मंदसौर जिलामंदसौर

रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम


विश्व रंगमंच दिवस पर नुक्कड़ सभा में कला, संविधान और जन सरोकारों पर वक्ताओं के विचार

मन्दसौर। “सिर्फ अधिकार मांगने से देश नहीं चलता, कर्तव्यों को निभाना भी उतना ही जरूरी है। संविधान का सम्मान व्यवहार में दिखना चाहिए।”
यह बात प्रगतिशील लेखक और सामाजिक चिंतक असअद अंसारी ने विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर तेलिया टैंक पर आयोजित नुक्कड़ सभा में कही।उन्होंने कहा कि 27 मार्च को मनाया जाने वाला यह दिवस केवल सांस्कृतिक अवसर नहीं, बल्कि सच बोलने की परंपरा को याद करने का दिन है। भारतीय संदर्भ में रंगमंच को जनता के संघर्षों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (ईप्टा) ने किया है, जिसने इसे सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाया।
सभा में फिल्म डायरेक्टर, लेखक एवं कवि मनी चौहान ने कहा कि थियेटर को केवल फिल्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक जीवंत मंचीय कला है, जिसमें समाज अपने ही प्रतिबिंब को देखता है।
सांस्कृतिकर्मी नरेंद्र कुमार त्रिवेदी सूत्रधार ने कहा कि रंगमंच समाज का आईना है और युवाओं को इससे जोड़कर इसे नई ऊंचाइयों तक ले जाया जा सकता है।
ईप्टा सचिव हूर बानो सैफी ने संचालन करते हुए कहा कि संविधान अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी स्पष्ट दस्तावेज़ है। अधिकार और कर्तव्य दोनों का संतुलन ही लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।
ईप्टा उपाध्यक्ष हेमन्त कछावा ने कहा कि संगठन का गौरवशाली इतिहास जन मुद्दों को नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से उठाने की प्रेरणा देता है। अभय मेहता ने भी विचार व्यक्त किए।
इकाई अध्यक्ष शोभा कश्यप ने कहा कि संविधान हमें समानता, स्वतंत्रता और शिक्षा जैसे अधिकार देता है, साथ ही कानून पालन और भाईचारा बनाए रखना हमारा कर्तव्य है।कार्यक्रम के प्रारंभ में जनगीत गायन हुआ, जिसमें नन्द किशोर राठौर, ललिता मेहता, राजेश मंडवारिया,संतोष परसाई सहित अनेक लोगों ने सहभागिता की। संचालन हूर बानो सैफी ने किया और आभार प्रदर्शन डी.पी. जोशी ने किया।

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