गंगा तर्ज पर मां अंजनी नदी की भव्य महाआरती संपन्न

हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में गूंजे जयकारे, संतों के सानिध्य में आध्यात्मिकता और विकास का अद्भुत संगम
मां अंजनी नदी के तट पर आस्था का महासागर, पुनर्जीवन अभियान की सफलता का हुआ भव्य उत्सव
सतीश शर्मा
गरोठ। कभी उपेक्षा, गंदगी और अतिक्रमण की मार झेलकर नाले का स्वरूप ले चुकी मां अंजनी नदी आज पुनः अपनी गरिमा और पवित्रता की ओर लौट रही है। इसी ऐतिहासिक परिवर्तन और पुनर्जीवन अभियान की सफलता के उपलक्ष्य में मंगलवार सायंकाल गंगा तर्ज पर मां अंजनी नदी के तट पर भव्य महाआरती का आयोजन किया गया। श्रद्धा, भक्ति और उत्साह से सराबोर इस आयोजन में हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर मां अंजनी के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।
दीपों की अलौकिक रोशनी, मंत्रोच्चार और घंटियों की मधुर ध्वनि के बीच जब मां अंजनी की आरती प्रारंभ हुई तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। नदी तट पर उपस्थित जनसमूह ने एक स्वर में जयघोष कर आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।
पीठाधीश्वर साध्वी सुश्री अर्पणा जी नागदा का मिला सानिध्य एवं आशीर्वचन—।
कार्यक्रम में पीठाधीश्वर साध्वी सुश्री अर्पणा जी नागदा विशेष रूप से उपस्थित रहीं। उन्होंने अपने प्रेरणादायी आशीर्वचनों में कहा कि नदियां केवल जलधाराएं नहीं होतीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला होती हैं। मां अंजनी नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन का यह कार्य समाज के लिए प्रेरणादायी उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि जब समाज और जनप्रतिनिधि मिलकर संकल्प लेते हैं तो असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं। मां अंजनी का पुनर्जागरण पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान का भी प्रतीक है।
जनप्रतिनिधियों और गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति—।
महाआरती कार्यक्रम में पूर्व विधायक देवीलाल धाकड़ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश दीक्षित ने की। विशेष अतिथि के रूप में जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती दुर्गा विजय पाटीदार, भाजपा मंडल अध्यक्ष गोकुल सिंह सहित अनेक जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक मंचासीन रहे।
अतिथियों ने अपने संबोधन में मां अंजनी नदी पुनर्जीवन अभियान की सराहना करते हुए इसे जनसहभागिता और सकारात्मक नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
44 दिनों का संकल्प बना जनआंदोलन—।
वक्ताओं ने कहा कि मां अंजनी नदी का पुनर्जीवन केवल सफाई अभियान नहीं बल्कि जनभागीदारी का ऐसा आंदोलन बना जिसने पूरे नगर को एक सूत्र में बांध दिया। लगातार 44 दिनों तक चले इस अभियान में नगरवासियों, युवाओं, महिलाओं, सामाजिक संगठनों और व्यापारिक वर्ग ने बढ़-चढ़कर सहभागिता निभाई।
नदी के दोनों किनारों पर सफाई, सौंदर्यीकरण और अतिक्रमण हटाने के कार्य ने नगर के लोगों में नई ऊर्जा और विश्वास का संचार किया।
राजेश सेठिया के नेतृत्व और सीएमओ गिरीश शर्मा की मेहनत का मिला प्रतिफल—-।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने विशेष रूप से नगर परिषद अध्यक्ष राजेश सेठिया के नेतृत्व की सराहना की। बताया गया कि उन्होंने इस अभियान को केवल प्रशासनिक कार्य न मानकर जनसंकल्प का स्वरूप दिया। प्रतिदिन स्वयं नदी तट पर उपस्थित रहकर कार्यों की निगरानी की तथा नागरिकों को अभियान से जोड़ने का कार्य किया।
साथ ही नगर परिषद के मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) गिरीश शर्मा की अथक मेहनत, सतत मॉनिटरिंग और प्रशासनिक समन्वय को भी अभियान की सफलता का महत्वपूर्ण आधार बताया गया। उनके मार्गदर्शन में नगर परिषद की टीम ने दिन-रात कार्य कर मां अंजनी नदी को नया स्वरूप प्रदान किया।
विकास और आस्था का बना नया केंद्र—।
नदी के पुनर्जीवन के बाद अब इसे धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। भविष्य में यहां भव्य घाट, आकर्षक प्रकाश व्यवस्था, बैठने की सुविधाएं, बच्चों के लिए मनोरंजन क्षेत्र तथा विभिन्न धार्मिक आयोजनों की योजनाएं प्रस्तावित हैं।
नगरवासियों का मानना है, कि जिस प्रकार देशभर में गंगा आरती आस्था का प्रतीक बन चुकी है, उसी प्रकार मां अंजनी नदी की यह आरती भी आने वाले समय में क्षेत्र की नई पहचान बनेगी।
जनविश्वास और सामाजिक एकता का प्रतीक बना अभियान—-।
मां अंजनी नदी पुनर्जीवन अभियान ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब जनप्रतिनिधि, प्रशासन और आमजन एक साथ मिलकर कार्य करते हैं तो परिवर्तन निश्चित होता है। यह अभियान केवल नदी की सफाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक जिम्मेदारी और जनसहभागिता का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है।
भव्य महाआरती के साथ संपन्न हुआ यह आयोजन मां अंजनी नदी के पुनर्जागरण का उत्सव बन गया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया, कि नदी की स्वच्छता और पवित्रता बनाए रखने में वे निरंतर सहयोग करते रहेंगे।
“मां अंजनी केवल नदी नहीं, गरोठ की आस्था, संस्कृति और पहचान है” — यही संदेश पूरे आयोजन के केंद्र में रहा।



