जबलपुरआलेख/ विचारमध्यप्रदेश

नई परिवहन नीति – हाशिए पर खड़ा ग्रामीण बस ऑपरेटर, ड्राइवर और कंडक्टर

नई परिवहन नीति – हाशिए पर खड़ा ग्रामीण बस ऑपरेटर, ड्राइवर और कंडक्टर

✍️राकेश यादव की कलम से

मध्यप्रदेश सरकार की ‘मुख्यमंत्री सुगम लोक परिवहन सेवा’ और ‘PPP मॉडल’ की गूँज शहरों में तो आधुनिकता का अहसास करा रही है, लेकिन प्रदेश की पगडंडियों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर बस दौड़ाने वाले स्थानीय बस मालिकों और कर्मचारियों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हैं।

सवाल यह है कि जब बड़ी कंपनियाँ और सरकारी अनुबंध मैदान में उतरेंगे, तो उन छोटे बस संचालकों का क्या होगा जिन्होंने दशकों से परिवहन की लाइफलाइन को थामे रखा है?

1. ग्रामीण बस मालिकों का संकट अस्तित्व की लड़ाई

ग्रामीण क्षेत्रों में बस चलाना केवल व्यापार नहीं, बल्कि एक कठिन सेवा रही है। खराब सड़कें और कम सवारी के बावजूद स्थानीय मालिकों ने अपनी बसें चलाईं।

पूंजी का अभाव – PPP मॉडल में अक्सर बड़े टेंडर और भारी बैंक गारंटी की शर्तें होती हैं, जिन्हें छोटा बस मालिक पूरा नहीं कर पाता।

रूट का छिनना – अगर मुनाफे वाले ग्रामीण रूट बड़ी कंपनियों को दे दिए गए, तो स्थानीय ऑपरेटरों के पास केवल ‘घाटे वाले रूट’ बचेंगे, जिससे उनका दिवाला निकलना तय है।

2. ड्राइवर और कंडक्टर- अनिश्चित भविष्य

प्रदेश में हजारों परिवार बस ड्राइविंग और कंडक्टरी पर निर्भर हैं। नई नीति में उनके लिए निम्नलिखित चुनौतियाँ हैं-

रोजगार की सुरक्षा- निजी ऑपरेटरों के साथ अनुबंध होने पर पुराने स्टाफ को प्राथमिकता मिलेगी या नहीं, इस पर नीति मौन है।.

काम की शर्तें,– बड़ी कंपनियों के आने से अक्सर काम के घंटे बढ़ जाते हैं और ‘कॉन्ट्रैक्ट लेबर’ संस्कृति की वजह से सामाजिक सुरक्षा (PF, बीमा) का लाभ नहीं मिल पाता।

सरकार को इन 4 बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए।सरकार को चाहिए कि वह इस नीति को केवल ‘कॉर्पोरेट’ चश्मे से न देखे, बल्कि इसमें

स्थानीयता’ का समावेश करे-

आरक्षण – ग्रामीण और छोटे रूटों पर स्थानीय बस मालिकों के लिए 50% का कोटा अनिवार्य किया जाना चाहिए

अनुभव को वरीयता – नई सेवा में उन्हीं ड्राइवरों और कंडक्टरों को प्राथमिकता दी जाए जो पहले से उन रूटों पर काम कर रहे हैं।

सरल टेंडर प्रक्रिया – छोटे ऑपरेटरों के लिए टेंडर की शर्तें आसान हों ताकि वे ‘को-ऑपरेटिव’ (समूह) बनाकर भाग ले सकें। |

सब्सिडी और लोन – स्थानीय मालिकों को पुरानी बसें बदलकर नई ‘सुगम सेवा’ मानक की बसें खरीदने के लिए कम ब्याज पर लोन मिले

अंत मे- परिवहन व्यवस्था का आधुनिकीकरण ज़रूरी है, लेकिन यह उन लोगों की कीमत पर नहीं होना चाहिए जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में प्रदेश को गति दी। यदि सरकार स्थानीय बस मालिकों और कर्मचारियों को इस नीति में ‘साझेदार’ नहीं बनाएगी, तो 2 मार्च 2026 जैसी हड़तालें और विरोध प्रदेश की रफ़्तार को रोक सकते हैं।

विकास का पहिया तभी सही दिशा में घूमेगा जब इसमें बड़े कॉर्पोरेट के साथ-साथ छोटा ग्रामीण चालक भी सम्मान के साथ शामिल हो।

लेखक साहित्यकार  – राकेश यादव ( गोल्डी ) जबलपुर मध्यप्रदेश 

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