कर्म का फल सबको भोगना पड़ता है.स्वयं भगवान को भी पृथ्वी पर आना पड़ा- गौभक्त श्री मनोरथ राम जी महाराज

सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष के प्रसंग पर भावुक हुए श्रद्धालु. विधायक डंग ने लिया पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद
सीतामऊ। श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय चिंतक एवं परम गौभक्त पूज्य गुरुदेव मनोरथराम जी मचलाना वाले के मुखारविंद से अमृत वर्षा का रसपान करने के लिए बड़ी संख्या में माताएं और पुरुष कथा पंडाल में पहुंचे। कथा के विश्राम दिवस पर क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक हरदीप सिंह डंग ने भी कथा पंडाल में हाजिरी लगाई। उन्होंने व्यासपीठ का पूजन कर परम पूज्य गुरुदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया।कथा श्रवण से राजा परीक्षित को मिला मोक्ष
कथा के विश्राम दिवस पर गुरुदेव ने राजा परीक्षित के मोक्ष का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सात दिनों तक निरंतर श्रीमद्भागवत कथा का अमृतपान करने के बाद राजा परीक्षित पूरी तरह भयमुक्त और आत्मज्ञानी हो चुके थे। तक्षक नाग के डसने से पहले ही राजा परीक्षित का मोक्ष हो चुका था, क्योंकि कथा के प्रभाव से उनका जीव सीधे भगवान के चरणों में लीन हो गया था। यह प्रसंग सुनकर पूरा पंडाल जयकारों से गूंज उठा।
कर्म प्रधान है जीवन, संतों का अपमान विनाश का कारण
कथा व्यास पीठ से बोलते हुए पूज्य गुरुदेव ने कर्म की प्रधानता पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कर्म के फल से स्वयं भगवान भी नहीं बच सके। जब यदुवंश के युवकों ने संतों का उपहास और अपमान किया, तो संतों के श्राप के कारण पूरे यदुवंश का विनाश हो गया। स्वयं भगवान कृष्ण को भी बहेलिए का तीर लगा और वे मोक्ष को प्राप्त हुए। इसलिए जीवन में कभी भी संतों, विद्वानों और बुजुर्गों का अपमान नहीं करना चाहिए।
गोपियों का अभिमान भंग और सुदामा चरित्र का दिव्य वर्णन
गुरुदेव ने भगवान कृष्ण की अलौकिक रासलीला का वर्णन करते हुए बताया कि जब गोपियों को अपने भाग्य पर अभिमान हुआ, तो प्रभु ने तत्काल उनका अहंकार भंग कर दिया। भगवान को केवल प्रेम और सरलता प्रिय है, अहंकार नहीं। इसके साथ ही कृष्ण और उनके बचपन के सखा सुदामा के चरित्र का आत्मीयता से वर्णन किया गया। भक्त और भगवान की इस अनुपम कहानी को सुनकर पंडाल में उपस्थित कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
सत्रह बार आक्रमण और द्वारका का निर्माण
कथा में जरासंध के वध का प्रसंग भी सुनाया गया। गुरुदेव ने बताया कि जरासंध ने भगवान पर सत्रह बार आक्रमण किया। इसके बाद प्रभु ने प्रजा की रक्षा के लिए भव्य द्वारका नगरी बसाई और अंततः जरासंध का वध कर धर्म की स्थापना की।
युवाओं को संस्कृति से जोड़ने और राम नाम का संकल्प
राष्ट्रीय चिंतक गौभक्त मनोरथ राम जी ने आज के युवाओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जुड़ना होगा। हमें पाश्चात्य और विकृत भाषा-संस्कृति से दूर रहना चाहिए। उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय को नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करने और जीवन के हर मार्ग पर भगवान राम का नाम लेते हुए आगे बढ़ने का संकल्प दिलाया।
गुप्ता परिवार ने जताया सभी का आभार
कथा के सफल समापन पर गुप्ता परिवार द्वारा पूज्य गुरुदेव मनोरथराम जी मचलाना वाले का भावभीना आभार व्यक्त किया गया। साथ ही कथा में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी सेवादारों, पुलिस प्रशासन, लाइट टेंट नगर परिषद जनप्रतिनिधियों मीडिया बंधुओं और दूर-दूर से पधारे समस्त धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं का हृदय से आभार प्रकट किया गया। कथा के अंत में महाआरती प्रसादी वितरण किया गया।



