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देश में वर्ष 2014 के बाद से लगातार सवर्ण समाज का एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा

देश में वर्ष 2014 के बाद से लगातार सवर्ण समाज का एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा

प्रफुल्ल शुक्ला गुढ़✍️✍️

देश में वर्ष 2014 के बाद से लगातार भारतीय जनता पार्टी (NDA) की सरकार रही है। इस पूरे कालखंड में सवर्ण समाज का एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा।

भाजपा के सत्ता में आने के साथ ही सवर्ण समाज ने उसे स्वाभाविक रूप से अपना हितैषी मान लिया।

हिंदू–मुस्लिम तथा मंदिर–मस्जिद जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द बनी राजनीति को सवर्ण समाज के एक बड़े हिस्से ने वैचारिक समर्थन भी दिया, जिसके परिणामस्वरूप भाजपा ने धार्मिक मुद्दों के सहारे अपना जनाधार मजबूत किया और लगातार चुनावी सफलता प्राप्त की।

सवर्ण समाज को यह अपेक्षा थी कि भाजपा सत्ता में आकर उन विषयों पर काम करेगी, जिन्हें कांग्रेस सरकारें दशकों तक सुलझा नहीं पाईं। इसी विश्वास के साथ सवर्ण समाज के विशाल वर्ग ने भाजपा को समर्थन दिया।

किन्तु समय के साथ यह भावना गहराती गई कि धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक उपयोग के बावजूद, सवर्ण समाज के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक हितों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।

मैं स्वयं ब्राह्मण हूँ और सनातन संस्कृति में पूर्ण आस्था रखता हूँ, किंतु यह स्पष्ट कहना आवश्यक है कि सनातन होना किसी राजनीतिक दल का अनिवार्य समर्थक होना नहीं होता।

राजनीतिक समर्थन विश्वास और नीतियों के परिणामों से तय होता है, न कि केवल धार्मिक या जातीय पहचान से।

हाल के वर्षों में सवर्ण समाज के भीतर यह एक गंभीर विचार का विषय बन गया है कि नीतिगत निर्णयों में उसकी समस्याएँ लगातार उपेक्षित हो रही हैं।

इसी संदर्भ में 13 जनवरी 2026 को यूजीसी द्वारा जारी किए गए गजट/दस्तावेज पर समाज का ध्यान जाना आवश्यक है। इस दस्तावेज का घोषित उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में जातिगत भेदभाव को रोकना है, जो अपने आप में एक सकारात्मक उद्देश्य है।

किन्तु इस दस्तावेज के कुछ प्रावधानों को लेकर सवर्ण समाज में गंभीर आशंकाएँ उत्पन्न हुई हैं। विशेष रूप से पाँचवें बिंदु को लेकर यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि भेदभाव की निगरानी के नाम पर बनाई जाने वाली समितियाँ यदि पक्षपातपूर्ण या चयनात्मक दृष्टि अपनाती हैं, तो यह सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए उत्पीड़न, दबाव और मानसिक तनाव का कारण बन सकता है।

यदि ऐसे नियमों का क्रियान्वयन संतुलन और निष्पक्षता के बिना हुआ, तो यह सामान्य वर्ग के छात्रों की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और शैक्षणिक वातावरण को प्रभावित कर सकता है।

इसी कारण सवर्ण समाज में यह भावना प्रबल हो रही है कि उनके अधिकारों का क्षरण हो रहा है, जबकि वे अब भी इस विषय पर संगठित और सजग प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सवर्ण समाज कुंभकर्णीय निद्रा से जागे, भावनाओं से नहीं बल्कि विवेक से सोचे, और लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपने अधिकारों, सम्मान और भविष्य को लेकर प्रश्न उठाए।

यदि समय रहते संतुलित संवाद और न्यायपूर्ण नीति-निर्माण नहीं हुआ, तो यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि आने वाले समय में सवर्ण समाज अपने ही देश में हाशिये पर धकेला हुआ महसूस कर सकता है।

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