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युवा शक्ति का आह्वान: स्वामी विवेकानंद के सपनों का भारत

विशेष आलेख: राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष
 

युवा शक्ति का आह्वान: स्वामी विवेकानंद के सपनों का भारत

(रविन्द्र पांडेय)
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” स्वामी विवेकानंद का यह अमर उद्घोष आज भी करोड़ों युवाओं की धमनियों में उत्साह का संचार करता है। विवेकानंद जी युवाओं को केवल देश का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। उनका मानना था कि यदि मुझे 100 ऊर्जावान युवा मिल जाएं, तो मैं पूरे विश्व को बदल सकता हूँ।
स्वामी जी का स्पष्ट मत था कि मनुष्य वैसा ही बनता है, जैसा वह सोचता है। यदि आप खुद को निर्बल मानेंगे, तो निर्बल बन जाएंगे और यदि खुद को सबल मानेंगे, तो सबल बनेंगे। युवाओं के लिए उनका संदेश था कि वे अपनी ‘आंतरिक दिव्यता’ को पहचानें। उनके अनुसार, आत्मविश्वास ही वह कुंजी है जो असंभव को संभव बनाती है।
लक्ष्य-केंद्रित जीवन का मार्ग
भटकाव के इस दौर में स्वामी जी का ‘एक विचार’ का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था— “एक विचार लो, उस विचार को अपना जीवन बना लो; उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो।” यही सफलता का एकमात्र मार्ग है।
विवेकानंद जी ने युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण के लिए सात प्रमुख स्तंभ बताए हैं:
 * निडरता: जो कुछ भी आपको शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक रूप से कमजोर बनाता है, उसे जहर समझकर त्याग दें।
 * निस्वार्थ सेवा: वह व्यक्ति सबसे सफल है जो बदले में कुछ नहीं मांगता। “वही जीता है, जो दूसरों के लिए जीता है।”
 * शक्तिशाली व्यक्तित्व: युवाओं में लोहे की मांसपेशियां और फौलाद की नसें होनी चाहिए ताकि वे अदम्य मनोबल के साथ चुनौतियों का सामना कर सकें।
 * चरित्र निर्माण: शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ऐसा चरित्र निर्माण करना है जो समाज के कमजोर तबके की सेवा कर सके।
 * एकाग्रता: एकाग्रता ही ज्ञान का आधार है। युवा अपनी ऊर्जा को बिखरने न दें, बल्कि उसे लक्ष्य की ओर केंद्रित करें।
 * सामाजिक जिम्मेदारी: शिक्षित वही है जो दूसरों की भलाई के लिए कार्य करे। समाज के उत्थान के बिना राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं है।
 * आध्यात्मिक गौरव: अपनी संस्कृति और विरासत पर गर्व करते हुए आधुनिक विज्ञान के साथ तालमेल बिठाना।
विश्व गुरु भारत का संकल्प
स्वामी विवेकानंद चाहते थे कि भारत का युवा अपनी आंतरिक शक्ति को पहचाने और निडर होकर मानवता के कल्याण के लिए कार्य करे। उनका आह्वान केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ के पद पर आसीन करने के लिए था। आज के युवाओं के पास असीमित क्षमता है, आवश्यकता है तो बस खुद पर अटूट विश्वास की और निस्वार्थ भाव से राष्ट्र निर्माण में जुटने की।

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