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महिला संतों का जीवन हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं,आधुनिक स्त्री के लिए भी ‘स्वतंत्रता’ का सबसे बड़ा सबक

महिला संतों का जीवन हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं,आधुनिक स्त्री के लिए भी ‘स्वतंत्रता’ का सबसे बड़ा सबक

✍️राकेश की घूमन्तु कलम से

आर्टिकल न. 482

मध्यकालीन भारत का इतिहास केवल युद्धों और राजाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़े वैचारिक विद्रोह का भी गवाह रहा है। उस दौर की महिला संतों ने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर जो रास्ता चुना, वह आज की आधुनिक स्त्री के लिए भी ‘स्वतंत्रता’ का सबसे बड़ा सबक है।

महिला संत स्वतंत्रता और वैचारिकता की मशाल- वह समय था जब समाज जाति, धर्म और पितृसत्ता की बेड़ियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। ऐसे समय में मीराबाई, अक्का महादेवी, लल्लेश्वरी और जनाबाई जैसी महिलाओं ने न केवल ईश्वर की भक्ति की, बल्कि अपने समय की सामाजिक सीमाओं को भी चुनौती दी।

 

𝟭 “स्वयं की पहचान की खोज”

आज हम जिस’Self-identity’ की बात करते हैं, उसकी नींव इन महिला संतों ने सदियों पहले रख दी थी। उन्होंने बताया कि एक स्त्री की पहचान केवल किसी की बेटी, पत्नी या माँ होने तक सीमित नहीं है।

उदाहरण – अक्का महादेवी ने सामाजिक वस्त्रों का त्याग कर दिया था। उनका मानना था कि जब आत्मा का मिलन परमात्मा से हो रहा है, तो शरीर के आवरण और लोक-लाज का क्या अर्थ? यह ‘देह’ से ऊपर उठकर ‘विचार’ की स्वतंत्रता थी।

 

𝟮. पितृसत्ता को चुनौती – “अपनी शर्तों पर जीवन”

मध्यकाल में स्त्रियों का घर से बाहर निकलना भी वर्जित था, लेकिन इन संतों ने महलों और सुख-सुविधाओं को ठुकराकर घुमंतू जीवन अपनाया।

– मीराबाई एक राजघराने की बहू थीं। उन्होंने लोक-लाज और कुल की मर्यादा के नाम पर थोपे गए बंधनों को स्वीकार नहीं किया। उनका ‘जहर का प्याला’ पीना इस बात का प्रतीक है कि जब स्त्री अपने सत्य पर अडिग होती है, तो वह मृत्यु के भय से भी मुक्त हो जाती है। आज की स्त्री के लिए यह अपनी पसंद का करियर या जीवन चुनने की प्रेरणा है।

𝟯. समानता और बंधुत्व का संदेश – इन महिला संतों ने कभी भी ऊंच-नीच या जाति-पाति को नहीं माना। उन्होंने भक्ति को एक ऐसा मंच बनाया जहाँ सब बराबर थे। – महाराष्ट्र की संत जनाबाई, जो एक निम्न समझे जाने वाले परिवार से थीं, उन्होंने काम करते-करते (चक्की पीसते या खाना बनाते) अभंग रचे। उन्होंने साबित किया कि ‘अध्यात्म’ या ‘बौद्धिकता’ किसी खास वर्ग या पुरुष की जागीर नहीं है।

𝟰. आज की स्त्री के लिए प्रासंगिकता – आज जब हम ‘विमेन एम्पावरमेंट’ की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान केवल आर्थिक स्वतंत्रता पर होता है। लेकिन मध्यकालीन संतों से हमें ‘मानसिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता’ की सीख मिलती है निडरता – समाज क्या कहेगा, इस डर से बाहर निकलना।

सादगी और सत्य – दिखावे की दुनिया से दूर रहकर अपने आंतरिक सत्य को पहचानना।

अभिव्यक्ति – अपनी बात को कविता, संगीत या संवाद के माध्यम से निर्भीकता से रखना।

महिला संतों का जीवन हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं है जो समाज हमें देगा, बल्कि यह एक ‘चेतना’ है जिसे हमें अपने भीतर पैदा करना होगा। उनकी वैचारिकता आज भी उतनी ही ताज़ा है, क्योंकि वे केवल भगवान की भक्त नहीं थीं, वे अपने समय की सबसे बड़ी ‘क्रांतिकारी’ थीं।

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