जानिये क्या है कावड़ यात्रा का इतिहास.. कावड़ का जल पाकर महादेव आशुतोष बन जाते हैं… तुरन्त फल देते हैं..

जानिये क्या है कावड़ यात्रा का इतिहास.. कावड़ का जल पाकर महादेव आशुतोष बन जाते हैं… तुरन्त फल देते हैं..

– ब्रजेश जोशी
समाजसेवी एवं वरिष्ठ पत्रकार मंदसौर
श्रावण माह देवों के देव महादेव का माह है। महादेव की आराधना के यों तो अनेक माध्यम है किंतु यहां कावड़ यात्रा के बारे में बात की जा रही है। आखिर कावड़ यात्रा का शिव आराधना से क्या संबंध है… क्या है कावड़ यात्रा का इतिहास.. और यह केवल श्रावण मास में ही क्यों निकाली जाती है यह तमाम प्रश्न मस्तिष्क में इसलिए उभरते हैं क्योंकि पिछले कुछ दशकों से देखा जा रहा है कि सावन माह में पूरे देश में कावड़ यात्राओं का एक दौर सा शुरू हो जाता है। जहां-जहां भी महादेव के बड़े पूजन स्थल हैं मन्दिर हैं द्वादश ज्योतिर्लिंग है वहां कावड़ यात्राओं सिलसिला थमता ही नहीं..!
कावड़ यात्रा का इतिहास बहुत पुराना है इसका उल्लेख पुराणों से मिलता है। पौराणिक कथा में बताते हैं सबसे पहली कावड़ यात्रा भगवान श्रीराम ने निकाली थी। श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कावड़ में बिठाकर तीर्थ कराए थे और भगवान श्री परशुराम जी ने भी कावड़ से गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत के पुरा महादेव पर जलाभिषेक किया था। रावण से जुड़ी कथा कुछ मान्यताओं के अनुसार रावण ने कावड़ यात्रा शुरू की थी। वह गंगा जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाता था।
इतिहासकारों के अनुसार, कावड़ यात्रा की शुरुआत समुद्र मंथन के प्रसंग से जुड़ी है जब विष पीने से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया, तो उनके ताप को शांत करने के लिए देवताओं ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया। तभी से श्रावण मास में गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा बनी।
आज के रूप में श्रावण मास में लाखों भक्त हरिद्वार, गोमुख, गंगोत्री से जल लाते हैं। अपने गांव शहर के शिव मंदिरों में जाकर उस जल से भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं।
बोल बम का उद्घोष इसी यात्रा की पहचान है।
कावड़ का मतलब होता है – कंधे पर रखने वाला बांस का डंडा जिसमें दोनों तरफ लटकी हुई टोकरियों में जल की कलश रखी जाती है। कुछ ग्रंथों में कावड़ यात्रा का संबंध केवल महादेव शिव से ही क्यों है इसके कारण बताए हैं तदनुसार समुद्र मंथन का प्रसंग जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है वह तो है ही । चूंकि महादेव के कंठ को जल से बहुत शीतलता मिलती है उन्हें अच्छा लगता है यह एक भवाभिव्यक्ति है अपने आराध्य को जिस वस्तु से सबसे अधिक अच्छा लगे वही भक्त करना चाहते हैं।
शिव ही हैं जल के धारणकर्ता गंगा जी खुद उनकी जटाओं में रहती हैं। तो गंगाजल सीधे गंगाधर शिव को चढ़ाना सबसे पवित्र माना गया। श्रावण मास और महादेव के संबंध के बारे में तो क्या कहना श्रावण महीना उन्हें बहुत प्रिय है। इसी महीने में माता पार्वती ने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए तप किया था। इसलिए इस महीने में किया गया जलाभिषेक बहुत फलदायी माना जाता है।
शिव हैं आशुतोष अर्थात जल्दी प्रसन्न हो कर फल देने वाले देव..! होने वाले शिव जी को केवल एक लोटा जल चढ़ाने से ही वे प्रसन्न हो जाते हैं। कोई बड़ा खर्च या पूजा विधि नहीं चाहिए। कावड़िये पैदल चलकर, कष्ट उठाकर जल लाते हैं – ये उनकी सच्ची भक्ति और तपस्या है, जो आशुतोष शिव को बहुत प्रिय है। इसलिए मान्यता है कि वे कावड़ यात्रियों की मनोकामनाएं उनके कष्ट तत्काल पूरी करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि विष्णु जी को भोग प्रिय है, देवी को श्रृंगार प्रिय है, पर शिव जी को जल प्रिय है। इसी कारण कावड़ यात्रा केवल शिव आराधना से जुड़ी है।



