देशनई दिल्ली

वेश्विक संकट के दौर मे प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल प्रसासनिक निर्णय लिया बल्कि प्रतीकात्मक संदेश भी दिया

वेश्विक संकट के दौर मे प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल प्रसासनिक निर्णय लिया बल्कि प्रतीकात्मक संदेश भी दिया

देश की जनता प्रधानमंत्री के निर्णय के साथ लेकिन नेताओं के वेतन व पेंशन मे कटोत्री पर भी निर्णय करे सरकार

ज़ब ज़ब देश पर संकट आया जनता ने दिया पूरा साथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में वैश्विक संकट और ईंधन बचत की आवश्यकता का हवाला देते हुए अपने काफिले को सीमित किया। दिल्ली की सड़कों पर जब प्रधानमंत्री केवल दो गाड़ियों के साथ दिखाई दिए, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश भी था। जिस पद को देश में सबसे अधिक सुरक्षा की आवश्यकता मानी जाती है, यदि वह सादगी का उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है तो फिर राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री और बड़े अधिकारी क्यों नहीं?

यह स्वागतयोग्य है कि कुछ राज्यों में काफिले छोटे किए गए, कुछ अधिकारियों ने एक साथ यात्रा करने का निर्णय लिया और कुछ मंत्रियों ने अनावश्यक तामझाम कम करने की घोषणा की

यदि मंत्री अपने काफिले सीमित करें, बंगले छोटे करें, अनावश्यक स्टॉफ और भत्तों पर पुनर्विचार करें व हो सके तो नेताओं के वेतन मे कटोत्री व पेंशन बंद करे

क्योंकि जनता भाषणों से कम, उदाहरणों से अधिक प्रेरित होती है। प्रधानमंत्री यदि सादगी अपनाते हैं तो मुख्यमंत्री की मजबूरी बनती है, मुख्यमंत्री अपनाते हैं तो मंत्रियों की, और मंत्री अपनाते हैं

1965 में लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियो से उपवास रखने की अपील की थी* भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय देश में भयंकर अनाज का संकट आ गया था। इस समस्या से निपटने के लिए व भारत को अनाज के लिए अमेरिका या अन्य किसी देश के आगे हाथ न फैलाना पड़े, इसके लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के आह्वान पर पूरा देश सप्ताह में एक दिन उपवास रखता था.

शास्त्री जी ने देशवासियों से अपील की थी कि वे हफ्ते में एक दिन (सोमवार की शाम) का उपवास रखें, ताकि अनाज बचाया जा सके।इस नियम को देश पर लागू करने से पहले उन्होंने खुद अपने घर और परिवार से इस उपवास की शुरुआत की थी। उनके इस त्याग और सादगी से प्रभावित होकर पूरा देश उनके साथ इस अभियान में जुड़ गया था।

1962: इंदिरा गांधी ने दान की थी ज्वेलरी

साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागरिकों से राष्ट्रीय रक्षा कोष में सोना और पैसा दान करने की अपील की थी। यह फंड उसी वर्ष सशस्त्र बलों के जवानों और उनके परिवारों के कल्याण और रक्षा प्रयासों के लिए स्थापित किया गया था। उस समय सरकार ने दान देने के तीन ठोस कारण भी बताए थे। इनमें नागरिकों और उनके बच्चों के भविष्य की रक्षा करना, भारत की क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना और शांति की रक्षा करना शामिल था। उस समय इंदिरा गांधी ने 367 ग्राम सोने की ज्वेलरी दान की थी।

1967 मे इंदिरा गांधी ने की थी अपील

6 जून 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी लोगों से सोना न खरीदने की अपील की थी। उस समय भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव था। भारत को आजाद हुए 20 साल ही हुए थे और पाकिस्तान के साथ हुए 1965 के युद्ध से उबर चुका था। उस समय भारत भीषण सूखे का सामना कर रहा था, विदेशी मुद्रा भंडार लगभग शून्य था और संस्थाएं अभी भी शून्य से खड़ी की जा रही थीं। ऐसे में इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से नागरिकों से किसी भी रूप में सोना न खरीदने की अपील की थी और अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए राष्ट्रीय अनुशासन का आह्वान किया था।

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