कालाबाज़ारी का असली कारण हमारी मानसिकता ?

कालाबाज़ारी का असली कारण हमारी मानसिकता ?
भारत में अक्सर जब किसी जरूरी वस्तु की कमी की खबर फैलती है, तो असली समस्या उस वस्तु की कमी नहीं होती, बल्कि समाज की मानसिकता होती है। जैसे ही यह सुनने में आता है कि किसी चीज़ की सप्लाई कम हो सकती है, बाजार से ज्यादा तेजी लोगों के दिमाग में घबराहट फैलती है। और यही घबराहट धीरे-धीरे कालाबाजारी की सबसे बड़ी वजह बन जाती है।
हमारे समाज में एक अजीब प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जिन लोगों के पास पहले से पर्याप्त साधन और संसाधन होते हैं, वही लोग सबसे पहले बाजार में दौड़ लगाते हैं। जरूरत हो या न हो, वे अतिरिक्त सामान खरीदकर घर में जमा करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि अगर अभी नहीं खरीदा तो शायद बाद में नहीं मिलेगा।
गैस सिलेंडर का उदाहरण इस स्थिति को बहुत साफ तरीके से समझाता है। कई घरों में पहले से दो सिलेंडर रखे होते हैं, लेकिन जैसे ही शॉर्टेज की खबर फैलती है, वही लोग तीसरा और चौथा सिलेंडर भी खरीदकर घर में जमा कर लेते हैं। नतीजा यह होता है कि बाजार में अचानक सिलेंडरों की कमी दिखाई देने लगती है।
इस कृत्रिम कमी का सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों को होता है जिन्हें वास्तव में गैस की जरूरत होती है। गरीब और मध्यम वर्ग के कई परिवार ऐसे होते हैं जिनके घर में गैस खत्म हो चुकी होती है, लेकिन उन्हें सिलेंडर नहीं मिल पाता। एजेंसियों के बाहर लाइनें लग जाती हैं और लोग कई-कई दिनों तक इंतजार करते रहते हैं।
इसी स्थिति का फायदा कुछ दुकानदार और बिचौलिये उठाने लगते हैं। वे सामान छिपाकर रखने लगते हैं और फिर ऊंचे दामों पर बेचते हैं। यही वह बिंदु होता है जहां से कालाबाजारी शुरू होती है। लोग मजबूरी में ज्यादा पैसे देकर वही सामान खरीदते हैं जो सामान्य परिस्थितियों में आसानी से मिल सकता था।
दरअसल, वस्तुओं की कमी से ज्यादा बड़ी समस्या लालच और भय की मानसिकता है। अगर समाज का हर व्यक्ति अपनी जरूरत के हिसाब से ही सामान खरीदे, तो बाजार में इतनी बड़ी समस्या पैदा ही नहीं होगी। लेकिन जब लोग जरूरत से ज्यादा जमा करने लगते हैं, तो बाजार का संतुलन बिगड़ जाता है।
भारत में यह प्रवृत्ति नई नहीं है। चाहे वह प्याज की कीमतों का मामला हो, पेट्रोल-डीजल की अफवाह हो या फिर गैस सिलेंडर की बात हो, हर बार यही स्थिति देखने को मिलती है। अफवाह फैलते ही लोग दुकानों की तरफ दौड़ पड़ते हैं और जरूरत से ज्यादा खरीदारी शुरू कर देते हैं।
इसका असर सिर्फ बाजार पर ही नहीं पड़ता, बल्कि समाज की समानता पर भी पड़ता है। जिनके पास पैसे और साधन होते हैं, वे आसानी से चार-चार सामान खरीदकर रख लेते हैं, लेकिन जिनके पास सीमित संसाधन होते हैं, वे अपनी बारी का इंतजार ही करते रह जाते हैं।
अगर सच में इस समस्या को खत्म करना है, तो सिर्फ सरकार या प्रशासन पर दोष डालने से काम नहीं चलेगा। समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जरूरत से ज्यादा सामान खरीदना बंद करना होगा और दूसरों के हक का ख्याल रखना होगा।
जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक हर शॉर्टेज के साथ कालाबाजारी भी पैदा होती रहेगी। इसलिए जरूरी है कि हम समझें कि बाजार में संकट वस्तुओं की कमी से नहीं, बल्कि इंसान की आदतों और लालच से पैदा होता है।



