बेटियां बनीं पिता का सहारा, अंतिम यात्रा में निभाया बेटे से बढ़कर फर्ज

बेटियां बनीं पिता का सहारा, अंतिम यात्रा में निभाया बेटे से बढ़कर फर्ज
बेटी होकर घोड़ी पर बैठकर बनौरी निकालने में जितनी हिम्मत चाहिए, उससे कहीं ज्यादा साहस चाहिए अपने पिता के पार्थिव शरीर को कंधों पर उठाकर 45 डिग्री की तपती गर्मी में श्मशान तक ले जाने का।घोड़ी पर बैठते समय पिता का हाथ बेटी के सिर पर होता है, वही हाथ उसकी हिम्मत और सुरक्षा का प्रतीक बन जाता है। लेकिन जब वही साया हमेशा के लिए सिर से उठ जाए, तब खुद को संभालते हुए समाज के सामने साहस की मिसाल पेश करना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
रामगढ़ तहसील के बागास गांव में ऐसा ही भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। गांव के ओमप्रकाश बॉयल, जो डीडवाना की एक फैक्ट्री में मुनीम थे, हृदयाघात के कारण महज 48 वर्ष की उम्र में दुनिया छोड़ गए। सूचना मिलते ही उनकी बेटी शिवानी, जो नर्सिंग की छात्रा है, अस्पताल पहुंच गई थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
ओमप्रकाश जी की दो बेटियां हैं — बड़ी बेटी अन्नू बीएड की पढ़ाई कर रही है, जबकि छोटी बेटी शिवानी नर्सिंग की छात्रा है। पिता के निधन के बाद दोनों बेटियों ने बेटे का फर्ज निभाते हुए न सिर्फ अंतिम यात्रा में कंधा दिया, बल्कि पूरे साहस और सम्मान के साथ पिता को अंतिम विदाई भी दी।
आज इन बेटियों ने साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं। इनके साहस, संस्कार और हिम्मत को हर कोई सलाम कर रहा है।



