पुण्य का उदय हो तो धूल में हाथ डालने पर भी धन मिल जाता है” – साध्वी रत्नरिद्धि श्रीजी

The Real Test Of Life’ विषय पर प्रवचन, शास्त्रों में बताए पुण्य के चार प्रकारों का किया विवेचन
सीतामऊ। नगर की धन्य धरा आजाद चौक स्थित आराधना भवन इन दिनों धर्म, अध्यात्म और आत्मचिंतन का केंद्र बना हुआ है। चातुर्मास हेतु विराजित पूज्य साध्वी श्री रत्नरिद्धि श्रीजी म.सा. एवं साध्वी श्री रत्नवृद्धि श्रीजी म.सा. के पावन सान्निध्य में प्रतिदिन ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही है।
रविवार को आयोजित विशेष धर्मसभा में साध्वी श्री रत्नरिद्धि श्रीजी म.सा. ने The Real Test Of Life’ विषय पर प्रवचन फरमाते हुए मनुष्य के जीवन में पुण्य के उदय, कर्मों के प्रभाव और वास्तविक सफलता का गहन आध्यात्मिक विश्लेषण किया।
“पुण्य से बदलती है परिस्थिति”
साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य अपनी सफलता का श्रेय केवल मेहनत को देता है, लेकिन कर्म सिद्धांत की दृष्टि से सफलता के पीछे पुण्य का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। “पुण्य का उदय यदि बुलंदियों पर हो तो धूल में हाथ डालो तो धन निकल जाता है”। अर्थात जब पुण्य प्रबल होता है तो प्रतिकूल परिस्थितियां भी अनुकूल बन जाती हैं और असंभव कार्य भी सहजता से पूर्ण हो जाते हैं।
उन्होंने दूध में शक्कर का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार दूध में शक्कर डालने से दूध मीठा हो जाता है, उसी प्रकार पुण्य के उदय से जीवन में सफलता, सुख और अनुकूलता का अनुभव होता है। “पुण्य है तो पैसा है, पैसा है तो समृद्धि है”। पर धर्म की दृष्टि से समृद्धि का अर्थ केवल धन नहीं, बल्कि वह समृद्धि है जो व्यक्ति को धर्म, सदाचार, सेवा और आत्मकल्याण की ओर ले जाए।
शास्त्रों में बताए पुण्य के 4 प्रकार
धर्मसभा में साध्वीश्री ने आगमों में बताए गए पुण्य के चार प्रकारों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया:
पुण्यानुबंधी पुण्य – जो व्यक्ति को आगे भी धर्म और सद्कर्मों की ओर प्रेरित करे. पापानुबंधी पुण्य. पुण्यानुबंधी पाप, पापानुबंधी पाप
उन्होंने कहा कि यदि जीवन का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है तो पुण्यानुबंधी पुण्य का उदय अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा पुण्य व्यक्ति को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाता है।
“पुण्य का उपयोग आत्मकल्याण के लिए हो”
साध्वीश्री ने कहा कि पुण्य प्राप्त होने पर केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं में नहीं उलझना चाहिए। धन, प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य आदि का सदुपयोग धर्म एवं आत्मकल्याण के मार्ग में करना चाहिए। पुण्यानुबंधी पुण्य के उदय के लिए शुभ भाव, धार्मिक आराधना, सेवा, जीवदया, साधु-साध्वी के प्रति श्रद्धा और सधर्मिकों के प्रति वात्सल्य जैसे भाव जीवन में उतारने चाहिए।
उन्होंने कहा कि कर्म सिद्धांत जीवन को सही दिशा देता है। विपरीत परिस्थितियों में निराश होने के बजाय वर्तमान पुरुषार्थ और शुभ भावों पर ध्यान देना चाहिए। “आज का पुरुषार्थ ही आने वाले कल के कर्मों का निर्माण करता है”।
धार्मिक लाभ-
कार्यक्रम में भगवान के अभिषेक, प्रभावना एवं सधर्मिक भक्ति का लाभ शैलेन्द्र-राहुल ओस्तवाल परिवार द्वारा लिया गया। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने प्रवचन का लाभ लिया।
चातुर्मास के दौरान आराधना भवन में चल रही नियमित धार्मिक गतिविधियों से सीतामऊ नगर में धर्म और अध्यात्म का वातावरण निरंतर गहरा हो रहा है।



