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नारायण का किर्तन मूल किर्तन है जो भगवान की ओर प्रवृत्त करता है,इसका कोई मुकाबला नहीं है-लोकेशानंद महाराज

नारायण का किर्तन मूल किर्तन है जो भगवान की ओर प्रवृत्त करता है,इसका कोई मुकाबला नहीं है-लोकेशानंद महाराज

 

ताल ब्यूरो चीफ शिवशक्ति शर्मा

लोकेशानंद महाराज ने बताया कि भागवत कथा हमें भगवान की ओर प्रवृत्त करती है, भगवान को याद करने के लिए बड़ा प्रयास करना होता है,जबकि सांसारिक चीजें सहज ही याद रहती हैं।भगवान का स्मरण सहज हो, हमारे स्वभाव में हो, कथा श्रवण में प्रीति, कीर्तन में अपार आनंद हो। स्मरण का रस ऐसा हो कि छुटे नहीं। कथा, भक्ति, भजन सतत चलना चाहिए।

कबीर का एक वृतांत सुनाया कि “जिसने नथनी दी वह याद हे पर जिसने नथनी पहनने को नाक दी” उसका भी तो स्मरण रखो। नारायण कृपावंत है, परम है, प्रतिपालक है, रक्षक है।

नारायण का कीर्तन मूल कीर्तन है, संसार का पहला कीर्तन है, इसका कोई मुकाबला नहीं है।

“ओम नमो भगवते वासुदेवाय”यही परम मंत्र है, भगवान श्री कृष्ण ने सबके लिए यह मंत्र बताया है। लक्ष्मी जी का सबसे प्रिय नाम नारायण है। नारायण से बड़ा कोई मंत्र नहीं श्री कृष्ण जी ने उद्धव जी को बताया था । महाराज श्री ने कहा कि गीता जी कुल 72 हैं सबका अपना महत्व है। जहां संसार के ज्ञान का अंत होता हैं वहां से वेदांत प्रारंभ होता है। प्रजापति दक्ष, सती जी, महादेव जी का प्रसंग, सुनाते हुए कहा कि महादेव की जटा के बाल से भद्रकाली और कालभैरव प्रकट हुए।

सती माता के शरीर के 52अंश शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

प्रेम से भगवान प्राप्त होते है, उत्तानपाद, ध्रुव जी, सुरुचि, सुमति का चित्रण ,पृथु महाराज, ऋषभ देव जी, ऋषभ देव जी पुत्र भरत,अजामिल उपाख्यान, प्रहलाद जी, समुद्र मंथन ,गरुड़ जी के विशिष्ट गुणों का वर्णन बड़े ही रोचक एवं मोहक ढंग से सरल शब्दों में किया। आपने कहा कि मद्भागवत जी में लक्ष्मीजी के प्राकट्य का वर्णन है, इसलिए लक्ष्मी उत्सव उत्साह, उमंग से मनाऐगे। हिरण्यकश्यप, होलिका, नरसिंह अवतार प्रसंग समझाया व कहा कि होली भक्ति की विजय, विष्णु विजय का उत्सव है, होली दुःख दारिद्रय का अंत कर देती हैं। हमें होली पर प्रकृति,पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत करना है, “पेड़ नहीं कटे, पौधे पेड़ बने” यह प्रयास करना है।

अपने भक्तों से कहा कि तपस्या से जितना बल प्राप्त होता है वह किसी अन्य चीज में नहीं होता। श्री विष्णु शहस्त्रनाम सबसे पावरफुल स्त्रोत हैं।

अंत में आपने भक्त की आचार संहिता बताई:

बार बार मुँह जूठा न करे ।

उल्टे हाथ से पानी न पिये

बैठते समय तलवों को स्पर्श न करे।

चलते, खाते, कोई काम करते समय आवाज न करे।

बर्तन न बजाए

जूता चप्पल सबकी अलग अलग रखे। रास्ते में थूके नहीं, दोष लगता है। सम्मान नहीं होता हैं। आपकी बात का महत्व नहीं होगा।

सामने वाला क्रोध करे तो थोड़ी देर रुक जाए।

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