नीमचमध्यप्रदेश
लुप्त होती संस्कृति को जीवंत रखे हुए हैं नीमच के अशोक सैनी

लुप्त होती संस्कृति को जीवंत रखे हुए हैं नीमच के अशोक सैनी
नीमच। आधुनिकता की तेज दौड़ में जहां हमारी लोक परंपराएं और धार्मिक सांस्कृतिक विरासत धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं, वहीं नीमच के 63 वर्षीय अशोक कुमार सैनी आज भी अपनी आस्था, समर्पण और भावनाओं के माध्यम से इस संस्कृति को जीवंत रखने का अनूठा कार्य कर रहे हैं। वे भगवान शंकर का स्वरूप धारण कर धार्मिक यात्राओं और आयोजनों में नृत्य करते हैं। उनकी यह साधना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भगवान के प्रति गहरी श्रद्धा और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण का भाव है।
नीमच के गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल से लिपिक के पद से सेवानिवृत्त अशोक कुमार सैनी वर्ष 2008 से भगवान शंकर का स्वरूप धारण कर धार्मिक यात्राओं में शामिल होते आ रहे हैं। सिर पर जटाओं का स्वरूप, शरीर पर धार्मिक वेशभूषा और चेहरे पर शिवभाव के साथ जब वे भजनों की धुन पर नृत्य करते हैं तो श्रद्धालुओं में भक्ति और उत्साह का वातावरण निर्मित हो जाता है। उनके नृत्य में केवल कला नहीं, बल्कि आस्था की गहराई दिखाई देती है।
मां को रामचरितमानस सुनाते-सुनाते जागा भाव
अशोक सैनी बताते हैं कि उनके जीवन में इस धार्मिक यात्रा की शुरुआत एक बेहद भावुक प्रसंग से हुई। वे अपनी माताजी को प्रतिदिन श्रीरामचरितमानस पढ़कर सुनाया करते थे। रामचरितमानस के नियमित पाठ और उसके प्रसंगों से उनके मन में धीरे-धीरे धार्मिक भावनाएं और गहरी होती चली गईं। इसी दौरान उनके भीतर यह भावना जागृत हुई कि वे भगवान शंकर के भजनों पर नृत्य करें और शिवस्वरूप में अपनी श्रद्धा व्यक्त करें।
यही भाव आगे चलकर उनके जीवन का संकल्प बन गया। वर्ष 2008 में उन्होंने पहली बार भगवान शंकर का स्वरूप धारण किया और तब से आज तक धार्मिक यात्राओं में इसी रूप में शामिल होकर अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं।
शिवस्वरूप में दिखती है भक्ति की अनुभूति
अशोक सैनी के लिए भगवान शंकर का स्वरूप धारण करना किसी प्रदर्शन का माध्यम नहीं है। वे इसे अपनी आस्था और भावनाओं की अभिव्यक्ति मानते हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान जब शिव भजनों की गूंज होती है और वे उसी भाव में नृत्य करते हैं, तो वातावरण भक्तिमय हो उठता है। उन्हें देखने वाले श्रद्धालु भी शिवभक्ति में डूब जाते हैं।
उनकी यह पहल आज की पीढ़ी के लिए भी एक संदेश है कि संस्कृति केवल पुस्तकों और धार्मिक ग्रंथों में सुरक्षित रखने की वस्तु नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण, परंपराओं और भावनाओं के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी हमारी जिम्मेदारी है।
परंपराओं को बचाने का मौन प्रयास
आज जब पारंपरिक लोक कलाओं और धार्मिक स्वरूपों को अपनाने वाले लोग कम होते जा रहे हैं, ऐसे समय में अशोक सैनी का वर्षों से किया जा रहा यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है। उन्होंने अपने शौक को आस्था से जोड़ा और अपनी आस्था को संस्कृति की सेवा का माध्यम बना दिया।
मां को रामचरितमानस सुनाने से शुरू हुआ भाव आज भगवान शंकर के स्वरूप में उनकी पहचान बन चुका है। अशोक सैनी की कहानी यह बताती है कि यदि मन में श्रद्धा और संस्कारों के प्रति सम्मान हो, तो एक व्यक्ति भी अपनी परंपरा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनकी शिवभक्ति और सांस्कृतिक समर्पण नीमच की धार्मिक एवं लोक परंपरा को निरंतर जीवंत बनाए रखने वाली प्रेरणादायी मिसाल है।
नीमच के गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल से लिपिक के पद से सेवानिवृत्त अशोक कुमार सैनी वर्ष 2008 से भगवान शंकर का स्वरूप धारण कर धार्मिक यात्राओं में शामिल होते आ रहे हैं। सिर पर जटाओं का स्वरूप, शरीर पर धार्मिक वेशभूषा और चेहरे पर शिवभाव के साथ जब वे भजनों की धुन पर नृत्य करते हैं तो श्रद्धालुओं में भक्ति और उत्साह का वातावरण निर्मित हो जाता है। उनके नृत्य में केवल कला नहीं, बल्कि आस्था की गहराई दिखाई देती है।
मां को रामचरितमानस सुनाते-सुनाते जागा भाव
अशोक सैनी बताते हैं कि उनके जीवन में इस धार्मिक यात्रा की शुरुआत एक बेहद भावुक प्रसंग से हुई। वे अपनी माताजी को प्रतिदिन श्रीरामचरितमानस पढ़कर सुनाया करते थे। रामचरितमानस के नियमित पाठ और उसके प्रसंगों से उनके मन में धीरे-धीरे धार्मिक भावनाएं और गहरी होती चली गईं। इसी दौरान उनके भीतर यह भावना जागृत हुई कि वे भगवान शंकर के भजनों पर नृत्य करें और शिवस्वरूप में अपनी श्रद्धा व्यक्त करें।
यही भाव आगे चलकर उनके जीवन का संकल्प बन गया। वर्ष 2008 में उन्होंने पहली बार भगवान शंकर का स्वरूप धारण किया और तब से आज तक धार्मिक यात्राओं में इसी रूप में शामिल होकर अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं।
शिवस्वरूप में दिखती है भक्ति की अनुभूति
अशोक सैनी के लिए भगवान शंकर का स्वरूप धारण करना किसी प्रदर्शन का माध्यम नहीं है। वे इसे अपनी आस्था और भावनाओं की अभिव्यक्ति मानते हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान जब शिव भजनों की गूंज होती है और वे उसी भाव में नृत्य करते हैं, तो वातावरण भक्तिमय हो उठता है। उन्हें देखने वाले श्रद्धालु भी शिवभक्ति में डूब जाते हैं।
उनकी यह पहल आज की पीढ़ी के लिए भी एक संदेश है कि संस्कृति केवल पुस्तकों और धार्मिक ग्रंथों में सुरक्षित रखने की वस्तु नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण, परंपराओं और भावनाओं के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी हमारी जिम्मेदारी है।
परंपराओं को बचाने का मौन प्रयास
आज जब पारंपरिक लोक कलाओं और धार्मिक स्वरूपों को अपनाने वाले लोग कम होते जा रहे हैं, ऐसे समय में अशोक सैनी का वर्षों से किया जा रहा यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है। उन्होंने अपने शौक को आस्था से जोड़ा और अपनी आस्था को संस्कृति की सेवा का माध्यम बना दिया।
मां को रामचरितमानस सुनाने से शुरू हुआ भाव आज भगवान शंकर के स्वरूप में उनकी पहचान बन चुका है। अशोक सैनी की कहानी यह बताती है कि यदि मन में श्रद्धा और संस्कारों के प्रति सम्मान हो, तो एक व्यक्ति भी अपनी परंपरा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनकी शिवभक्ति और सांस्कृतिक समर्पण नीमच की धार्मिक एवं लोक परंपरा को निरंतर जीवंत बनाए रखने वाली प्रेरणादायी मिसाल है।
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