अंतरजातीय विवाह को लेकर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी का क्या विचार हैं?

अंतरजातीय विवाह को लेकर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी का क्या विचार हैं?
भारत के लिए घातक है, विश्व के लिए घातक है, मानवता के लिए अभिशाप है। इसको प्रश्रय देना महापाप है। जनसंख्या की दृष्टि से भी हिन्दुओं के अस्तित्व पर प्रहार है। और वैदिक संस्कृति का विनाश है, हिन्दुत्व के नाम पर अभिशाप है।
गीता के पहले अध्याय में अर्जुन की आशंका थी, अर्जुन ने वेदना व्यक्त की—वर्णसंकरता के चपेट में हमारा वंश न आ जाए।
गीता के तीसरे, चौथे अध्याय के अनुसार विचार कीजिए, भगवान श्रीकृष्ण ने चिंता व्यक्त की—कर्मसंकरता भारत में न छा जाए।
वर्णसंकरता और कर्मसंकरता के चपेट से अगर हम देश को बचाए रखेंगे, तो हमारे अस्तित्व और आदर्श की रक्षा होगी। मैं एक उदाहरण देता हूँ… यह भूदंड हैं, भूदंड किस विश्वविद्यालय में इनको यह प्रशिक्षण दिया गया कि शरीर के किसी अवयव पर वार की संभावना हो तो टूटने-फूटने की चिंता मत करो, क्यों हो जाओ?
परंपरा-प्राप्त निसर्ग-सिद्ध संस्कार संवृत यह भूदंड हैं। वयस निर्माण में अहंकार सो जाता है, आज्ञा भूदंड को देने वाला कोई रहता नहीं। लेकिन उस समय भी मच्छर काटने आते हैं, यह भूदंड अपने दायित्व का संस्कार के बल पर निर्वाह करके वहाँ पहुँच जाता है। और मच्छर अगर चपेट में आ गए तो कचूमर निकाल देता है, मच्छर भाग गए तो खुजला ही देता है।
इसलिए वैकल्पिक ब्राह्मण वहाँ होना चाहिए—अमेरिका, ब्रिटेन में, जहाँ परंपरा-प्राप्त ब्राह्मण नहीं। विकल्प तो विकल्प होता है जी, अल्टरनेटिव तो अल्टरनेटिव होता है। अब जितने वैकल्पिक ब्राह्मण हैं, वही ब्राह्मणत्व के विध्वंसक हैं या नहीं?
और पुलिस व मिलिट्री जितने क्षत्रियों के विकल्प हैं, यही रक्षा के लिए घातक हैं या नहीं? उद्योगपति यह वैश्यों के विकल्प निकलते गए, यह हमारे अर्थशास्त्र की दृष्टि से अभिशाप हैं या नहीं? और यह कौन हैं… क्रिश्चियन मिशन सेवा के विकल्प हैं, इन्हीं के द्वारा भारत का पतन हो रहा है या नहीं?
मेरा कोई विकल्प निकाल के दिखाइए न! मैं शंकराचार्य हूँ, मेरे विकल्प दलाई लामा जी होंगे या पोप होंगे? हम लोग निर्विकल्प हैं, हमारा विकल्प नहीं होता है।
हाँ, एक उदाहरण देता हूँ। खानदानी क्षत्रिय दो थे—कौन? राम जी और लक्ष्मण जी अयोध्या से। सीता जी का अपहरण हो चुका था। देवता सुंदर भाट के रूप में आए थे। वैकल्पिक क्षत्रियों ने खानदानी परंपरा-प्राप्त क्षत्रियों के अनुकूल होकर युद्ध जीता और राम जी को राजलक्ष्मी सौंपी। राम जी की उदात्त भावना थी कि उन्होंने विभीषण को सौंपा। वैकल्पिक, परंपरा-प्राप्त के अनुगत होकर काम करें तो ठीक है।
मेरी बात छोड़ दीजिए, डॉ. इब्राहिम जी, जिनके आधार पर उधर के नारायण दत्त तिवारी जी हों या कोई हों, जब कहा जाता कि रक्त का परीक्षण होगा कि आपका सचमुच में यह पुत्र है या नहीं, वह किसकी थ्योरी है? इब्राहिम की। उसने कहा जहाँ वर्णसंकरता छा गई, वहाँ तो लाचारी है। भारत के व्यक्ति कम से कम रक्त को शुद्ध रखें।
मैंने बताया कि वैकल्पिक अगर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनाएँगे, उनके प्रशिक्षण में समय अधिक लगेगा, संपत्ति अधिक लगेगी, फिर भी संस्कार का आधान नहीं हो सकेगा। और पाँचवें, चौथे कॉलम पर आना कोई पसंद नहीं करेगा, पहले दूसरे या पहले कॉलम में ही लाखों व्यक्ति भर जाएँगे। पूरे देश की शिक्षा प्रणाली, अर्थव्यवस्था, रक्षा की प्रणाली, सेवा की प्रणाली सब चरमरा जाएगी। सनातन वैदिक आर्ष सिद्धांत वह है जहाँ जन्म से सबकी जीविका आरक्षित है।
जन्म से सबकी जीविका आरक्षित है, इससे बढ़िया अर्थशास्त्र क्या हो सकता है? बुरा न मानो, होली है।
साभार – कर्मकाण्डी ब्राह्मण बंधु सोशल मीडिया https://www.facebook.com/share/p/1DCnpR4NNT/ से
#हिन्दूराष्ट्र #गो_हत्या_बंद



