गायत्री परिवार द्वारा सीतामऊ में पुंसवन संस्कार कार्यक्रम आयोजित किया गया

जिन गर्भवती माताएं के सद आचार विचार होते हैं उनके बच्चे महापुरुष बनते हैं – श्री फरक्या
सीतामऊ। अखिल विश्व गायत्री परिवार के तत्वाधान में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सीतामऊ में गर्भवती माताओं का वैदिक विधि विधान के साथ पुंसवन संस्कार कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें लगभग 70 महिलाओं ने भाग लिया।कार्यक्रम के प्रारंभ में दीप प्रचलन एवं पुजन अर्चन कर वेद माता गायत्री माता गुरुसत्ता वंदन गायत्री महामंत्र के सामुहिक उच्चारण कर कौन सा वन संस्कार का शुभारंभ किया गया। इस दौरान वैदिक पद्धति से 24 बार गायत्री महामंत्र एवं 12 बार महामृत्युंजय मंत्र का सामूहिक जाप एवं हवन में खीर गंगाजल की आहुति देखकर दिव्या प्रसाद के रूप में गर्भवती बहनों ने श्रद्धा पूर्वक ग्रहण कर गर्भ जीवन से लेकर बच्चों की किशोरावस्था तक क्रोध तनाव द्वेष ईर्ष्या से दूर रहकर अपने ईस्ट भगवान, पूर्वजों का स्मरण करते हुए मधुर भजन संगीत सुनने महापुरुष के जीवन के पुण्य प्रवाह को पढ़ने आदि संस्कारित वातावरण में संतान निर्माण एवं श्रेष्ठ नामकरण का संकल्प लिया।
इस अवसर पर जिला समन्वयक श्री जसवंत सिंह राठौर ने मातृशक्ति को अपने उद्बोधन ने कहा कि भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों का वर्णन है जो जीवन के विभिन्न समय पर हरेक को गुजरना पड़ता है। उसमें एक संस्कार पुंसवन संस्कार है जिसका विशेष महत्व है यह संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि भावी पीढ़ी को स्वास्थ्य के साथ संस्कारित निर्माण करने वाला वैज्ञानिक आध्यामिक है। मातृशक्ति के उदर में शिशु के व्यक्तित्व का निर्माण गर्भकाल से ही प्रारंभ हो जाता है जैसा माता का आचार विचार व्यवहार भावनाएं वातावरण होता है वैसा ही उसका प्रभाव शिशु पर भी पड़ता है। माता बार-बार क्रोध करती हैं तो बच्चा भी बड़ा होने के बाद वैसे ही उसमें गुण दिखने लगेंगे। यदि माता सात्विक जीवन निर्माता उपासना स्वाध्याय गीत भजन संस्कारित वातावरण अपनाती है तो बच्चों में भी वैसा ही प्रभाव दिखाई देने लगेगा।
उपखंड समिति सदस्य ईश्वरलाल फरक्या ने अपने उद्बोधन में कहा कि मनुष्य के स्थूल सूक्ष्म एवं कारण तीन शरीर होते हैं गर्भस्थ शिशु के इन तीनों शरीरों का संतुलित विकास गर्भकाल में ही प्रारंभ हो जाता है स्थूल -शरीर के पोषण के लिए शुद्ध सात्विक एवं पौष्टिक आहार बिहार आवश्यक है। सूक्ष्म- शरीर विचारों का केंद्र होता है। इसलिए गर्भवती माता को प्रतिदिन साहित्य, श्रेष्ठ ग्रंथों को पढ़ना चाहिए। जिससे गर्भस्थ के शिशु में सकारात्मक विचार सद्गुणों का विकास हो सके। तीसरा शरीर कारण जो भावना एवं संस्कारों पर आधारित होता है इसलिए प्रतिदिन क्रोध तनाव एवं नकारात्मक विचारों का त्याग कर कम से कम तीन माला गायत्री मंत्र का जाप, ईष्ट, ईश्वर की उपासना प्रार्थना ध्यान एवं महापुरुषों के जीवन के पुण्य प्रवाह, ग्रंथों को पढ़ने आचरण विचरण संस्कारित वातावरण में रहने से गर्भस्थ बच्चा नैतिक आध्यात्मिक सद्गुणों वाला होता है। श्री फरक्या ने कहा कि वर्तमान समय कलयुग यानी पूर्जो का युग है। पहले पूर्वजों का युग था तो भावी पीढ़ी संस्कारित वातावरण और भरे पुरे परिवार के साथ स्वस्थ भी रहते थे। और एक दुसरे कि देखभाल करने सहयोग के लिए थे पर अब पूर्जो का युग मोबाइल आदि के कहने पर व्यक्ति परिवार कार्य कर रहे हैं। जिससे न केवल अपनों से दुर हो गये बल्कि असंस्कारित होने लगें इससे हर अगली पीढ़ी अपने को परिवार से दूर कर रही है। जो गर्भवती माताएं अपने आचार विचार को संस्कारित रखती है उनके बच्चे आगे चलकर महापुरुष योद्धा नेतृत्व करने वाले होते हैं।
इस अवसर पर गायत्री परिवार के आचार्य द्वारा उपस्थित गर्भवती माताओं एवं परिजनों पर पुष्प वर्षा कर स्वस्थ संस्कृत तेजस्वी प्रतिभावान एवं आदर्श संतानों के जन्म की मंगल कामना करते हुए सामूहिक प्रार्थना की गई। आयोजन के समापन पर सामुहिक शांति पाठ एवं प्रसाद वितरण के साथ समापन किया गया।
इस अवसर पर ब्लाक चिकित्सा अधिकारी डॉ विजयकृष्ण सुरा गायत्री परिवार के श्री पुरालाल राठौर, दशरथ लाल राठौर बद्री लाल परिहार श्रीमती चंद्रकला सेठिया श्रीमती दुर्गा टांकवाल सुनीता मांदलिया श्रीमती सुकन्या घाटिया श्रीमती निर्मला घाटिया श्रीमती गायत्री बिलोदिया सहित नागरिक व कर्मचारी उपस्थित रहे। उक्त जानकारी जिला सह समन्वयक पवन गुप्ता ने दी।



