गंदे बर्तन ओर शरीर बाहर से गंदा पसंद नहीं पर अंदर जो छट कपट बुराई कि गंदगी वो साफ करना चाहिए- संत श्री श्वासानंदजी

कथा के पंचम दिवस भगवान श्री कृष्ण जन्म प्रसंग में मना भव्य जन्मोत्सव, आनंदित हुए भक्त
सीतामऊ।जीवन भर मंदिर में खड़े रहे पर पर्दा जब तक है भगवान के दर्शन नहीं हो सकते पर जब मंदिर का पुजारी सद्गुरु आए और पर्दा हटा देता है तो भगवान का नयनाभिराम दर्शन हो जाते हैं। उक्त ज्ञानामृत पोरवाल मांगलिक भवन में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस संत श्री श्वासानंद जी महाराज ने श्रवण कराते हुए कहीं।
संत श्री ने कहा कि हमें माया आठ प्रकार से पकड़ कर रखती है। आत्मा से जब माया हट जाती है तो आत्मा परमात्मा से मिलन एकाकार हो जाता है। ऐसे ही बालक ध्रुव को माता सुनीति ने बन जाने को कहा बालक माता का आदेश मानते हुए जंगल निकल गया जहां सतगुरु मिले उन्होंने कहा कि तुम्हारे पिता तो राजा उत्तानपाद है। और एक राजा का बेटा जंगल में नहीं महल में धन राज का सुख भोगना चाहिए।संत श्री ने कहा कि ध्रुव ने महल के सुख को त्याग कर जंगल तपस्या का मार्ग चुना ध्रुव बालक भक्ति में इतना लिन हुआ कि पांच साल का बालक एक दो महिने नहीं साल भर तक भगवान के नाम में लगा रहा बाढ़ आई उसके गले तक पहुंच गई पर बालक भक्ति में लीन रहा श्रीकृष्ण ने बालक को दर्शन दिए और कहा कि तेरी क्या इच्छा आपके गोद में बैठना है और आपके धाम आना चाहता हूं भगवान ने गोद में उठा कर कहा कि मेरे धाम अभी नहीं 36 हजार वर्ष तक अपने पिता का राजपाट संभालना और फिर मेरे धाम को आ जाना। ध्रुव ने कहा कि प्रभू अब मुझे माया नहीं चाहिए। संत श्री ने कहा कि जिस तरह बर्तन को भोजन बनाने के बाद दुसरी बार भोजन बनाते हैं तो बर्तन साफ कर बनाते हैं। ऐसे ही हम नहाते हैं पर ज्ञान से नहीं दिखावे के सेम्पू सुगंधित साबुन से नहाते पर अंदर जो छट कपट बुराई कि गंदगी वो साफ करना चाहिए। तभी हमारे चाहने वाले होंगे नहीं तो आपके सामने आपकी दुसरे के सामने दुसरे कि तारीफ करने वाले ही मिलेंगे।जैन संत गण शरीर को नेपकिन को गिला कर तन कि साफ करते हैं और भक्ति भजन में लीन रहकर हमें तन नहीं मन साफ करने का संदेश देते हैं।
ध्रुव का अर्थ अखंड अविनाशी अचल, अडिग, स्थिर, शाश्वत है। जिसमें भगवत प्राप्ति कि सोच रखी और उससे हटा नहीं।
संत श्री ने कहा कि यदि संसार में रहना है तो भगवान को भूल जाओ 23 घंटे काम करो और केवल एक घंटा भी भगवान कि भक्ति भजन करो तो संसार को भूल जाओ। मात्र पांच वर्ष के बालक ने भक्ति मार्ग पर बढ़ते हुए 11 वें वर्ष में भगवान का विमान लेने आया ध्रुव मृत्यु का उद्धार करते हुए सशरीर के भगवान के द्वार गया और अमर हो गया। श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन (चतुर्थ दिवस) की कथा में मुख्य रूप से भगवान के पवित्र चरित्रों, अवतारों और भक्ति के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन किया जिसमें श्रवण, किर्तन प्रदुम्न और अर्चन भक्ति है।आज रुस अमेरिका जापान ये प्रदुम्न महाराज कि जमीन रही है। यहां उनका राज था। संत श्री ने कहा कि व्यर्थ कि बातों में लोग कान ज्यादा लगाते हैं। थोड़ी सी बात को अपनी बुराई तो नहीं कान लगाकर सुनते हैं पर यह सोच रखना चाहिए कि सामने वाला बुराई कर वह मेरा नाम ले रहा याद कर रहा है। पुरंजन मन है और अवज्ञाता आत्मा है जो दिखती नहीं। पुरंजन कि नौ नगरी जो शरीर के सभी मार्ग है जिस पर आजकल कुछ मर मिट जाते हैं।संत श्री ने कहा कि व्रत उपास भुखे रहना नहीं है।आजकल तो व्रत उपवास में रोज से ज्यादा खा रहे तो फिर रोज जो भोजन है वहीं ठिक है व्रत उपवास से घर वाले परेशान हो वो व्रत उपवास नहीं है। व्रत का मतलब प्रतिज्ञा संकल्प लेना वो संकल्प वह है भगवान के प्रति समर्पण तथा उपवास का मतलब झुठ बुराई का त्याग करना है उस दिन सत्य बोलना भगवान का फल आहार करते हुए करना चाहिए ग्यारस के दिन व्रत उपवास के दिन सत्य बोलो किसी बुराई मत करो नहीं तो एक वर्ष का व्रत उपवास का पूण्य खत्म हो जाता है।सासु बहु को आशीर्वाद दे बहु व्रत रखे तो सास के चरण छुए। और आनंद भाव के साथ करना चाहिए।
संत श्री ने कहा कि किसी का उपहास नहीं उडाना चाहिए जो है उसी में प्रसन्न होकर सामने वाले कि तारीफ करो। किसी के वहां जाते और रसोई में एक कम हो गई तो उसकी तरह तरह कि बातें करते हैं और बुराया में लग जाते हैं । कुछ तो सामने वाले कपड़ा लाते उसमें भी कमी ढुंढते है य गलत है कैसा भी उसने अपना भाव आपके प्रति जताया अपना फर्ज है कि उसका धन्यवाद दे।
संत श्री ने भक्ति कि कथा श्रवण कराते हुए कहा कि ऋषभ देव क्षत्रिय सिसोदिया वंश (आदिनाथ) का जन्म क्षत्रिय इक्ष्वाकु वंश (सूर्यवंश) में उत्तर प्रदेश में हुआ था। एक राजा ने उन्हें पागल समझ कर कोड़े मारे मारने लगे ऋषभदेव राम राम बोलते रहे जब कोड़े मारते वाले भी थक गए।जब कोड़े मारने वाले ने राजा को बताया तो राजा ने माफी मांगी। ऋषभ देव ने कहा कि राजा माफी मांगनी चाहिए क्योंकि तुमने एक राजा को करना चाहिए किया, मुझे भक्ति करना भक्ति में रहता हूं।राजपूत ऋषभ देव ने जिन जिन करते हुए जैन धर्म को चलाते हुए मांस दुर्व्यसन को छोड़कर जैन धर्म से जुड़ने का आह्वान किया था। और प्रथम तीर्थंकर बने। संत श्री ने कहा कि माया धन दौलत केवल दायित्व फर्ज निभाने के लिए हो उसमें आसक्ति नहीं होनी चाहिए भरत जी ने हिरण को पालन ही नहीं किया उसे अपने दिल में बिठा लिया।अंत समय तक भरत जी हिरण के प्रेम में जुड़े रहे। जिसे घर के बाहर होना चाहिए वो घर के अंदर है आज लोग कुत्ते को सौफे पर बिठा रहे और गाय को घर से बाहर कर दिया गाय बाहर घुम रही है।पर गाय को जिसने घर में स्थान दें रखा उसको क ई बिमारियां नहीं होती है।माताओं से आह्वान करते हुए कहा कि अपने शरीर को तीन जगह सजा कर जाओ एवं भगवान के मंदिर उत्सव और एक घर के शादी ब्याह और तीसरा अपने पति को रिझाने के लिए, बाजार में सज कर जानकर दिखावा करने से कोई फायदा नहीं, बाजार में तो अपने चरित्र को सजा कर जाओ। चरित्र अगर सजा हुआ है तो सब जगह प्रसंशा होगी।
कथा के चतुर्थ पंचम दिवस में कपिलेन्द्र चरित्र, ध्रुव चरित्र, जड़ भरत, डाकु अजामिल, भगवान वामन अवतार, राजा बलि की कथा, प्रहलाद चरित्र, भगवान नृसिंह श्री कृष्ण का प्रगट्य उत्सव श्री कृष्ण कि बाल लिलाओं का श्रवण कराया गया।

पंचम दिवस भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जिसमें वासुदेव अमरदास बैरागी मनासा नीमच और सीमा हरिश लौहार (नातिन -राधेश्याम लौहार सर) को बाल गोपाल का स्वरूप बनाकर कथा प्रांगण में पहुंचे जहां उपस्थित श्रोताओं ने फुलों कि बारिश कि और भजन कीर्तन और नृत्य कर आनंदित हुए।कथा में श्रीमद्भागवत पुराण पितृ गुरुदेव वंदन पूजन एवं प्रसादी का लाभ श्रीमती अनुसुइया घाटिया रामदयाल घाटिया, रमेश चंद्र घाटिया, महेश सोनी, प्रभुलाल चौधरी छत्रपाल सिंह राठौर , सोनी परिवार लदुना, सत्यनारायण सोनी काका द्वारा किया गया।



