जैविक खाद के ढोल पीटने से खेती नहीं सुधरेगी, गुणवत्ता की गारंटी जरूरी – अशोक कुमठ

जैविक खाद के ढोल पीटने से खेती नहीं सुधरेगी, गुणवत्ता की गारंटी जरूरी – अशोक कुमठ
पिपलिया स्टेशन (निप्र)। देशभर में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, लेकिन केवल नारों और प्रचार अभियानों से खेती में सुधार संभव नहीं है। जब तक जैविक खादों की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं होगी और किसानों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उत्पाद उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे, तब तक जैविक खेती के नाम पर किसानों को भ्रमित करने की स्थिति बनी रहेगी। यह बात एफएआई नई दिल्ली के सदस्य अशोक कुमठ ने “रासायनिक खाद का विकल्प जैविक खाद” विषय पर आयोजित ऑनलाइन कार्यशाला में कही। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में देश में रासायनिक खादों के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि देश की खाद्य सुरक्षा और उत्पादन बढ़ाने में रासायनिक खादों की अहम भूमिका रही है। आज भारत जिस स्तर पर खाद्यान्न उत्पादन कर रहा है और विदेशों तक अनाज निर्यात कर पा रहा है, उसमें यूरिया, डीएपी, एनपीके, सुपर फास्फेट एवं पोटाश जैसे उर्वरकों का महत्वपूर्ण योगदान है। कुमठ ने बताया कि देश में प्रतिवर्ष लगभग 100 लाख टन डीएपी तथा 400 लाख टन यूरिया का उपयोग खेती में किया जाता है। इतनी बड़ी मात्रा में उपयोग होने वाले रासायनिक खादों को एकदम बंद कर पूरी तरह जैविक खेती अपनाने की बात व्यवहारिक नहीं कही जा सकती। उन्होंने कहा कि किसानों को उत्पादन भी चाहिए और मिट्टी की उर्वरता भी बचानी है, इसलिए संतुलित और वैज्ञानिक खेती की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि रासायनिक खादों की गुणवत्ता “खाद नियंत्रण आदेश 1985” के तहत तय मानकों से नियंत्रित होती है। फैक्ट्री स्तर पर खाद की गुणवत्ता की जांच की जाती है और उसके बाद ही बाजार में विक्रय की अनुमति मिलती है। इतना ही नहीं, बिक्री के दौरान भी खाद के नमूने लेकर प्रयोगशालाओं में परीक्षण कराया जाता है। यदि खाद मानक स्तर से कम पाई जाती है तो आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 8/7 के तहत एफआईआर दर्ज होने के साथ जेल तक की कार्रवाई हो सकती है। इसके विपरीत जैविक खादों के क्षेत्र में कोई प्रभावी नियंत्रण व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि आज कई कंपनियां आकर्षक पैकिंग और बड़े-बड़े दावों के साथ “भूमि सुधारक”, “जैविक डीएपी” एवं अन्य नामों से उत्पाद बाजार में बेच रही हैं, लेकिन उनमें आवश्यक पोषक तत्व कितनी मात्रा में हैं और उनकी वास्तविक गुणवत्ता क्या है, इसका कोई प्रमाण नहीं होता। कुमठ ने कहा कि बिना प्रमाणित जैविक खादों के भरोसे खेती करना किसानों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है। यदि फसल को पर्याप्त नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश नहीं मिलेगा तो उत्पादन प्रभावित होगा और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि जैविक खादों की गुणवत्ता की गारंटी तय की जाए और उनके लिए भी स्पष्ट नियम बनाए जाएं। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में सरकार किसानों को राहत देने के लिए भारी सब्सिडी दे रही है। यूरिया की वास्तविक लागत लगभग 4 हजार रुपए प्रति बैग तक पहुंच रही है, लेकिन किसानों को यह मात्र करीब 270 रुपए प्रति बैग में उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके लिए सरकार को करोड़ों रुपए की सब्सिडी देनी पड़ती है। कुमठ ने कहा कि हाल ही में लगभग 25 लाख टन यूरिया का आयात 950 डॉलर प्रति टन की दर से किया गया है, जो पहले की तुलना में काफी महंगा है। इसके बावजूद किसानों को कम दर पर खाद उपलब्ध कराई जा रही है। हालांकि असंतुलित उपयोग के कारण सब्सिडी का बड़ा हिस्सा व्यर्थ भी जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि रासायनिक खादों का उपयोग पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक तरीके से इसका उपयोग कम जरूर किया जा सकता है। इसके लिए किसानों को संतुलित खाद उपयोग, सॉयल हेल्थ कार्ड तथा जैविक विकल्पों की सही जानकारी देना जरूरी है। कुमठ ने कहा कि जैविक खेती के लिए प्रति एकड़ 15 से 20 ट्रॉली गोबर खाद की आवश्यकता बताई जाती है, लेकिन अधिकांश किसानों के पास इतनी मात्रा में गोबर खाद उपलब्ध ही नहीं है। ऐसे में किसान जैविक खेती के नाम पर आखिर खेत में क्या डालें, यह बड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि सरकार ने यूरिया और डीएपी के विकल्प के रूप में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उत्पादन शुरू किया है। इसी तरह प्रमाणित जैविक खादों का भी बड़े स्तर पर उत्पादन होना चाहिए और खेतों में परीक्षण के बाद किसानों के विश्वास के साथ बाजार में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कुमठ ने सुझाव दिया कि डीएपी के महंगे आयात को कम करने के लिए देश में निर्मित सुपर फास्फेट खाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि देशभर में इसके करीब 50 संयंत्र संचालित हैं, जो किसानों की मांग पूरी करने में सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि खेती को टिकाऊ और सुरक्षित बनाने के लिए सॉयल हेल्थ कार्ड को अनिवार्य करना होगा। साथ ही “लैब टू लैंड” योजना को निरंतर जारी रखना जरूरी है, ताकि वैज्ञानिक तकनीक और शोध सीधे किसानों तक पहुंच सके। कार्यशाला में किसानों और कृषि विशेषज्ञों ने भी जैविक एवं रासायनिक खेती के संतुलित उपयोग पर अपने विचार रखे। अंत में किसानों को वैज्ञानिक खेती अपनाने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने का संदेश दिया गया।



