आलेख/ विचारभोपालमध्यप्रदेश

पत्रकार बनकर अपना विवेक और बुद्धि का इस्तेमाल करो, श्रीमान पत्रकार !

पत्रकार बनकर अपना विवेक और बुद्धि का इस्तेमाल करो, श्रीमान पत्रकार !

लेख -राजेन्द्र सिंह जादौन

आज का दौर ऐसा है जहां हर गली, हर मोहल्ले और हर चौराहे पर आपको एक “पत्रकार” मिल जाएगा। मोबाइल हाथ में, इंटरनेट जेब में और सोशल मीडिया पर एक पेज बस, पत्रकारिता शुरू। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में यह पत्रकारिता है, या सिर्फ कॉपी-पेस्ट का एक सस्ता कारोबार?

आज पत्रकारों की एक नई “प्रजाति” तैयार हो चुकी है। पहली श्रेणी है भोपाली पटिएबाज पत्रकार। इनका काम बेहद आसान है जहां से भी कोई खबर दिखी, उसे उठाया और बिना सोचे-समझे अपने प्लेटफॉर्म पर चिपका दिया। न तथ्यों की जांच, न भाषा की परवाह, न जिम्मेदारी का एहसास। बस खबर डालनी है, चाहे वो सही हो या गलत।

अब सवाल यह उठता है कि जब इतना दिमाग आप कॉपी-पेस्ट और जुगाड़ में लगा रहे हैं, तो क्यों न उसी दिमाग का इस्तेमाल अपनी सोच विकसित करने में करें? क्यों न अपनी लेखनी को मजबूत बनाएं? क्यों न अपनी पहचान खुद के दम पर खड़ी करें?

पत्रकारिता केवल खबर लिखने का काम नहीं है, यह समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है। एक सच्चा पत्रकार वही होता है जो सत्ता से सवाल पूछता है, जो सच्चाई को सामने लाने का साहस रखता है और जो जनता की आवाज बनता है। लेकिन जब पत्रकार ही दूसरों की मेहनत पर निर्भर हो जाए, तो वह समाज को क्या दिशा देगा?

आज जरूरत है आत्ममंथन की। जरूरत है यह समझने की कि पत्रकारिता कोई शॉर्टकट नहीं है। यह एक साधना है, जिसमें निरंतर अभ्यास और ईमानदारी की आवश्यकता होती है। “करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान” यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि एक सच्चाई है। अगर आप लगातार लिखते रहेंगे, सोचते रहेंगे, तो निश्चित ही एक दिन आपकी लेखनी में वो धार आ जाएगी, जो किसी कॉपी-पेस्ट की मोहताज नहीं होगी।

अपना लिखना शुरू कीजिए। छोटी शुरुआत कीजिए, लेकिन ईमानदारी से कीजिए। गलतियां होंगी, लेकिन वही गलतियां आपको बेहतर बनाएंगी। किसी और की नकल करके आप कभी भी अपनी पहचान नहीं बना सकते।

और अगर आप किसी का लिखा साझा करते भी हैं, तो कम से कम उसका नाम जरूर दीजिए। यह सिर्फ नैतिकता नहीं, बल्कि उस लेखक के प्रति सम्मान है। हो सकता है उसे उसके काम का आर्थिक लाभ न मिले, लेकिन उसका नाम लोगों तक पहुंचे, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

आज पत्रकारिता का स्तर गिरने की बात अक्सर कही जाती है, लेकिन इस गिरावट के लिए जिम्मेदार कौन है? कहीं न कहीं हम सभी इसका हिस्सा हैं। जब तक हम खुद को नहीं बदलेंगे, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।

समय आ गया है कि आप खुद से एक सवाल पूछें क्या आप वास्तव में पत्रकार हैं, या सिर्फ खबरों के व्यापारी?

अगर पत्रकार हैं, तो अपनी कलम को ईमानदार बनाइए, अपने विवेक को जागृत रखिए और अपनी बुद्धि का सही इस्तेमाल कीजिए। क्योंकि एक सच्चे पत्रकार की पहचान उसकी मौलिकता से होती है, न कि उसकी कॉपी-पेस्ट की गति से।

याद रखिए, भीड़ में शामिल होना आसान है, लेकिन अलग पहचान बनाना कठिन। और वही कठिन रास्ता आपको एक सच्चा पत्रकार बनाता है।

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