कि वे शरीर को स्वस्थ एवं सक्रिय बनाए रखते हैं।
मुख्य वक्ता के रूप में पद्मश्री से सम्मानित अर्जुन सिंह धुर्वे ने बैगा जनजाति के लोकगीतों एवं उनकी संस्कृति को संरक्षित करने के प्रयासों पर चर्चा की। आपने बताया कि वे अपने समाज के प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की, साथ ही शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इसी के साथ उन्होंने अपनी लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए जीवनपर्यंत विभिन्न कार्य किए, जिसके चलते उन्हें पद्मश्री के अतिरिक्त राष्ट्रीय तुलसी सम्मान, जनजाति गौरव सम्मान सहित पाँच महत्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हुए हैं। वे भारतीय संगीत एवं नाटक अकादमी द्वारा ‘गुरु’ की उपाधि से भी सम्मानित हैं एवं वर्तमान में विभिन्न विद्यार्थियों को लोककला में पारंगत कर रहे हैं। एक दल से अपनी यात्रा प्रारंभ करने वाले श्री धुर्वे जी आज 100 से अधिक दलों को अपने मार्गदर्शन में प्रशिक्षित कर चुके हैं।
व्याख्यानों के पश्चात आमंत्रित लोक कलाकारों ने बैगा जनजाति के प्रमुख नृत्य “करमा” एवं “फाग” नृत्य की प्रस्तुति देकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। समारोह में महाविद्यालय द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। पहली पुस्तक ‘कीर्ति’ नामक पत्रिका है, जिसमें विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत साहित्यिक कृतियों का संकलन किया गया है। दूसरी पुस्तक महाविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार ‘विकसित भारत 2047’ में प्रस्तुत आमंत्रित शोध-पत्रों के आधार पर प्रकाशित की गई है। कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग की डॉ. सीमा जैन ने किया एवं आभार प्रदर्शन संस्कृत विभाग की डॉ. प्रीति श्रीवास्तव द्वारा किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थीगण एवं नगर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।



