मंदसौरमध्यप्रदेश

बच्चे मशीन नहीं हैं… पुस्तक पर प्रबुद्ध वक्ताओं ने विस्तार से खंगाले बाल मन के आयाम

शैक्षिक संवाद मंच का पुस्तक संवाद-20 संपन्न

….बच्चे मशीन नहीं हैं… पुस्तक पर प्रबुद्ध वक्ताओं ने विस्तार से खंगाले बाल मन के आयाम

मन्दसौर: शिक्षकों के स्वप्रेरित मैत्री समूह शैक्षिक संवाद मंच के तत्वावधान में पुस्तक संवाद-20 का ऑनलाइन आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए संयोजक दुर्गेश्वर राय ने मंच की वैचारिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए बताया कि शैक्षिक संवाद मंच की स्थापना गिजुभाई बधेका के शैक्षिक दर्शन और उनकी कालजयी पुस्तक दिवास्वप्न को मूल में रखते हुए 18 नवम्बर 2012 को हुई थी। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आनंदमय वातावरण में बच्चे सर्वाधिक सीखते हैं, लेकिन यदि शिक्षक स्वयं आनंदित न हो, तो वह ऐसे वातावरण का सृजन नहीं कर सकता, इसीलिए मंच का उद्देश्य पहले शिक्षक, फिर बच्चे और अंततः समाज को आनंदमय करना है। इसी कड़ी में दुनिया भर के शिक्षकों के अनूठे अनुभवों को अपने विद्यालयों में उतारने के उद्देश्य से इस पुस्तक संवाद का सिलसिला शुरू हुआ, जिसके आज 20वें संस्करण में देश भर के प्रबुद्ध जन जुड़े हैं।
सत्र को गति देते हुए संवाद पैनल के वक्ताओं ने पुस्तक के विभिन्न व्यावहारिक पक्षों पर विचार विमर्श किया।
सत्र में अतिथियों के उद्बोधन की श्रृंखला में विशिष्ट अतिथि के रूप में जुड़े मध्य प्रदेश के वरिष्ठ प्रवक्ता व शिक्षाविद् डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया ने कहा कि 6 भागों और 38 विभिन्न विषयों (टॉपिक्स) को समेटे हुए यह एक अद्भुत पुस्तक है, जिसमें एक शिक्षक के जमीनी अनुभवों का अनूठा निचोड़ है और इसके लेखक दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में हो रहे समसामयिक बदलावों के जीवंत साक्षी रहे हैं, जो शिक्षकों को अपनी विविध भूमिकाओं पर मनन करने का अवसर देती है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और पुस्तक के लेखक आलोक कुमार मिश्रा ने बड़ी सादगी से अपनी बात रखते हुए कहा कि एक लेखक तो अपनी सभी बातें अपनी पुस्तक में पहले ही लिख चुका होता है, लेकिन जॉन होल्ट की किताबों को पढ़कर उन्हें यह गहराई से महसूस हुआ कि पुस्तक के शीर्षक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक की बातें हैं; बच्चे और शिक्षक अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही टीम का हिस्सा हैं। उन्होंने आगे कहा कि जिन्हें इस पुस्तक का शीर्षक अच्छा लग रहा है, वे बच्चों के बेहद करीब हैं और एक ही पिच पर खेल रहे हैं; साथ ही उन्होंने यह भी आह्वान किया कि बच्चों के विकास की सभी जिम्मेदारियां केवल विद्यालयों के मत्थे न मढ़ी जाएं, बल्कि इसके लिए समाज के अन्य लोगों द्वारा भी चहुंमुखी प्रयास किए जाने की महती जरूरत है।
मंच के संस्थापक, मार्गदर्शक और बाँदा के वरिष्ठ साहित्यकार प्रमोद दीक्षित मलय ने अपने मार्गदर्शक वक्तव्य में प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों को हमेशा एक इंसान की तरह और भावनाओं से भरे हुए एक संपूर्ण व्यक्तित्व की तरह देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे कोई निर्जीव मशीन नहीं हैं; उन्होंने इस बात पर विशेष खुशी जाहिर की कि मंच ने इस बेहद जरूरी और सामयिक पुस्तक को आज के गहन संवाद हेतु चुना और इसके लिए उन्होंने लेखक आलोक मिश्र जी को बधाई दी।
अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही बाल उमंग पत्रिका की संपादक ऋतु श्रीवास्तव ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन  में कहा कि इस पुस्तक का शीर्षक ही भीतर तक आंदोलित कर देता है; उन्होंने सभी को बच्चों के प्रति कभी भी जजमेंटल न होने की बेहद महत्वपूर्ण सलाह दी और सभी वक्ताओं के विचारों को बेहद खूबसूरती से समावेशित किया।
मंच  का संचालन प्रीति भारती ने किया, जिन्होंने पूरे सत्र के दौरान न केवल बेहतरीन सूत्रधार की भूमिका निभाई बल्कि पुस्तक पर अपना एक विस्तृत और सारगर्भित दृष्टिकोण भी देश भर के सुधी श्रोताओं के समक्ष रखा। कार्यक्रम का समापन मंच के संयोजक दुर्गेश्वर राय के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।
इस पूरे प्रेरक विमर्श को डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने यूट्यूब पर लाइव प्रसारण किया गया।

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