खेती में अफीम की मात्रा,अधिक पोस्तादाने मॉर्फिन कि प्राप्ति हो इसके लिए डोडाचूरे का उपयोग खाद मे

अफीम अनुसंधान केंद्र पर बीज की बुआई केी बुवाई तीन मीटर की दूरी पर दो लाइन में की जाती है
35 किलो डोडाचूरे को बारीक पीस कर खेत में फैलाकर समिति के सम्मुख हुआ नष्टिकरण
मंदसौर। कृषि प्रधान मंदसौर जिले में किसानों में अफीम की खेती के प्रति वही वर्षों पुराना आकर्षण है जो वर्षों पहले हुआ करता था।किसानों में लोकप्रिय इस खेती में अफीम की मात्रा,पोस्तादाने कि प्राप्ति और मॉर्फिन का अधिक प्रतिशत किसानों को प्राप्त हो इसके लिए मंदसौर के कृषि महाविद्यालय जो अब उद्यानिकी महाविद्यालय है इसमें कृषि वैज्ञानिक अनुसंधान में लगे हैं। गत वर्ष का इस खेती से सभाल कर रखे 35 किलो डोडाचूरे का अभी दो दिन पूर्व समिति के सम्मुख नष्टिकरण किया गया।
उद्यानिकी महाविद्यालय में अफीम की खेती पर अनुसंधान कर रहे डॉ बसंत कुमार कचोलि ने बताया कि गत वर्ष नारकोटिक्स से मिला चीरा पद्धति के अफीम की खेती से निकला 35 किलो डोडाचूरे का नष्टीकरण एसडीएम, एसडीपीओ, तहसीलदार, आबकारी अधिकारी, नारकोटिक्स,कृषि और परियोजना प्रमुख की टीम के सम्मुख थ्रेशर में बारीक पीसकर कल्टीवेटर से खेत में फैला दिया और फिर जमीन में इसे मिला दिया।
डॉ कचोली ने बताया कि गत वर्ष नारकोटिक्स से उद्यानिकी महाविद्यालय को 70 आरी में अफीम पर अनुसंधान के लिए पट्टा मिला था जिसमें से 50 आरी में चीरा लगाने के लिए और 20 आरी में बिना चीरा लगाए पूरा डोडा विभाग को देने का पट्टा मिला था जिसमें से महाविद्यालय ने अनुसंधान के लिए केवल 5 आरी में पोस्तादाने का जनन्य द्रव्य बीज की बुआई की। बीज की बुवाई तीन मीटर की दूरी पर दो लाइन में की जाती है। किसानो से उन्होंने आग्रह किया है कि पोस्तदाना बीज का छिड़काव करने की बजाय लाइन पद्धति से बुआई करे।इससे निदाई,गुड़ाई का खर्च कम हो जाता है।दवाई का छिड़काव अच्छा होता है और पौधा अच्छा बढ़ता है। इससे अफीम और पोस्तादाने का उत्पादन बढ़ता है जिससे आय बढ़ेगी। किसान जवाहर 16 और जवाहर 540 किस्म के बीज का उपयोग कर रहा है।
डॉ कचोली ने बताया कि 10 आरी के अफीम की खेती के पट्टे में बुआई के समय 35 किलो यूरिया,सिंगल सुपरफॉस्फेट50 किलो,म्यूरेटा पोटाश 15 किलो ,15 किलो सल्फर,1किलो बोरान और 250 ग्राम झींक देना है।बुआई के पूर्व 3 ट्राली गोबर का खाद , 1किलो पीएसबी कल्चर जिसे 30- 35 किलो गोबर की खाद मे मिलाकर पहले पानी के समय छिड़काव कर देना चाहिए।लाइन से लाइन की दूरी 30 सेमी रखने से अफीम की मात्रा अच्छी बैठेगी।
उन्होंने बताया कि काली मिस्सी बीमारी लगने पर कार्बन डाई मेटा एग्जिन 30 से 35 दिन के बाद छिड़काव करे। धौली मिस्सी की बीमारी लगने पर हेक्जक्लोनॉमोल का उपयोग करे।
डा कचोली ने बताया कि किसान जेओपी 540 जिसे लखपति के नाम से भी जानते हैं।इसमें फुलो का रंग सफेद होता है।इसमें 10 आरी में 8 किलो अफीम का उत्पादन होता है और अच्छी तरह खेती करे तो 10 किलो तक भी उत्पादन होता हे।125 किलो तक पोस्तदाना प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि बिना चीरा लगाने वाली अफीम की फसल के लिए जवाहर -16 बीज से पोस्तादाने का उत्पादन डेढ़ क्विंटल होता हे। उन्होंने अनुसंधान में पाया है कि बिना चीरे की अफीम की फसल में प्रति पौधे की संख्या 2 से 3 डोडे के बीच हो। फसल स्वास्थ्य होगी और डोडे में दाना भी अधिक होगा।


