न्याय व्यवस्था की टिप्पणी पर पुजारियों में आक्रोश, शासकीय नियंत्रण को बताया शोषण

न्याय व्यवस्था की टिप्पणी पर पुजारियों में आक्रोश, शासकीय नियंत्रण को बताया शोषण
नीमच। सनातन परंपरा में शीर्षस्थ स्थान रखने वाले पुजारी और पुरोहित वर्ग की वर्तमान दयनीय स्थिति और हाल ही में देश की शीर्ष न्याय व्यवस्था द्वारा की गई एक टिप्पणी को लेकर विप्र समाज में भारी आक्रोश व्याप्त है। कर्मकाण्डीय विप्र परिषद के पूर्व अध्यक्ष पंडित राधेश्याम उपाध्याय ने एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय द्वारा पुजारियों के पक्ष में दायर जनहित याचिका पर माननीय न्यायालय के रुख पर गहरा दुःख और आपत्ति व्यक्त की है।
पंडित उपाध्याय ने कहा कि न्यायालय द्वारा यह टिप्पणी करना कि ‘पुजारियों के चक्कर में मत पड़ो, आपको पता है वो कितना कमाते हैं?‘ जानकर हृदय पर गहरा आघात लगा है। उन्होंने न्याय व्यवस्था के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘‘एक तरफ तो हत्यारों और आतंकियों के मानवाधिकारों की इतनी चिंता की जाती है कि उनके लिए रात को 2 बजे भी न्याय के मंदिर (न्यायालय) खोलकर दलीलें सुनी जाती हैं, और दूसरी तरफ अभावों में जीवन जीने वाले पुजारियों के पक्ष को सुनना तो दूर, उनकी सीमित आय पर भी गिद्ध दृष्टि रखी जा रही है।‘‘
पं. राधेश्याम उपाध्याय ने सनातन इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में पुजारी का पद हमेशा से सर्वोच्च सम्मानित पद रहा है। आदिकाल से राजा-महाराजाओं द्वारा मंदिरों का निर्माण और संरक्षण किया जाता था, लेकिन मंदिर की दान-दक्षिणा पर केवल पुजारी वर्ग का अधिकार होता था। इसी आय से वे निश्चिंत होकर लोककल्याण, ज्ञानार्जन, संस्कार संपादन और यज्ञ जैसी सामाजिक व धार्मिक जिम्मेदारियां पूरी करते थे। तब शासक वर्ग के लिए मंदिर के धन को छूना भी पाप माना जाता था।
श्री उपाध्याय ने कहा कि आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। मंदिरों पर तथाकथित सरकारों, ट्रस्टों और समितियों का कब्जा हो चुका है। बड़े-बड़े दानपात्र लगाकर श्रद्धालुओं को सीधे पुजारी को दान देने से रोका जा रहा है। सरकारें मंदिरों की आय तो अपने नियंत्रण में ले लेती हैं, लेकिन बदले में पुजारी को एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी बदतर स्थिति में लाकर छोड़ दिया गया है। आज पुजारी सिर्फ एक नाममात्र के वेतन पर ‘नौकर‘ बनकर रह गया है, जहां उसके मान-सम्मान का भी टोटा है।‘‘
श्री उपाध्याय ने शासन की नीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि आज सत्ता पक्ष से पुजारी वर्ग का पूरी तरह मोहभंग हो रहा है। एक तरफ जहां जिन विशेष वर्गों के धार्मिक स्थलों और शिक्षा केंद्रों को शासन द्वारा करोड़ों रुपये का सहयोग और सुविधाएं दी जा रही हैं, जिसके बल पर सरेआम धार्मिक उन्माद, कट्टरता, सनातन एवं राष्ट्र विरोधी कामों को खुलेआम अंजाम दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सनातन मंदिरों की आय को शासन लेकर उसे अन्य कार्यों में बहा रहा है। धर्म-कर्म से प्राप्त इस आय का उपयोग अधर्म और विसंगतियों को बढ़ावा देने में हो रहा है, जो कि अत्यंत चिंताजनक है।
पंडित उपाध्याय ने पुजारियों और पुरोहितों की इस मूक पीड़ा को शीर्ष अदालत के समक्ष पूरी प्रखरता से उठाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें साधुवाद दिया है। उन्होंने मांग की है कि सनातन संस्कृति के इन ध्वजवाहकों को उनका खोया हुआ सम्मान और अधिकार वापस मिलना ही चाहिए।



