कानून, इतिहास और समाज; वंदे मातरम’ और ‘तिरंगे’ के दौर में बंधुत्व की तलाश

कानून, इतिहास और समाज; वंदे मातरम’ और ‘तिरंगे’ के दौर में बंधुत्व की तलाश
✍️ राकेश घूमन्तु गोल्डी की कलम से
मेरी चल रही बंधुत्व फेलोशिप के दौरान जब मैंने अपने पिछले सात महीनों के सफर पर नजर डाली, तो भीतर एक गहरा विचार कौंधा। इन सात महीनों में जमीनी हकीकत, समाज के ताने-बाने, लोगों के आपसी रिश्तों और बंधुत्व की मूल भावना को करीब से महसूस करने के बाद मुझे समझ आया कि जो अभी-अभी हमारे राष्ट्रीय और सामाजिक पटल पर बीता है, क्यों न उसी पर खुलकर और गहराई से लिखा जाए!
बीते कुछ समय में हमारे देश में राष्ट्रीय प्रतीकों—विशेषकर ‘वंदे मातरम’, ‘जन-गण-मन’ और हमारे प्यारे ‘तिरंगे’ को लेकर कई कानूनी, ऐतिहासिक और राजनीतिक बहसें तेज हुई हैं। जब समाज में बंधुत्व और राष्ट्रीय पहचान की बात आती है, तो ये प्रतीक केवल कागज या कानून के पन्नों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि हमारे सामूहिक जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। आइए, इस पूरे विषय को बेहद सरल, साफ और सहज शब्दों में एक विस्तृत यात्रा की तरह समझें।
हर साल जब अगस्त का महीना आता है, तो चारों ओर एक खास तरह की हलचल दिखने लगती है। सड़कों पर तिरंगा लहराता है, चौराहों पर देशभक्ति के फिल्मी तराने गूंजते हैं और हर कोई कुछ पलों के लिए एक अलग ही जोश में डूब जाता है। लेकिन जैसे ही 16 अगस्त की सुबह होती है, हम सब फिर से अपनी-अपनी रोजमर्रा की जिंदगी, परेशानियों और निजी उलझनों में लौट जाते हैं। देशभक्ति का वह औपचारिक माहौल मानो फिर से 26 जनवरी तक के लिए बक्से में बंद हो जाता है।
लेकिन क्या देशभक्ति सिर्फ तारीखों की मोहताज है? मेरी बंधुत्व फेलोशिप ने मुझे सिखाया है कि असली देशभक्ति वह नहीं है जो साल में सिर्फ दो दिन नारों और गानों के जरिए दिखाई जाए। असली देशभक्ति तो वह खामोश समर्पण है जो देश के करोड़ों आम नागरिक—किसान, मजदूर, शिक्षक, सफाईकर्मी, छोटे दुकानदार और दफ्तरों में काम करने वाले लोग—हर रोज अपने हिस्से की ईमानदारी से निभाते हैं। बिना किसी ढोल-नगाड़े के 365 दिन अपने कर्तव्य का पालन करना ही इस मुल्क के प्रति सच्ची वफादारी है।
इसी बीच देश के पटल पर एक बड़ा कानूनी बदलाव हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हस्ताक्षर के बाद ‘द प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (अमेंडमेंट) बिल’ कानून बन गया। इस कानून के जरिए ‘वंदे मातरम’ को कानूनी तौर पर वही औपचारिक सुरक्षा और दर्जा दे दिया गया जो अब तक केवल हमारे राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ को हासिल था। जब लाल किले की प्राचीर से तिरंगे के साथ वंदे मातरम की नई गूंज सुनाई दी, तो इसके साथ ही देश में एक बार फिर इतिहास, आस्था और राजनीति की बहसें जीवित हो उठीं।
2.प्रावधान, सजा और राजनीतिक बहस
किसी भी बड़े सामाजिक विमर्श को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि कानून की किताबों में असल में बदला क्या है
पहले क्या कानून था?
1971 के ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम’ (Prevention of Insults to National Honour Act) के तहत मुख्य रूप से राष्ट्रगान यानी ‘जन-गण-मन’ और राष्ट्रध्वज के अपमान पर रोक का प्रावधान था। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के गाए जाने में जानबूझकर बाधा डालता था या सभा को रोकता था, तो उसके लिए 3 साल तक की कैद या जुर्माने की सजा तय थी। उस समय ‘वंदे मातरम’ को यह विशिष्ट दंडात्मक सुरक्षा हासिल नहीं थी।
नए संशोधन से क्या बदला?
नए संशोधन के माध्यम से ‘वंदे मातरम’ को भी उसी कानूनी ढाल के दायरे में लाया गया है। अब यदि कोई व्यक्ति वंदे मातरम के गायन में जानबूझकर अड़ंगा डालता है या व्यवधान पैदा करता है, तो उसके लिए भी तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही इसके गायन के लिए एक शिष्टाचार और प्रोटोकॉल निर्धारित किया गया है, जिसके तहत इसे लगभग 3 मिनट 10 सेकंड में सावधान की मुद्रा में खड़े होकर गाया जाना तय किया गया है।
कानून के पीछे की राजनीति
संसद के सत्र में जब इस पर चर्चा शुरू हुई, तो सत्ता पक्ष और संघ परिवार का तर्क था कि जिस गीत ने देश की आजादी की लड़ाई में लाखों नौजवानों को फांसी के फंदे चूमने की प्रेरणा दी, उसे राष्ट्रगान के बराबर वैधानिक सुरक्षा मिलनी ही चाहिए थी। वहीं दूसरी ओर, आलोचकों और विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि इस कदम के पीछे कहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वह राजनीति तो नहीं है, जो ऐतिहासिक असहमतियों को नजरअंदाज करती है?
मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की पुरानी आपत्ति यह रही है कि इस्लाम में केवल एक ईश्वर (तौहीद) की इबादत की जाती है और किसी मूर्ति या साकार रूप की पूजा वर्जित है। वंदे मातरम के बाद के छंदों में मातृभूमि की कल्पना देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में की गई है। इस तरह एक कानून के जरिए सिर्फ शब्द नहीं बदले, बल्कि इतिहास के पुराने पन्ने भी फिर से पलट दिए गए।
3. ‘वंदे मातरम’ की उत्पत्ति –
बंकिम बाबू और 1870 का बंगाल इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें आज से लगभग डेढ़ सौ साल पीछे 1870 के दशक के बंगाल में चलना होगा।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जब हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं, तब अंग्रेज हुक्मरान बुरी तरह घबरा गए थे। अंग्रेजों को समझ आ गया था कि अगर भारत पर लंबे समय तक राज करना है, तो इस साझा एकता को तोड़ना होगा। यहीं से अंग्रेजों की कुख्यात नीति ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) पूरी ताकत से शुरू हुई।
उसी दौर में बंगाल में तैनात एक सरकारी डिप्टी कलेक्टर थे—बंकिम चंद्र चटर्जी। अंग्रेज सरकार ने उनके काम से खुश होकर उन्हें ‘राय बहादुर’ का खिताब भी दिया था। लेकिन एक सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद बंकिम के भीतर एक संवेदनशील भारतीय लेखक और राष्ट्रवादी मन सांस ले रहा था। 1872 से 1875 के बीच उन्होंने एक स्वतंत्र गीत की रचना की, जिसका शीर्षक रखा गया—’वंदे मातरम’ यानी “मां, मैं तेरी वंदना करता हूं।”
1875 को इस गीत की रचना का आधिकारिक वर्ष माना जाता है। शुरुआती दौर में बंकिम ने इसके केवल दो छंद (stanzas) लिखे थे। इन दो छंदों में किसी देवी-देवता की धार्मिक मूर्ति का जिक्र नहीं था। इसमें बंगाल की शस्य-श्यामला, हरी-भरी, फलों और फूलों से लदी धरती और उसकी पावन नदियों का गुणगान था
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयजशीतलाम्…
सप्तकोटिकंठ-कलकल-निनाद-कराले.
यहाँ ‘सात करोड़ कंठ’ का जिक्र इसलिए आया क्योंकि 1871 की आधिकारिक जनगणना के अनुसार तत्कालीन अविभाजित बंगाल की कुल आबादी लगभग सात करोड़ थी, जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे। यह गीत अपनी मिट्टी, अपनी प्रकृति और अपने साझा परिवेश की वंदना था, जिस पर किसी को कोई ऐतराज नहीं हो सकता था।
4. ‘अर्ली बंकिम’ बनाम ‘लेट बंकिम’- सोच का रूपांतरण
इतिहासकारों ने बंकिम चंद्र चटर्जी के जीवन और चिंतन को दो बड़े हिस्सों में बांटा है:
तर्कवादी और मूर्तिपूजा विरोधी बंकिम
शुरुआती दिनों में बंकिम चंद्र एक विशुद्ध तर्कवादी और विज्ञान-समर्थक विचारक थे। अपनी प्रसिद्ध पत्रिका ‘बंग दर्शन’ में उन्होंने साफ-साफ शब्दों में लिखा था कि मूर्तिपूजा वैज्ञानिक सोच के खिलाफ है। उनका मानना था कि मूर्तिपूजा से स्वतंत्र ज्ञान का विकास रुकता है और इंसानी मस्तिष्क कुंठित होता है। उन्होंने उदाहरण दिया था कि प्राचीन यूनानी दार्शनिकों और वैदिक ऋषियों ने विज्ञान और ज्ञान की सीमाओं को बढ़ाया क्योंकि वे किसी साकार मूर्ति के बंधनों में नहीं बंधे थे।
1881 और ‘आनंदमठ’ का दौर
लेकिन 1881 के आसपास बंकिम के विचारों में एक बड़ा मोड़ आया। उन्होंने संन्यासी विद्रोह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अपना बहुचर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ लिखा। इस उपन्यास की कथावस्तु के अनुसार, उन्होंने अपने पुराने गीत ‘वंदे मातरम’ में नए छंद जोड़े। इन नए पदों में मातृभूमि को केवल प्राकृतिक मिट्टी न मानकर साक्षात देवी दुर्गा का रूप दे दिया गया
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी…
कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी..
अब यह गीत केवल प्रकृति-वंदना नहीं रहा, बल्कि इसमें दस भुजाओं वाली दुर्गा के अस्त्र-शस्त्र, धन की देवी लक्ष्मी और विद्या की देवी सरस्वती के संदर्भ समाहित हो गए।
इतिहासकारों का नजरिया
प्रसिद्ध इतिहासकार तनिका सरकार अपने शोध ‘बर्थ ऑफ अ गॉडेस’ में लिखती हैं कि बंकिम के शुरुआती छंद किसी जनसमूह के लिए नहीं, बल्कि एक लेखक का अपनी आत्मा और मिट्टी के साथ एकांत संवाद थे। लेकिन जब इसे ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बनाया गया, तो यह एक राजनीतिक और धार्मिक आख्यान में तब्दील हो गया।
वहीं इतिहासकार सव्यसाची भट्टाचार्य का विश्लेषण है कि बंकिम चंद्र बाद के दिनों में फ्रांसीसी दार्शनिक ऑगस्ट कॉम्ट के विचारों से प्रभावित हुए थे। कॉम्ट का मानना था कि किसी सोए हुए समाज को जगाने के लिए उसकी पारंपरिक आस्थाओं और मूल सांस्कृतिक प्रतीकों का सहारा लेना पड़ता है। इसी विचार के तहत बंकिम ने राष्ट्र की अमूर्त भावना को देवी के रूप में स्थापित किया।
5. बंग-भंग (1905) और एकता से विवाद तक का सफर
1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम को खुद धुन बनाकर गाया। इसके बाद यह गीत धीरे-धीरे राष्ट्रीय आंदोलन की आत्मा बनने लगा।
1905 स्वदेशी आंदोलन
1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने सांप्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन (बंग-भंग) किया, तो समूचा देश गुस्से से उबल पड़ा। स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई और ‘वंदे मातरम’ आजादी की लड़ाई का सबसे बड़ा नारा बन गया। रवींद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में हिंदू और मुसलमानों ने एक-दूसरे की कलाइयों पर राखियां बांधीं, सड़कों पर एक साथ मार्च किया और सबने मिलकर वंदे मातरम गाया। उस समय यह गीत विभाजन के खिलाफ साझी शहादत और एकता की अटूट पहचान बन चुका था।
औपनिवेशिक चाल और सांप्रदायिक तनाव
अंग्रेज हुकूमत इस बात से भलीभांति वाकिफ थी कि अगर यह गीत इसी तरह दोनों समुदायों को जोड़ता रहा, तो साम्राज्य टिक नहीं पाएगा। ब्रिटिश अधिकारियों जैसे जॉर्ज ग्रियर्सन और पत्रकार वैलेंटाइन शिरोल ने यह नैरेटिव फैलाना शुरू किया कि ‘आनंदमठ’ उपन्यास और ‘वंदे मातरम’ का मूल भाव मुस्लिम विरोधी और विशुद्ध हिंदूवादी है।
दुखद बात यह रही कि दोनों तरफ के संकीर्ण सोच वाले तत्वों ने इस औपनिवेशिक जाल को स्वीकार कर लिया। मुस्लिम संभ्रांत वर्ग के एक हिस्से ने इसके खिलाफ पर्चे बांटने शुरू किए, वहीं दूसरी तरफ कुछ उग्र हिंदू समूहों ने इसे मस्जिदों के सामने एक शक्ति-प्रदर्शन के रूप में गाना शुरू कर दिया। जो गीत एकता की आवाज बनकर उभरा था, वह दुर्भाग्यवश राजनीतिक विवादों के भंवर में फंस गया।
6. 1937 का ऐतिहासिक फैसला और रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह
1930 के दशक तक आते-आते यह विवाद इतना बढ़ गया कि कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) को इसमें सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा। 1937 की इस समिति में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे शीर्ष नेता शामिल थे।
नेहरू ने इस संवेदनशील मसले पर राय जानने के लिए गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को पत्र लिखा। टैगोर, जिन्होंने खुद इस गीत को संगीतबद्ध कर पहली बार गाया था, ने बेहद संतुलित और व्यावहारिक जवाब दिया। टैगोर ने समझाया
> “यदि वंदे मातरम को उसके पूरे ऐतिहासिक संदर्भ और ‘आनंदमठ’ के साथ पढ़ा जाए, तो एकेश्वरवादी मान्यताओं के चलते मुस्लिम समुदाय में आशंकाएं पैदा होना स्वाभाविक है। लेकिन इस गीत के पहले दो छंद पूरी तरह से प्रकृति, नदियों और मातृभूमि की सुंदरता को समर्पित हैं। उनमें कोई धार्मिक विग्रह नहीं है। इसलिए पहले दो छंदों को राष्ट्रीय मंचों के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए और बाकी छंदों को अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए।”
पूरी कांग्रेस कार्यसमिति ने टैगोर के इस विवेकपूर्ण सुझाव को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। यह तय हुआ कि सार्वजनिक आयोजनों में केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे।
हालांकि, 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना ने नेहरू को पत्र लिखकर कह दिया कि मुस्लिम लीग को यह संशोधित रूप भी मंजूर नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व ने जिन्ना की इस हठधर्मिता को खारिज कर दिया और शुरुआती दो छंदों को आजादी की लड़ाई का अभिन्न हिस्सा बनाए रखा।
7. ‘जन-गण-मन’ को क्यों चुना गया राष्ट्रगान?
अक्सर आज के सोशल मीडिया पर यह मनगढ़ंत आरोप लगाया जाता है कि नेहरू ने जिन्ना या किसी खास समुदाय को खुश करने के लिए वंदे मातरम को किनारे कर ‘जन-गण-मन’ को राष्ट्रगान बना दिया। प्रख्यात इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी ने अपनी किताब ‘सॉन्ग ऑफ इंडिया’ में ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर इन भ्रांतियों की असलियत सामने रखी है
1. नेहरू के दस्तावेज और व्यावहारिक तर्क
21 मई 1948 के एक कैबिनेट नोट में पंडित नेहरू ने लिखा था कि किसी स्वतंत्र देश का राष्ट्रगान सिर्फ सुंदर शब्दों की रचना नहीं हो सकता; उसमें एक खास ऑर्केस्ट्राई धुन, लय और गति होनी चाहिए जिसे विदेशी दौरों पर, सेना के ब्रास बैंड द्वारा और परेड में आसानी से बजाया जा सके। जन-गण-मन इस संगीत और अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर अधिक सटीक बैठता था।
15 जून 1948 को बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को लिखे पत्र में नेहरू ने स्पष्ट किया
> “वंदे मातरम हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के बलिदान और इतिहास का अमर गवाह है, जबकि जन-गण-मन आने वाले कल के, भविष्य के स्वतंत्र और बहुसांस्कृतिक भारत की एक समावेशी तस्वीर पेश करता है।”
2. जॉर्ज पंचम वाला झूठा आरोप
एक दूसरा दुष्प्रचार यह फैलाया जाता है कि टैगोर ने ‘जन-गण-मन’ 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा था। इतिहासकार मुखर्जी टैगोर के 1937 के उस पत्र का हवाला देते हैं जो उन्होंने पुलिन बिहारी सेन को लिखा था। टैगोर ने अत्यंत क्रोध में लिखा था
> “सरकार में ऊंचे ओहदे पर बैठे मेरे एक दोस्त ने मुझसे जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में गीत लिखने का आग्रह किया था। उस अनुरोध ने मुझे स्तब्ध और आक्रोशित कर दिया। उसी आक्रोश के जवाब में मैंने ‘जन-गण-मन अधिनायक’ की रचना की, जिसमें मैंने उस शाश्वत ‘भारत भाग्य विधाता’ (ईश्वर/सत्य) की जयकार की, जो सदियों से इंसानी रथ का सारथी है। वह शाश्वत शक्ति कोई जॉर्ज पंचम या जॉर्ज छठा कभी नहीं हो सकता।”
3. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की दूर दृष्टि
नेहरू या संविधान सभा से बहुत पहले, 2 नवंबर 1942 को जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में ‘फ्री इंडिया सेंटर’ की स्थापना की थी, तब उन्होंने स्वयं ‘जन-गण-मन’ को आजाद भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया था और उसकी धुन तैयार करवाई थी।
8. संविधान सभा का फैसला–
24 जनवरी 1950: यह सोचना पूरी तरह गलत है कि वंदे मातरम को जन-गण-मन के बराबर का दर्जा आज जाकर मिला है। हमारे संविधान निर्माताओं ने 76 साल पहले ही यह बराबरी स्थापित कर दी थी।
24 जनवरी 1950 को जब संविधान सभा का अंतिम सत्र चल रहा था, तब संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सदन के सामने एक ऐतिहासिक घोषणा की थी-
> “शब्दों और संगीत से युक्त रचना ‘जन-गण-मन’ भारत का राष्ट्रगान (National Anthem) होगी। और वह गीत ‘वंदे मातरम’, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक और अमर भूमिका निभाई है, उसे जन-गण-मन के बिल्कुल बराबर का सम्मान और दर्जा प्राप्त होगा (shall have equal status with it)।”
संविधान सभा ने दोनों को एक समान गरिमा दी थी। फर्क केवल इतना था कि सामूहिक रूप से गाए जाने और अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल के लिए ‘जन-गण-मन’ को चुना गया, जबकि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत (National Song) का पावन दर्जा दिया गया।
9. राष्ट्रीय ध्वज का समाजशास्त्र- प्रतीक क्यों जरूरी हैं?
गीतों से आगे बढ़कर जब हम तिरंगे की बात करते हैं, तो सवाल उठता है कि किसी समाज या मुल्क को एक झंडे की जरूरत क्यों होती है?
संकेत विज्ञान (Semiotics) का नजरिया
महान भाषाशास्त्री फर्डिनांड डी सॉसर ने बताया था कि मानव सभ्यता प्रतीकों और अर्थों के आपसी रिश्ते से चलती है। हमारा दिमाग जब भी कोई अमूर्त भावना (जैसे देश, प्यार, त्याग, वफादारी) महसूस करना चाहता है, तो उसे एक ठोस आकार या तस्वीर की जरूरत होती है। झंडा किसी राष्ट्र के भूगोल, इतिहास, मूल्यों और आकांक्षाओं का एक दृश्य रूप (Visual Narrative) होता है।
समाजशास्त्रियों के सिद्धांत
एमिल दुर्खीम ने ‘कलेक्टिव इफरवेसेंस’ (सामूहिक उल्लास) का सिद्धांत दिया। जब लाखों लोग एक साझा झंडे के नीचे खड़े होते हैं, तो वे अपनी व्यक्तिगत पहचान भूलकर एक वृहद सामूहिक शक्ति का अनुभव करते हैं।
बेनेडिक्ट एंडरसन ने राष्ट्र को ‘इमेजिन्ड कम्युनिटी’ (काल्पनिक समुदाय) कहा। भारत जैसे विशाल देश में रहने वाला एक कश्मीरी, कन्याकुमारी के मछुआरे से कभी नहीं मिला, न ही असम का चाय बागान कर्मी गुजरात के व्यापारी की भाषा समझता है। लेकिन जब तिरंगा लहराता है, तो वे सब खुद को एक साझा धागे में पिरोया हुआ पाते हैं। झंडा अनजान लोगों को जोड़ने वाला सबसे जादुई गोंद है।
10.हमारे तिरंगे की विकास यात्रा
(1906 से 1947 तक): हमारा तिरंगा अचानक एक दिन में बनकर तैयार नहीं हुआ यह स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ विकसित हुआ
1906 (कोलकाता)– पारसी बागान स्क्वायर में देश का पहला गैर-सरकारी राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इसमें तीन क्षैतिज पट्टियां थीं—ऊपर हरा, बीच में पीला और नीचे लाल। ऊपर हरी पट्टी में 8 अधखिले कमल थे, बीच में देवनागरी में ‘वंदे मातरम’ लिखा था और नीचे सूरज व अर्धचंद्र बने थे।
1907 (स्टटगार्ट, जर्मनी)– मैडम भीकाजी कामा ने अपने साथियों के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय ध्वज फहराया। इसमें कमल की जगह ‘सप्तर्षि’ के प्रतीक सात तारे जोड़े गए।
1917 (होम रूल आंदोलन): बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने एक नया झंडा प्रस्तुत किया, जिसमें पांच लाल और चार हरी पट्टियां थीं। हालांकि इसमें एक कोने में यूनियन जैक भी शामिल था, जो उस दौर के डोमिनियन स्टेटस की मांग को दर्शाता था।
1921 (विजयवाड़ा कांग्रेस)- आंध्र प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने एक ध्वज तैयार किया जिसमें लाल और हरा रंग था। महात्मा गांधी ने इसे देखा और इसमें दो महत्वपूर्ण बदलाव सुझाए—अन्य सभी अल्पसंख्यकों और शांति के प्रतीक के रूप में बीच में सफेद पट्टी जोड़ी जाए, और देश की आत्मनिर्भरता व श्रम के सम्मान के लिए बीच में चरखा रखा जाए।
1931 (कराची अधिवेशन)- कांग्रेस ने औपचारिक रूप से नया तिरंगा अपनाया। रंगों की व्याख्या से सांप्रदायिक अर्थ हटा दिए गए। केसरिया रंग शौर्य और त्याग का, सफेद रंग सत्य और शांति का, तथा हरा रंग विश्वास और समृद्धि का प्रतीक बना।
22 जुलाई 1947 (संविधान सभा)- आजादी से ठीक पहले संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। इसमें चरखे की जगह सम्राट अशोक के सारनाथ सिंह स्तंभ से लिया गया ‘धर्मचक्र’ स्थापित किया गया। 24 तीलियों वाला यह नेवी ब्लू चक्र निरंतरता, गतिशीलता और न्याय का संदेश देता है।
11.आरएसएस और तिरंगे पर ऐतिहासिक विमर्श
आजादी के बाद तिरंगे को लेकर एक राजनीतिक बहस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के रुख को लेकर भी रही है
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि- कांग्रेस और अन्य दल अक्सर यह आरोप लगाते रहे कि 2002 से पहले संघ मुख्यालय पर नियमित रूप से तिरंगा नहीं फहराया जाता था। 1925 में संघ की स्थापना के समय से ही संगठन ने ‘भगवा ध्वज’ को अपना सर्वोच्च गुरु और सांस्कृतिक प्रतीक माना था। संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ के शुरुआती कुछ लेखों और द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) की पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में भगवा ध्वज को प्राचीन राष्ट्र का शाश्वत ध्वज बताया गया था।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य- हालांकि समय के साथ यह स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हुई है। वर्तमान संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कई सार्वजनिक मंचों पर दोहराया है कि संघ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का पूरा सम्मान करता है। उन्होंने कहा है कि तिरंगे की आन, बान और शान की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वालों में संघ के स्वयंसेवक हमेशा सबसे आगे रहे हैं और रहेंगे।
12. सिनेमा का संदेश ‘रोजा’ और गुलिस्तां की हिफाजत
इस पूरे विमर्श को मणिरत्नम की 1992 की कालजयी फिल्म ‘रोजा’ के उस मशहूर दृश्य से बहुत खूबसूरती से समझा जा सकता है।
फिल्म में जब आतंकवादी कश्मीर की वादियों में बंधक बने नायक के सामने तिरंगे को आग लगाने की कोशिश करते हैं, तो वह निहत्था नौजवान अपनी जान की परवाह किए बिना आग की लपटों से घिरे तिरंगे पर कूद पड़ता है और अपने शरीर से उस आग को बुझाता है। उस समय पृष्ठभूमि में ए.आर. रहमान के संगीत और पी.के. मिश्रा के लिखे बोल गूंजते हैं
> “उजड़े नहीं अपना चमन, टूटे नहीं अपना वतन…
> गुमराह न कर दे कोई, बर्बाद न कर दे कोई…
> मंदिर यहां, मस्जिद यहां, हिंदू यहां, मुस्लिम यहां,
> मिलते रहें हम प्यार से यारा, सबसे प्यारा गुलिस्तां हमारा…”
यह दृश्य और यह गीत हमें बताता है कि तिरंगा या वंदे मातरम किसी की निजी मिल्कियत नहीं हैं; ये इस मुल्क के हर नागरिक के प्रेम, दर्द और साझा कुर्बानियों का प्रतीक हैं।
आखरी बात – बंधुत्व ही राष्ट्र की असली ताकत है
मेरी बंधुत्व फेलोशिप के इन सात महीनों ने मुझे यही सिखाया है कि किसी भी देश की महानता इस बात में नहीं होती कि उसके नागरिक एक-दूसरे को देशभक्ति साबित करने के लिए कठघरे में खड़ा करें। असली महानता इस बात में होती है कि क्या हम अपने देश के हर तबके के सुख-दुख, उसकी विविधता और उसकी अस्मिता का सम्मान कर पा रहे हैं या नहीं।
चाहे वह बंकिम बाबू का ‘वंदे मातरम’ हो, जिसने गुलामी की जंजीरों में जकड़े हिंदुस्तान को रीढ़ की हड्डी दी;
चाहे वह टैगोर का ‘जन-गण-मन’ हो, जो पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा से लेकर द्रविड़, उत्कल, बंग तक समूचे भारत के साझा भाग्य को एक सुर में बांधता है;
या फिर पिंगली वेंकैया का रचा और संविधान सभा द्वारा स्वीकृत हमारा ‘तिरंगा’ हो—
ये सभी प्रतीक हमारे भीतर एक-दूसरे के प्रति प्रेम, न्याय और बंधुत्व जगाने के लिए हैं, न कि आपस में दीवारें खड़ी करने के लिए। कानून अपना काम करेगा, अदालतें अपना काम करेंगी, लेकिन एक नागरिक के तौर पर हमारा यह साझा दायित्व है कि हम इन प्रतीकों की आड़ में अपने समाज के आपसी सौहार्द को कभी आंच न आने दें। जब तक इस गुलिस्तां में हर फूल अपनी पूरी खुशबू के साथ खिलता रहेगा, तभी तक हमारे राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राष्ट्रध्वज की असली शान सलामत रहेगी।
मे एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हु लगभग 17 वर्ष हरदा मे सामाजिक संस्थाओ मे काम किया है जमीन पर – उसी के साथ अपनी बात रखता हु
संदर्भ- प्रस्तुत आलेख के तथ्य और विचार मुख्य रूप से इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के विशेष वीडियो पर आधारित हैं, जिसमें इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी की पुस्तक ‘ए सॉन्ग ऑफ इंडिया’, तनिका सरकार के शोध ‘बर्थ ऑफ अ गॉडेस’, सव्यसाची भट्टाचार्य की ‘वंदे मातरम’, बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ व पत्रिका ‘बंग दर्शन’, एम.एस. गोलवलकर की ‘बंच ऑफ थॉट्स’, 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की आधिकारिक घोषणा, ‘द प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट (1971 व संशोधन)’, अक्टूबर 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव, फर्डिनांड डी सॉसर, एमिल दुर्खीम व बेनेडिक्ट एंडरसन के समाजशास्त्रीय सिद्धांतों तथा फिल्म ‘रोजा’ (1992) के सांस्कृतिक प्रसंगों का संदर्भ लेकर जानकारी संकलित की गई है।



