आलेख/ विचारमंदसौरमध्यप्रदेश

संकट काल में ही देशभक्ति परखी जाती है

संकट काल में ही देशभक्ति परखी जाती है

 

   रमेशचन्द्र चन्द्रे
शिक्षाविद मंदसौर
“रहीम का यह प्रसिद्ध दोहा, “रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय। हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय”
यह सिखाता है कि थोड़े समय के लिए आने वाली मुसीबत भी अच्छी होती है, क्योंकि वह विपत्ति, सच्चे दोस्तों (हितैषी) और दुश्मनों (अहित करने वाले) की पहचान करा देती है, जो सुख में छिपे रहते हैं।
उक्त बात अभी अपने भारत पर पूर्णतया लागू हो रही है। क्योंकि ईरान- अमेरिका युद्ध के कारण तेल एवं गैस की सप्लाई थोड़ी प्रभावित हो सकती है विदेशी मुद्रा भंडारण की सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री जी ने जो अपील की है उसके बाद जिस तरीके से यहां के छुपे हुए लोगों ने अपना रंग दिखाना शुरू किया है वे वास्तव में यदि भारत पर ज्यादा संकट आ जाए तो क्या करेंगे? इसके संकेत मिल रहे हैं।
प्रतिदिन देशभक्ति के गीतों को दोहराते हुए यह कहने वाले कि  “मैं रहूं ना रहूं यह देश रहना चाहिए”  इस प्रकार के गीत गाने वाले कुछ  लोगों का चरित्र, प्रधानमंत्री जी की सलाह को भारत में अफवाहें फैला कर पेट्रोलियम की कमी को हाइलाइट करते हुए जनता को गुमराह करने का काम करने वाले सोशल मीडिया सहित नेताओं का चरित्र हमारे सामने है।
हमारी देशभक्ति कितनी नकली एवं खोकली है? यह सब कुछ जिस तरह से यहां के कतिपय राजनीतिक नेताओं और टीवी चैनलों तथा सोशल मीडिया ने प्रायोजित किए हुए वीडियो समाज के सामने परोस कर भारत को कमजोर दिखाने का जो प्रयास किया जा रहा है वह हम सबके सामने हैं। जबकि भारत पर अभी कोई गंभीर संकट नहीं है और ना ही कोई पेट्रोलियम पदार्थों की कमी हो रही है, केवल प्रधानमंत्री जी ने मितव्ययिता बरतने की अपील की है किंतु फिर भी समाज का वातावरण खराब करना यह देशभक्ति की श्रेणी में कभी नहीं माना जा सकता।
संकट काल में ही नकली देशभक्तों की कलाई खुलकर जनता के सामने आ जाती है।
वर्तमान  पीढ़ी आज से 50 वर्ष पूर्व तथा आजादी के पहले, अंग्रेजों की गुलामी के समय तथा सामंतवादी शासन के भारत के बारे में बिल्कुल नहीं जानती। अपने पूर्वजों के संकटकाल को यह  भूल चुकी हैं कि किस तरह एक अभावग्रस्त भारत, एक अविकसित भारत, साधनहीन भारत, गरीबी बीमारी और भुखमरी से मरने वाला भारत, कैसे कठोर से कठोर संघर्ष करके आज इस अच्छे स्तर पर पहुंचा है, इसका अनुमान और अध्ययन उनको नहीं है।
वर्तमान पीढ़ी ने संघर्ष और पीड़ा को नहीं भोगा है उन्होंने केवल हरा-हरा ही देखा है, यह पीढ़ी दुख सहने की समस्त क्षमताएं  खो चुकी है। इसलिए इस विषय पर देश के सक्षम वर्ग को हमेशा चिंता करना चाहिए।
मैं शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा रहा हूं इसलिए अभी भी यदि बचपन से ही शिक्षा क्षेत्र में कठोर अनुशासन तथा कठोर परिश्रम, स्वावलंबन इत्यादि को महत्व नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ी इस देश को कैसे संभालेगी? यह चिंता का विषय है।
ज्यादा सुविधाएं मनुष्य को आलसी, निष्क्रीय, किंकर्तव्यविमूढ़,स्वार्थी एवं बना देती है। यदि इससे जरा सा भी भौतिक सुख छीन लिया जाए तो यह मनुष्य को भयानक हिंसक बना देती है। इसलिए ज्यादा सुविधा देना यह परिवार में भी ठीक नहीं है और देश के लिए भी ठीक नहीं है।

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