मध्यप्रदेश बजट 2026: उम्मीदों का पिटारा या आंकड़ों का मायाजाल?

मध्यप्रदेश बजट 2026: उम्मीदों का पिटारा या आंकड़ों का मायाजाल?
मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने जब विधानसभा में 2026-27 का बजट पेश किया, तो मेजें थपथपाई गईं, लेकिन गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या यह बजट वाकई आम आदमी की जेब और प्रदेश की सेहत सुधार पाएगा? ₹4.15 लाख करोड़ का यह भारी-भरकम बजट विकास का सपना तो दिखाता है, पर इसमें कुछ कड़वे सच भी छिपे हैं।
बजट मे यह बात अच्छी दिखायी देती है कि इसमे अन्नदाता और सिंचाई की चिंता की गयी । इस बजट की सबसे बड़ी मजबूती कृषि क्षेत्र में ₹55,000 करोड़ का निवेश है। ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर जिस तरह से जोर दिया गया है, उससे साफ़ है कि सरकार खेती को लाभ का धंधा बनाने की अपनी पुरानी ज़िद पर कायम है। इसमे बहनों का भरोसा बरकरार रखा है । ‘लाड़ली बहना योजना’ के लिए ₹19,000 करोड़ अलग रखकर सरकार ने अपनी नीयत साफ कर दी है कि आधी आबादी को आर्थिक सहारा देना उनकी प्राथमिकता है। ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य भी महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला है।
बजट मे शिक्षा और सेहत पर भी दांव लगाया है । ‘सीएम राइज’ स्कूलों और हर जिले में एक्सीलेंस कॉलेजों का संकल्प कागजों पर तो शानदार दिखता है। साथ ही, आयुष्मान भारत के दायरे को मध्यम वर्ग तक ले जाने की कोशिश एक राहत भरी खबर है।
बात अब बजट कमियों की करे तो कर्ज का पहाड़ चुनौती बनकर खड़ा है । सबसे डराने वाली बात यह है कि आज मध्यप्रदेश का हर नागरिक कर्ज के बोझ तले दबा है। ₹4.25 लाख करोड़ का कुल कर्ज कोई छोटी बात नहीं है। हम नई योजनाओं के लिए फिर से उधार ले रहे हैं, जिसका ब्याज चुकाने में ही बजट का एक बड़ा हिस्सा स्वाहा हो जाता है।
बजट मे बेरोजगारी का दर्द से निजात की कोई स्थायी दवा नहीं बतायी गई है । बजट में स्किल्स (कौशल विकास) की बातें तो खूब हुईं, पर हमारे युवा पूछ रहे हैं कि “नौकरी कहाँ है?” केवल ट्रेनिंग सेंटर खोलने से काम नहीं चलेगा, जब तक राज्य में निजी क्षेत्र से बड़े उद्योग और स्थायी नौकरियां नहीं आएंगी।
बजट मे शहरों की अनदेखी सरकार को भारी पड़ सकती है ! इंदौर और भोपाल जैसे शहर आज ट्रैफिक और प्रदूषण से कराह रहे हैं। बजट में इन महानगरों के लिए कोई क्रांतिकारी ‘अर्बन प्लानिंग’ या अलग से बड़ा फंड नहीं दिखा, जो थोड़ा निराशाजनक है।
राजकोषीय अनुशासन सरकार के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं है । ‘मुफ्त की योजनाओं’ और ‘विकास’ के बीच का संतुलन बिगड़ता दिख रहा है। राजकोषीय घाटे को काबू में रखना सरकार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।
जमीनी हकीकत से अगर रूबरू हुआ जाए तो कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश का 2026 का बजट एक ‘वेलफेयर बजट‘ है—यानी वह बजट जो लोगों को खुश रखने की कोशिश करता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ घोषणाओं से प्रदेश ‘स्वर्णिम’ बनेगा? असली चुनौती इन योजनाओं को बिना भ्रष्टाचार के धरातल पर उतारने की है। अगर सरकार कर्ज के जाल से निकलकर राजस्व के नए रास्ते नहीं खोजती, तो भविष्य की पीढ़ी पर बोझ असहनीय हो जाएगा।
लेखक – राजेश पाठक (अधिवक्ता )
सद्भावना पथिक , मंदसौर


