खिराज-ए-अकीदत: 19 जुलाई कवि, लेखक, पत्रकार मरहूम मिर्जा आबिद बेग साहब

खिराज-ए-अकीदत: 19 जुलाई कवि, लेखक, पत्रकार मरहूम मिर्जा आबिद बेग साहब
शाहरूख मिर्ज़ा की क़लम से ✍️
आज मेरे वालिद, मेरे उस्ताद, मेरे रहनुमा मरहूम मिर्जा आबिद बेग साहब को इस दुनिया से रुख़्सत लिए 5 साल हो गए। मगर वक्त चाहे कितना भी बीत जाए, उनकी यादें, उनका किरदार, उनकी सीख—आज भी मेरे साथ सांस लेती हैं। कहते हैं, विरासत में हमेशा दौलत नहीं मिलती, कभी-कभी ऐसी ज़िम्मेदारियाँ मिलती हैं जो एक रौशनी की तरह जिंदगी भर राह दिखाती हैं। मेरे वालिद की क़लम, उनका अदब, और उनका सच्चा इंसानी जज़्बा आज भी मेरे लिए एक मिशाल है।
मेरा मकसद यह पोस्ट कर के हमदर्दी हासिल करना नहीं,बल्कि लोगों को ये एहसास दिलाना है कि माँ-बाप का साया कितना क़ीमती होता है। उनके बाद इंसान तन्हा नहीं होता, मगर अधूरा ज़रूर हो जाता है। मेरे वालिद आज भी मेरे साथ हैं—उनकी बातें, उनकी दुआएं, उनका इल्म, उनकी यादें मेरे साथ चलती हैं हर रोज़, हर पल।
अल्लाह से दुआ है:कि मेरे वालिद मरहूम मिर्जा आबिद बेग कवि लेखक पत्रकार साहब की मग़फिरत फरमाए,उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मुक़ाम अता करे।
आमीन सुम्मा आमीन
शाहरूख मिर्ज़ा– मंदसौर मध्यप्रदेश


