नीमच के शिल्पकार ने जूट और प्राकृतिक रंगों से उकेरी प्रधानमंत्री जी की ममतामयी छवि

विकसित भारत’ का प्रतिबिम्ब:
नीमच के शिल्पकार ने जूट और प्राकृतिक रंगों से उकेरी प्रधानमंत्री जी की ममतामयी छवि
नीमच -, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान ने देश के सुदूर गांवों में छिपी प्रतिभाओं को एक नई वैश्विक पहचान दी है। इसका एक अनुपम उदाहरण मध्य प्रदेश के नीमच जिले के कुंचड़ोद गाँव में देखने को मिला है। यहाँ एक उभरते शिल्पकार, राहुल कुमार लोहार ने जूट की बोरी और प्रकृति प्रदत्त रंगों के माध्यम से प्रधानमंत्री जी और उनकी पूज्य माताजी की एक कलाकृति तैयार की हैं। यह कलाकृति ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ के उन दूरदर्शी लक्ष्यों को चरितार्थ करती है, जहाँ पारंपरिक हुनर को आधुनिक संकल्पों से जोड़ा जा रहा हैं।पारंपरिक कौशल और सरकारी योजनाओं का सफल समन्वय
राहुल लोहार की यह कलाकृति सिद्ध करती है कि जब सरकारी योजनाओं का विजन और जमीन से जुड़े कलाकार का हुनर आपस में मिलते हैं, तो परिणाम असाधारण होते हैं। इस निर्माण में शून्य प्लास्टिक और शून्य सिंथेटिक सामग्री का संकल्प लेकर कलाकार ने पर्यावरण संरक्षण का भी बड़ा संदेश दिया है। उन्होंने आधार के रूप में जूट (टाट) का चयन किया और उस पर ग्रामीण भारत की प्राचीन ‘लिपाई’ पद्धति (गोबर, पीली मिट्टी और मेथी चूर्ण का मिश्रण) का प्रयोग किया। यह प्रयास दर्शाता है कि कैसे ‘पीएम विश्वकर्मा’ समुदाय अपने पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित रखते हुए देश की विकास यात्रा में भागीदार बन रहा हैं।
प्रकृति की गोद से सृजित स्वदेशी रंग
इस चित्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ‘इको-फ्रेंडली’ तकनीक और स्वदेशी संसाधनों का उपयोग हैं। राहुल ने रासायनिक रंगों के स्थान पर प्रकृति से सीधे प्राप्त रंगों का चयन कर ‘लोकल’ संसाधनों की महत्ता बताई है:
केसरिया व लाल: केवड़े के फूलों के अर्क से तैयार किए गए।
स्वर्णिम पीला: पियावड़ी पत्थर और मिट्टी के प्राकृतिक मिश्रण से।
काला व सफेद: लकड़ी के कोयले और चूना पत्थर के बारीक पाउडर से।
स्थायित्व: प्राकृतिक गोंद के माध्यम से इन जैविक रंगों को सहेजा गया है।
हुनर को सम्मान: आत्मनिर्भरता का नया अध्याय।
यह कलाकृति केवल एक चित्र नहीं, बल्कि ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ की सफलता का एक जीवंत प्रमाण है। यह इस बात का प्रतीक है कि योजना के अंतर्गत मिल रहे प्रोत्साहन से ग्रामीण शिल्पकार अब अपने पारंपरिक संसाधनों के साथ भी राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर रहे हैं। शिल्पकार राहुल कुमार लोहार का कहना है, “प्रधानमंत्री जी ने हम जैसे पारंपरिक कारीगरों को ‘विश्वकर्मा’ की संज्ञा देकर जो सम्मान दिया है, उसी गौरव ने हमें कुछ नया और स्वदेशी करने की प्रेरणा दी है। यह कलाकृति उसी आत्मनिर्भर संकल्प और शिल्पकारों के प्रति उनके सम्मान के प्रति मेरी एक छोटी सी भेंट है।”



