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कर्म की अकाट्य गति: पाप किसी का सगा नही

कर्म की अकाट्य गति: पाप किसी का सगा नही

लेखक: ज्योतिषाचार्य पंडित यशवंत जोशी

(जय दुर्गा ज्योतिष सेवा संस्थान एवं अनुष्ठान केंद्र, मंदसौर)

मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह सुख की कामना तो करता है, लेकिन कर्म करते समय विवेक खो बैठता है। आज के भौतिकवादी समाज में एक भ्रामक धारणा बन चुकी है कि चालाकी, धन या पद के बल पर गलत काम करके भी बचा जा सकता है। परंतु सनातन दर्शन और प्रकृति का अचूक नियम कहता है— “पाप किसी का बाप नहीं होता; अपने द्वारा किया हुआ पाप कब, कहाँ और किस मोड़ पर चोट पहुँचाएगा, यह कोई नहीं जानता।”

शास्त्रों के अनुसार, पाप कर्म एक ‘टाइम बम’ की तरह होता है। जब कोई व्यक्ति अधर्म या छल करता है, तो तात्कालिक सफलता देखकर उसे भ्रम हो जाता है कि वह बच गया। लेकिन जब तक मनुष्य के पूर्व संचित पुण्य प्रबल रहते हैं, तब तक पाप का फल छुपा रहता है; जैसे ही पुण्यों का कोष क्षीण होता है, वही पुराना पाप अप्रत्याशित रूप से सामने आकर गहरा आघात करता है।

इस सार्वभौमिक सत्य को पुष्ट करते हुए महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है:

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्।

तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥

अर्थ: जिस प्रकार हजारों गायों के झुंड में भी एक छोटा सा बछड़ा अपनी वास्तविक माता को ढूंढ ही लेता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य द्वारा किया गया कर्म (पाप या पुण्य), संसार की विशाल भीड़ में अपने कर्ता को ढूंढते हुए उसके पास पहुंच ही जाता है।

इतिहास गवाह है कि चक्रवर्ती सम्राट महाराजा दशरथ से अनजाने में हुए श्रवण कुमार के वध का फल उन्हें जीवन के उस अंतिम मोड़ पर ‘पुत्रवियोग’ के रूप में भुगतना पड़ा, जब श्री राम का राज्याभिषेक होने वाला था। प्रकांड पंडित रावण का अहंकार और पर-स्त्री हरण उसके समूल वंश के नाश का कारण बना।

व्यावहारिक जीवन में भी किसी निर्बल को सताकर या अधर्म से कमाया गया धन अंततः गंभीर बीमारी, अदालती मामलों या संतान के पतन के रूप में आत्मिक चोट पहुँचाता है। संसार की अदालत से तो बचा जा सकता है, लेकिन नियति की अदालत से नहीं।

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने स्पष्ट लिखा है— “कर्म प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥”

कर्म बंधन से बचाव कैसे?- यदि हम जीवन के किसी भी अज्ञात मोड़ पर अनपेक्षित आघात से बचना चाहते हैं, तो हमें अपने आचरण के प्रति सजग होना होगा। पाप का कोई रक्षक नहीं होता, वह अपना हिसाब चुकता करके ही रहता है।

इस कर्म-चक्र के संकटों से बचने का एकमात्र अचूक मार्ग आदिशक्ति मां भगवती की शरण है। माताजी की निष्काम भक्ति मनुष्य के संचित पापों का शमन कर जीवन में वास्तविक सुख, शांति और सुरक्षा प्रदान करती है। क्योंकि मां की कृपा ही जीव के प्रारब्ध को बदलने और उसे सही मार्ग पर ले जाने की सामर्थ्य रखती है।”

अतः धर्म, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलना और जगदम्बा आदि शक्ति कि भक्ति ही जीवन का वास्तविक सुरक्षा कवच है।

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