भक्ति/ आस्थामंदसौरमंदसौर जिला

शक्ति और आस्था का अद्भुत केंद्र ,ऐसा मंदिर जहां भैरव और भवानी एक ही आसान पर विराजित

शक्ति और आस्था का अद्भुत केंद्र ,ऐसा मंदिर जहां भैरव और भवानी एक ही आसान पर विराजित

नालछा माता मंदिर पूरे विश्व में यह ही एकमात्र ऐसा मंदिर हैं जहां बाबा भैरव और भवानी एक ही गादी पर विराजमान है। नालछा माता की प्रतिमा सुबह से लेकर रात तक तीन रूप धारण करती है। जिसमें पहली बाल्यवस्था दूसरी, युवावस्था और तीसरी वृद्धावस्था शामिल रहती है। मां नालछा को मंदसौर की आराध्य देवी भी माना जाता है।

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले यह मंदिर पशुपतिनाथ मंदिर से करीब 2 से 3 किलोमीटर दूर होगा। नालछा माता मंदिर मंदसौर के पास नालछा गाँव में स्थित है।नालछा माता मंदिर श्रद्धा, चमत्कार और आस्था का एक प्राचीन तीर्थ स्थल है। यह मंदिर माँ दुर्गा के नालछा स्वरूप को समर्पित है। पौराणिक मान्यता है
कि माँ नालछा नवदुर्गा का एक विशेष रूप हैं। यहाँ माँ की प्रतिमा स्वयं प्रकट (स्वयंभू) मानी जाती है। जनश्रुति है कि माता ने इस क्षेत्र को संकटों से बचाने के लिए यहाँ अवतार लिया था।

आप इस मंदिर में घूमने के लिए आ सकते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर के बाद नालछा माता का मंदिर मंदसौर जिले में प्रसिद्ध है। यहां पर आपको नालछा माता के दर्शन करने के लिए मिलते है, जो देवी दुर्गा जी का स्वरुप है।

आपको यहां पर दो दीपस्तंभ देखने के लिए मिलेंगे, जिसमें दीपक जलाया जाता है, जो बहुत ही भव्य लगते हैं।आप इस मंदिर में नालछा माता के साथ भैरव बाबा की प्रतिमा एक साथ देख सकते हैं, जो आपको यहीं पर देखने के लिए मिलेगी।

यहां पर नवरात्रि के समय बहुत सारे लोग नालछा माता जी के दर्शन करने के लिए आते हैं। यहां पर गार्डन भी है, जहां पर आप बैठ सकते हैं और बच्चों के मनोरंजन के लिए गार्डन में झूले भी लगे हुए हैं।

नवरात्रि मे यहा अग्नि पर भक्तो द्वारा आग मे चलने का प्रचलन भी है जिसे अग्नि की चूल के नाम से जाना जाता है….. आपको यहां पर आकर बहुत ही अच्छा लगेगा।

बताया जाता है कि राजा दशरथ के द्वारा स्थापित की गई नालछा माता की प्रतिमा सुबह से लेकर रात तलक 3 रूप धारण करती है. पहली बाल्यवस्था, दूसरी युवावस्था और तीसरी वृद्धावस्था.

जवारे से लगाया जाता है बारिश का अनुमान

नवरात्रि की घटस्थापना के साथ यहां ज्वारे रोपे जाते है। कलश में उगे ज्वारे से पूरे साल का अनुमान लगाया जाता है। जैसे ज्वारे सीधे हो तो साल बहुत अच्छा निकलेगा और छोटे मुरझाए हुए हो तो साल में मौसम मिला-जुला रहेगा। वहीं ज्वारे का नहीं उगना सूखे पड़ने को दशार्ता है। ज्वारे आधे उगना खंड वर्षा की स्थिति को दशार्ता है। इस तरह यहां किसान बारिश पूरे साल के मौसम के स्थिति का पूवानुर्मान लगा लेते हैं।

यहां गोद भराई से गूंज उठती है किलकारियों की गूंज
नालछा माता के दरबार में गोद भराई की रस्म की जाती है। बताया जाता है कि जिन महिलाओं की गोद सूनी है और उन्हें बच्चे नहीं हो रहे हैं तो यहां गोद भराई होने से उनके सूने आंचल में किलकारियों की गूंज सुनाई देने लगती है।

चूल व कन्या पूजन का होता है आयोजन
नालछा माता मंदिर परिसर में दशहरे पर बाड़ी विसर्जन के साथ चूल का आयोजन होता है जिसमें बड़ी संख्या में भक्त दहकते अंगारों से निकलते हैं। वंही शारदीय नवरात्रि में जय माता दी ग्रुप द्वारा कन्या पूजन का आयोजन किया जाता है। चैत्र नवरात्रि में समिति द्वारा विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है

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