
शासन प्रशासन की निरंतर उपेक्षा का शिकार यह स्थान
रिपोर्टर राजेन्द्र देवड़ा और कालुराम परमार
आलोट। रतलाम जिले की आलोट तहसील मुख्यालय से 6 किलोमीटर दूर धरोला में स्थित अनादिकल्पेश्वर महादेव,
आलोट के नाम से एक दंतकथा है कि भूतकाल में यह क्षेत्र गहने जंगल में था एवं आलोट नगर जूना बाजार रावले में बसा था। जूना बाजार से रेल्वे स्टेशन 3 किमी था तथा रेल्वे स्टेशन से पैदल गहने जंगल में होकर जाना पड़ता था। जंगल होने के कारण क्षेत्र की जनता में भय बना रहता था। यहा एक आल्हा नामक आदिवासी लूटेरा राहगीरों के साथ लूटपाट एवं मारपीट कर अपनी जीविका चलाता था। इसका इस क्षेत्र में आतंक था।इसी कारण इस क्षेत्र को आल्हालूट नाम से जाना जाने लगा। कालांतर में अपभ्रंश होकर यह नाम आलुट एवं आलुट से आलोट हो गया।
आलोट श्री अनादिकल्पेश्वर महादेव आलोट के इतिहास के संबंध में अनेकानेक किंवदंतियां प्रचलित है किन्तु ठोस प्रमाणों के अभावों में दंतकथा प्रायः बनकर रह गई। यद्यपि इस स्थान की प्राचीनता के विषय में कोई संदेह नही तथापि स्थानीय देखरेख में मंदिर का स्वरुप बदलता जा रहा है। इस स्थान का कोई लिखित स्थान सुरक्षित नहीं है और यदि कही हो तो यह जनमानस तक नहीं पहुंच पाया है। संवत 2030 में एक स्थानीय प्रतिभा स्व. श्री नर्मदाशंकर जी वेद व्यासजी द्वारा सुमन पंचक नामक काव्य संकलगन की संरचना की गई, जिसे गीता रामायण शिक्षा प्रचार भवन विक्रमगढ़ आलोट द्वारा मुद्रि कर प्रकाशित किया गया था। प्रथम संस्करण में इसकी एक हजार प्रतियां मुद्रित की गई थी, किन्तु दुर्भाग्यवश इस काव्य संकलगन की बमुश्किल 5-6 प्रतियां ही शेष बची होगी। सन् 1991-92 में इस संकलन को जब स्थानीय महाविद्यालय के प्रोफेसर डॉ शैलेन्द्र शर्मा हिंदी विभाग विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन थे, ने इसे पढ़ा तब इस रचना का स्तर एवं महत्व आलोट के कुछ प्रबुद्धजन समझ पाए,
किन्तु तब तक समय हाथ से निकल चुका था। इस रचना को महत्व प्रतिपादित करने का संपूर्ण श्रेय प्रो. शैलेन्द्र शर्मा एवं प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ.श्री श्यामसुंदर निगम उज्जैन को जाता है। यहां सुमन पंचक से अवतरित कुछ अंश प्रस्तुत है जो अनादि कल्पेश्वर की भौगोलिक पृष्ठभूमि के साथ साथ प्राकृतिक आयुर्वैदिक से सुरशोदिक सुरक्षित स्थान में एक है। धार्मिक एवं ऐतिहासिक तथ्यों प्रमाणों एवं महत्व को दंशति है। यह स्थान दिल्ली – मुंबई बड़ी रेल्वे लाईन पर विक्रमगढ़ आलोट नामक रेल्वे स्टेशन से तीन किमी दूर है।इसी रेल्वे स्टेशन से लगभग 12 किमी दूर स्थित नागेश्वर मंदिर जो जैन समाज का विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है जहां दूर दूर से गुजरात दिल्ली बाम्बे और अन्य राज्यों के दर्शनार्थी यात्रियों का आवागमन आलोट होकर ही बना रहता है। दक्षिण पूर्व में स्थित अनादिकल्पेश्वर महादेव के इस स्थान की विशेषता यह है कि इसके परिसर की धरातलीय बनावट विशेष प्रकार कि है।जो आसपास के सैकड़ों किमी के क्षेत्र में भी देखने को नहीं मिलती।यहा पर्वत मैदान अपार जलराशि भंडार संघन वनस्पति अज्ञात आयुर्वेदिक औषधि भंडार सभी के दर्शन एक साथ होते थे शासन प्रशासन की उपेक्षा के कारण अत्यंत दुर्लभ है। यहां कनक पर्वत के नाम से विख्यात पर्वत की चट्टानें गहरे भरे रंग की है तथा वरषाऋतु में देखते ही बनता है। आकृति वाली ये चट्टाने अनेक प्रकार के वृक्षों के बीच ऐसी प्रतीत होती हैं मानो बादलों को परमात्मा ने स्वर्ण रंग से रंग दिया हो। इस स्थान की भोगौलिक स्थिति का बखान करते यह स्थान प्राकृतिक एवं आदिकाल से है और आयुर्वेदिक संपदा का धनी रही है , परंतु वर्तमान आपाधापी के युग में यहा दुर्लभ वृक्ष कट गए हैं तथा यह स्थान दिन प्रतिदिन विरान होता जा रहा है। यहा की प्रसिद्ध का एक कारण कलेवर कुण्ड रहा है। जिससे कुछ वर्षों पूर्व गौमुखी के रूप में जलधारा निरंतर बिना किसी उपकरण के चलता था। श्याम वर्ण जल सर्वव्याधिनाशक था ऐसी गुणीजनो का मत है। यह स्थान यात्रियों के विश्राम साधुओं के लिए तप, मृतकों के लिए मुक्ति एवं पर्यटकों के लिए पर्यटन का केंद्र रहा है। इस कुण्ड के नीचे एक हरित वर्षजल का तालाब है जिसके चारों ओर घाट नर नारियों के स्नानगार थे। जो वर्तमान में अल्पवृष्टि तथा अनावश्यक छेड़छाड़ का शिकार यह कुंड गहरे जल संकट के चलते ऐसा हो गया है जैसे बिना आत्मा के मनुष्य हो। इस सरोवर के पूर्वी घाट पर एक अतिप्राचीन शिव मंदिर है। जिसकी बनावट एवं प्राचीन भारतीय स्थापत्यकला जीवंत एवं बेजोड़ उदाहरण शैली की आकृतियों से निर्मित इस मंदिर को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर ध्वस्त किए गए थे मंदिर की काहानियां दोहराती नजर आती है। एक यति इस मंदिर को उड़ाकर लाया था तथा इस स्थान पर यहा इसे प्रति स्थापित कर दिया भगवान अनादिकल्पेश्वर महादेव मंदिर पर।
प्राची दिया मंदिर अति सुन्दर अतिहि पुरातत्व गोरी शंकर पश्चित घाट के समीप एक दत्तात्रेय भगवान का मंदिर है, जिसकी स्थापना दंडी स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के द्वारा की गई है। स्वामीजी महाराष्ट्ररीयन संस्कृति को मानते थे संभवत गुरु गोरखनाथ के संप्रदाय से थे। मराठा संस्कृति का आलोट पर विशेष प्रभाव रहा है जो आज भी देखने को मिलता है। आजादी के पूर्व यह क्षेत्र मराठा साम्राज्य की धरोहर रहा है । देवास जुनियर स्टेंट के अंर्तगत पंवारो के राज्य का एक हिस्सा रहा है। आलोट नगर के मध्य में विठ्ठल भगवान का मंदिर होना वहां मराठी अभंग गाया जाना तथा अनादिकल्पेश्वर से निकली जाने वाली भगवान शंकर की सवारी की शैली तथा उसकी तिथि इस बात को पुष्ट तथा प्रमाणित करती है। स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती रचित अभय आज भी महाराष्ट्रीयन परिवारों में पाए जाते हैं। मूल मंदिर के समीप पीपल के वृक्ष के नीचे सुंदर स्तंभो पर बनी रखीं थीं आकृति जिसे तुला मानना जाता था कि विषय में यहा एक दंतकथा प्रचलित है कि राजा नल एवं रानी दमयंती यहा स्वर्णदान किया करते थे। इस प्रकार राजा शिबि द्वारा कबूतर शरीर का मांस काटकर तौला गया था । व्यासजी की ये पंक्तियां इसमें संदेह उत्पन्न करती है। अनादिकालेश्वर क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, कनक पर्वत पर पवनपुत्र संकटमोचन, रामदूत हनुमान विराजित हैं। उक्त पर्वत पर कुछ प्राकृतिक आकृतियां बनी हुई है जो आज भी देखी जा रही है जिन्हें हनुमान जी के पैरों की ऐडी तथा अंगूठों का निशान बना है। जहां श्रद्धालु पूजते हैं। यहां एक फलहारी संन्यासी हुआ करते थे जिन्होंने लोककल्याण के लिए इस स्थान पर कई यज्ञ करवाएं एवं मंदिर के आसपास नाना प्रकार के सुगंधित पौधे तथा वृक्ष लगकर स्थान को प्रिय बनाया था। उनकी समाधि यहां स्थित है। यहां श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं मंदिर के पश्चित भाग में एक स्थान है जहां प्रतिवर्ष धुलेंडी कों चूल चलती है। सुमन पंचक के अनुसार ऐसी मान्यता है कि भक्त प्रहलाद के प्रति आस्था रखाकर जो भी श्रद्धालु इस चूल के जलते अंगारों पर फलों की नाई चलाता है।उसे समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। चूल के पास ही मैदान में अनेक छोटी छोटी मूर्तियां स्थापित हुआ करती थी। ये मूर्तियां उन सतियो की थी जिन्होंने अपने पति को सर्वस्व मानकर उनकी मृत्यु के पश्चात अपने आपको अग्नि को समर्पित कर दिया।इन सभी मूर्तियों के नीचे इन सतियो के नाम व उनके सतीत्व धारण करने की तिथि उकेरी गई थी। किन्तु लिपि के प्राचीन व अस्पष्ट होने तथा सिन्दूर की मोटी परत जमने के कारण तथ्यों का पता लगा पाना संभव नहीं था।उन महापुरूषों को कोटि कोटि प्रणाम, जिन्होंने इस प्राणप्रिय परिसर को पल्लवित किया। प्रमाण है उन पुण्यात्माओं को जिन्होंने अपने तपोबल से इस पावन धाम को ऊर्जावान बनाए रखा था। प्रमाण है उन समाजसेवकों जिन्होंने इस प्राचीन धरोहर को सुरक्षित रखने में अपना योगदान दिया।
साधुवाद उन साहित्य सेवकों को जिन्होंने इस धाम की महिमा को लिपिबद्ध किया। भगवान श्री अनादिकल्पेश्वर के भक्तो में परम पूज्य स्व श्री नर्मदाशंकर जी वेद व्यासजी का नाम सदा अमर रहेगा। जिन्होंने सुमग पंचक की रचना कर इस स्थान के इतिहास एवं महत्व को लिपिबद्ध किया



