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स्वामी हरिदासराम महाराज त्याग, तपस्या की प्रतिमूर्ति थे – संत शंभूलाल

स्वामी हरिदासराम महाराज त्याग, तपस्या की प्रतिमूर्ति थे – संत शंभूलाल
मंदसौर। श्री प्रेमप्रकाश पंथ की चौथी (चतुर्थ) पातशाही मर्यादापूर्ति सद्गुरु स्वामी हरिदासराम महाराज का 97वाँ जन्मोत्सव देश-विदेश के साथ मंदसौर स्थित श्री प्रेम प्रकाश आश्रम में संत श्री शंभूलालजी प्रेम प्रकाशी के सानिध्य में श्रद्धा, उमंग एवं उत्साह के साथ मनाया गया। गुरु भक्त संगत ने मिलकर उत्सव को भव्य रूप प्रदान कर दिया। संत श्री ने सात दिवसीय श्रीमद् भगवद्गीता एवं श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ के पाठों का भोग एवं परायण कर समापन किया। 51 दीप प्रज्वलित कर आरती की गई और केक व महाप्रसादी का भोग लगाया गया, तो श्रद्धालु संगत ने बधाई गीतों पर नाचते हुए प्यारे गुरुदेव स्वामी हरिदासराम का जन्मोत्सव मनाया।इस आशय की जानकारी श्री प्रेम प्रकाश सेवा मंडली के अध्यक्ष पुरुषोत्तम शिवानी ने देते हुए बताया कि इस पावन अवसर पर संत श्री शंभूलाल ने अपने मुखारविंद से सत्संग सभा में उपस्थित संगत पर अपनी अमृतमयी वर्षा करते हुए कहा कि सद्गुरु स्वामी हरिदासजी महाराज का अवतार 1930 में अविभाजित हिन्दुस्तान के सिंध प्रांत में माता मोतल बाई व पिता हीरानंद के यहाँ हुआ था। वे प्रारंभ से ही त्याग, तपस्या, वैराग्य व सादगीपूर्ण जीवन के पुजारी थे।
आपने अपने भजन के माध्यम से स्वामीजी के जीवन पर प्रकाश डाला और कहा कि स्वामीजी त्याग, तपस्या व सादगी की प्रतिमूर्ति थे। प्रति वर्ष स्वामी जी का जन्म मोहिनी एकादशी तिथि के दिन आता है। आपने मोहिनी एकादशी व्रत के महात्म्य को समझाते हुए कहा कि प्राणी को सदैव संतों का संग करना चाहिए। संतों की संगत से मनुष्य को न केवल सद्बुद्धि प्राप्त होती है, अपितु उसके जीवन का उद्धार हो जाता है। एकादशी के दिन प्राणी को फलाहार के साथ-साथ रात्रि में भगवान की आराधना से अत्यधिक फल की प्राप्ति होती है। स्वामी हरिदासराम महाराज ने अपना संपूर्ण जीवन अपने सतगुरु सर्वानंद महाराज की सेवा में समर्पित कर दिया था।
प्रारंभ में संत श्री ने स्वामी हरिदासराम महाराज के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलित किया। अंत में केक प्रसाद व हर्षोल्लास के साथ ‘‘पल्लव’’ पाकर समाप्ति के उपरांत आभार प्रदर्शन महिला मंडली प्रमुख पुष्पा पमनानी एवं सुरेश बाबानी ने व्यक्त किया।



