
गुरु केवल पढ़ाता नहीं, पीढ़ियां गढ़ता है
शिक्षक दिवस पर एक सवाल—हम शिक्षा से केवल रोजगार चाहते हैं या एक बेहतर मनुष्य भी?एसे नि प्र अ शिवशक्ति शर्मा
ताल ब्यूरो चीफ शिवशक्ति शर्मा
शिक्षक दिवस आते ही विद्यालयों में शुभकामनाओं की बाढ़ आ जाती है। फूल दिए जाते हैं, अभिनंदन होता है, मंच सजते हैं और शिक्षक के गौरव का गुणगान किया जाता है। यह सब आवश्यक है, लेकिन क्या शिक्षक दिवस की सार्थकता केवल एक दिन के सम्मान तक सीमित रहनी चाहिए?
शायद नहीं।
क्योंकि शिक्षक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं, जो केवल पाठ्यक्रम पूरा कर दे। वह उस पीढ़ी का निर्माता है, जिसके हाथों में कल समाज, राष्ट्र और मानवता की बागडोर आने वाली है।
किताबें ज्ञान दे सकती हैं, इंटरनेट सूचनाओं का अथाह भंडार खोल सकता है और तकनीक सीखने की गति बढ़ा सकती है; लेकिन सही और गलत के बीच अंतर करने का विवेक, असफलता में धैर्य, सफलता में विनम्रता और दूसरों के दर्द को समझने की संवेदना—इनका पाठ किसी मशीन से नहीं, एक अच्छे शिक्षक के व्यक्तित्व से सीखा जाता है।
आज शिक्षा अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। बच्चे के हाथ में पुस्तक से अधिक शक्तिशाली उपकरण मोबाइल है। दुनिया उसकी उंगलियों पर है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इतनी जानकारी के बावजूद दिशा का संकट बढ़ता दिखाई देता है।
यहीं शिक्षक की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
आज का शिक्षक केवल ब्लैकबोर्ड पर लिखने वाला व्यक्ति नहीं है। उसे विद्यार्थी को सूचना के समुद्र में सत्य की पहचान, प्रतिस्पर्धा के बीच मानवीयता, उपलब्धियों के बीच विनम्रता और अधिकारों के साथ कर्तव्य का बोध कराना है।
शिक्षा का अंतिम लक्ष्य नौकरी नहीं, योग्य मनुष्य होना है।
यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था प्रतिभाशाली इंजीनियर, डॉक्टर, अधिकारी और व्यवसायी तो तैयार कर दे, लेकिन उनमें ईमानदारी, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व पैदा न कर पाए, तो हमें अपनी सफलता के अर्थ पर पुनर्विचार करना होगा।
एक शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके विद्यार्थी कितने ऊंचे पदों तक पहुंचे; उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसके विद्यार्थी ऊंचे पद पर पहुंचकर भी मनुष्य बने रहें।
गुरु की महानता इसी में है कि वह अपने शिष्य को अपने जैसा बनाने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसे उससे बेहतर बनने की राह दिखाता है।
समाज को भी यह समझना होगा कि शिक्षक से केवल परीक्षा परिणाम मांगना पर्याप्त नहीं है। हम उससे चरित्र निर्माण की अपेक्षा करते हैं तो उसे सम्मान, विश्वास, स्वतंत्रता और आवश्यक संसाधन भी देने होंगे। जिस समाज में शिक्षक का सम्मान घटता है, वहां शिक्षा का स्तर ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों का चरित्र भी प्रभावित होता है।
और शिक्षकों के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। गुरु होना केवल पद नहीं, एक नैतिक दायित्व है। विद्यार्थी शिक्षक की कही हुई बात से कहीं अधिक उसके व्यवहार से सीखता है। इसलिए शिक्षक की ईमानदारी ही उसका सबसे प्रभावशाली पाठ और उसका चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पाठ्यपुस्तक है।
आज शिक्षक दिवस पर हमें फूलों से आगे बढ़कर एक संकल्प लेना होगा—ऐसी शिक्षा का, जिसमें ज्ञान हो तो विवेक भी हो, सफलता हो तो संवेदना भी हो और प्रतिस्पर्धा हो तो मानवता भी बची रहे।
क्योंकि—
कक्षा में बैठा प्रत्येक बच्चा केवल विद्यार्थी नहीं,
भविष्य का नागरिक है;
और उसके भविष्य की पहली इबारत
शिक्षक के हाथों से लिखी जाती है।
अंतिम बात
इमारतें राष्ट्र का ढांचा खड़ा करती हैं,
लेकिन शिक्षक राष्ट्र का चरित्र गढ़ते हैं।
इसलिए शिक्षक का सम्मान केवल एक दिन की रस्म नहीं—
यह उस भविष्य का सम्मान है, जिसे हम आने वाली पीढ़ियों के हाथों सौंपने जा रहे हैं।
शिक्षक दिवस पर समस्त गुरुजनों को सादर नमन।



