जबलपुरआलेख/ विचारमध्यप्रदेश

हुनर की विरासत और भविष्य – राकेश घूमन्तु गोल्डी 

जब ‘डिग्री’ से आगे निकलता है ‘इंसान‘-

आज का दौर केवल सूचनाओं का ढेर इकट्ठा करने का नहीं है। गूगल पर सब कुछ मौजूद है, पर सवाल यह है कि आप उस जानकारी से बना क्या सकते हैं? पुराने समय में हमारे बुनकर, कुम्हार और कलाकार बिना किसी बड़ी डिग्री के दुनिया के सबसे बड़े ‘हुनरमंद’ कहलाते थे। आज के डिजिटल युग में भी वही सिद्धांत लागू होता है “क्या जानते हो” से कहीं ज्यादा कीमती यह है कि “क्या कर सकते हो।”

 कल की चुनौतियों का आज का हथियार- जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) या डेटा मैनेजमेंट की बात करते हैं, तो अक्सर लोग इसे केवल दफ्तरों का काम समझते हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, यदि हमारे लोक कलाकार अपनी कला को डिजिटल मार्केटिंग के ज़रिए दुनिया तक पहुँचाने लगें, तो उनकी आर्थिक स्थिति कितनी बदल सकती है?

AI और भविष्य- एआई कोई हौवा नहीं है, बल्कि एक ऐसा ‘औज़ार’ है जो हमारे काम को आसान बनाता है। युवाओं को आज यह सिखाना ज़रूरी है कि कैसे वे इन आधुनिक टूल्स का उपयोग अपनी रचनात्मकता को बढ़ाने में करें।

डिजिटल साक्षरता– आज के दौर में ‘अंगूठा छाप’ वह नहीं है जिसे पढ़ना नहीं आता, बल्कि वह है जो डिजिटल तकनीक का सही इस्तेमाल नहीं जानता। डेटा को समझना और उसका प्रबंधन करना आज की सबसे बड़ी ताकत है।

संविधान की भावना और हुनर का मेल -हमारा संविधान सबको ‘समान अवसर’ की बात कहता है। लेकिन अवसर तभी समान होंगे जब हुनर पर किसी एक खास वर्ग या शहर का कब्ज़ा न हो। समावेशी सोच का मतलब है कि विकास का पहिया तब तक पूरा नहीं घूमेगा जब तक इसमें समाज के हर तबके, खासकर महिलाओं और हाशिए पर खड़े युवाओं की भागीदारी न हो।

कला और हुनर- हुनर केवल कोडिंग या मार्केटिंग नहीं है। एक मिट्टी की मूर्ति बनाने वाला कलाकार या कबीर के भजनों को नई धुन देने वाला गायक भी उतना ही बड़ा स्किल्ड प्रोफेशनल है। ज़रूरत है इन पारंपरिक विधाओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने की।

आधी आबादी की ताकत- जब घर की महिला डिजिटल टूल्स सीखती है, तो वह केवल एक नौकरी नहीं करती, बल्कि पूरे घर की सोच बदल देती है। तकनीक ने उन बेड़ियों को तोड़ दिया है जिन्होंने कभी महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित किया था।

 जब हाथ को काम और काम को सम्मान मिले -प्रशिक्षण का असली मकसद केवल सर्टिफिकेट बाँटना नहीं, बल्कि आत्मविश्वास पैदा करना है। जब एक युवा यह कहता है कि “मुझे यह काम आता है और मैं इसे करके दिखा सकता हूँ,” तो वह रोज़गार की तलाश में नहीं भटकता, बल्कि रोज़गार उसके पास आता है।

मंच (Platform) की भूमिका– युवाओं को केवल सिखाना काफी नहीं है, उन्हें एक ऐसा मंच देना ज़रूरी है जहाँ वे अपना हुनर दिखा सकें। जैसे एक कलाकार को अपनी प्रदर्शनी के लिए गैलरी चाहिए, वैसे ही आज के डिजिटल युवाओं को सही नेटवर्किंग और मार्केट से जुड़ाव चाहिए।

सीखना और कमाना- इस पहल का सबसे खूबसूरत हिस्सा यह है कि यह युवाओं को केवल ‘मज़दूर’ नहीं, बल्कि ‘मालिक’ (Entrepreneur) बनने की राह दिखाती है। चाहे वह फ्रीलांसिंग हो या खुद का कोई छोटा स्टार्टअप, हुनर ही आज की सबसे बड़ी पूँजी है।

एक नई सुबह की ओर- अंत में बात वहीं आकर ठहरती है ज्ञान तब तक बोझ है जब तक वह व्यवहार में न उतरे। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ डिग्रियाँ अलमारियों में रहें और हुनर हाथों में दिखे।

आज के युवाओं को कल की चुनौतियों के लिए आज ही तैयार होना होगा। तकनीक को अपना साथी बनाएँ, समावेशी सोच को अपना संस्कार बनाएँ और अपने हुनर को अपनी पहचान बनाएँ। क्योंकि आने वाला कल उन्हीं का है जिनके पास ‘करने’ का जज़्बा है।

-लेखक राकेश घूमन्तु गोल्डी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
WhatsApp Icon
Whatsapp
ज्वॉइन करें
site-below-footer-wrap[data-section="section-below-footer-builder"] { margin-bottom: 40px;}