मंदसौर जिलासीतामऊ

पर्यावरण, स्वदेशी, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, नागरिक कर्तव्य और स्व को जानना हमे विचार करना जानना होगा – श्री मांगरोद 

विवेकानंद हाई स्कूल में प्रमुख नागरिक संगोष्ठी संपन्न 

सीतामऊ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष समारोह के अवसर पर प्रमुख नागरिक संगोष्ठी का आयोजन नगर के विवेकानंद हाई स्कूल के सभा कक्ष में मुख्य वक्ता रतलाम विभाग संघ चालक श्री तेजराम मांगरोदा शिक्षक एवं खंड संघ चालक श्री राधेश्याम राठौर के अतिथि में आयोजित कि गई।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता तेजराम मांगरोदा ने संघ कि अपनी कार्य पद्धति संघ कैसे काम करता है। विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि पुरे विश्व को श्रेष्ठ बनाने का भाव हमारे यहां है। हम एकेश्वरवाद नहीं एकात्मकता वादी है। इदं मम जिसका अर्थ है “यह मेरा नहीं है”। यह भारतीय दर्शन में नि:स्वार्थ भाव, त्याग और समर्पण का प्रतीक है, हमारे यहां त्याग का भाव है। इन तत्वों के आधार पर श्रष्ठी चलेगी नहीं तो विनाश हैं।
श्री मांगरोदा ने व्यक्ति निर्माण को लेकर कहा कि व्यक्ति निर्माण होगा कैसे इसके लिए काम करना पड़ेगा डॉ हेडगेवार ने सिद्धांत दिया। जिस प्रकार से पानी का एक भार जो हमें दिखाई देता है पर वह अंदर कितना है उसकी गहराई कितनी है।यह कोई नहीं जानता है। वैसे ही संघ जो दिखाई देता है वह दुर से सबको अपने नजरिए से दिखेगा पर उसकी गहराई अनंत है जिसमें ज्ञान आध्यात्म समर्पण, साधना, सेवा, जैसे रत्न छिपे हुए हैं जिसको जानने के लिए संघ कि शाखा में नियमित आना पड़ेगा। और इन सभी रत्नों को पाकर एक स्वयं सेवक व्यक्तित्व को प्राप्त कर लेता है।
श्री मांगरोदा ने नैमेत्यिक को लेकर कहा कि नैमेत्यिक कार्यक्रम मतलब यदा कदा होने वाले आयोजन इन कभी कभी होने वाले कार्यक्रम में समय- समय जाना है
श्री मांगरोदा ने कहा कि स्वयं सेवक सभी उत्सव मनाते हैं पर संघ ने छ: उत्सव जो सामुहिक होते हैं वहीं मनाता है।संघ में व्यक्तिगत कोई कार्यक्रम नहीं होते हैं। हिंदूत्व के निमार्ण का कार्य संघ कि शाखा कार्यक्रमो में होता है। हमारे यहां मोहन जी भागवत ने कोई फतवा आदेश जारी कर दिया और उसे मानना ऐसा नहीं होता है वहां भी टोली बैठकर हम सबके लिए विचार करती है। और जो चिंतन विचार निकालकर आता जो समाज का समाज के लिए होता है वह कार्य करते हैं।
श्री मांगरोदा ने संघ कि प्रार्थना को विस्तार से समझाईस देते हुए कहा कि प्रार्थना में भारत माता के लिए भगवान के प्रति समर्पण का भाव है। और किसी व्यक्ति को नहीं भगवा ध्वज को गुरु मानकर करता है।हमें किसी पर हमला नहीं करना पर हम पर हमला कर दे वो जीत नहीं सके इसके लिए काम करते हैं। संघ का स्वयं सेवक राजनेताओं कि तरह फोटो प्रचार प्रसार नहीं करता है उसे प्रचार प्रसार में नहीं समाज में व्याप्त बाधाओं से निपटने का भाव लेकर चलता है।
आपने कहा कि यहां स्वयं सेवक यह सोचकर करता है कि मैं अपने लिए नहीं समाज राष्ट्र के लिए कार्य कर रहा हूं
आपने संघ के विभिन्न विभागों आयामों को बताते हुए कहा कि संघ का प्रचार विभाग संघ कि बात समाज तक पहुंचाने का काम ,संपर्क विभाग समाज से निरंतर संपर्क बनाना तथा समाज कि गतिविधियों को करने के लिए काम करते हैं। धर्म जागरण जिसमें समाज ठिक रहें उनको जागृत करना,
आपने इसके लिए छः गतिविधियां संघ के अंदर कार्य करती है। मातृशक्ति का भी बहुत बड़ा योगदान है। मातृशक्ति के सहमति के बिना संघ का काम ही नहीं होता है। हजारों स्वयं सेवक प्रचारक मातृशक्ति कि अनुमति से ही हो रहा है। संघ कि तरह राष्ट्र सेविका समिति: 1936 में स्थापित, यह संगठन विशेष रूप से महिलाओं के लिए है, जो महिलाओं में राष्ट्रप्रेम और सेवा भाव जगाता है।
आपने आगे कहा कि जो धर्म संस्कृति के लिए भगवा धारण कर लेते हैं नाम नया हो जाता है। उनके लिए स्वयं के परिवार कि जगह संपूर्ण समाज परिवार हो जाता है ऐसे ही प्रचारक भी संतों कि तरह काम करते हैं वे घर छोड़कर केवल आधार कार्ड वो भी प्रशासनिक तौर पर जरुरी परिचय के लिए होता है। उनके पास न बैक खाता है न रुपए होते हैं वे समाज में समर्पित होकर अविवाहित होकर काम करते हैं। और एक घर रहकर स्वयं सेवक बनकर समाज राष्ट्र के प्रति सेवा करता है। इस प्रकार संघ कि यात्राएं चल कर आज विस्तार होकर आई है।
श्री मांगरोदा ने कहा कि संस्कृत भाषा को लेकर कहा कि सत्ता कानून बनाने पर अपराध बंद हुए क्या, नहीं पर जब समाज परिवर्तन कि सोच ले तो वह कर सकता है।समाज का कार्य है कि अपनी भाषा को बचाना है तो इसके लिए सोचना समाज को ही है।
आपने समर्पण पर एक उदाहरण देकर कहा कि एक 80 वर्ष के बुजुर्ग आम का पेड़ लगा रहा था तो किसी ने कहा कि बाबा आप इस उम्र में पेड़ लगा रहे हैं।तो कब फल देगा और कब खा पाओगे या नहीं।तो उन बाबा ने कहा कि आज मै आम खा रहा हूं वो भी किसी ने लगायें थे।
आपने सामाजिक समरसता को लेकर कहा कि स्वाधीनता के आठवें दशक के बाबजूद आज भी सामाजिकता अधुरी है। हम भगवान राम के शबरी के बैर खाने कि कथा सुन पढ़ रहे हैं पर मान रहे क्या यह सोचना पड़ेगा। हमारी श्रद्धा कहा होना चाहिए और कहा है।यह सोचना होगा कि कौन अपना है कौन पराया। हिंदू समाज को बांटने का बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहे हैं। जातीयों में बांटने का काम हो रहा है यह विकृति निकालने के लिए समाज को सोचना होगा।
आपने पर्यावरण को लेकर कहा कि हम धरती को मां मानते हैं पर नदि को प्रदुषित करना धरती को नदि को मां नहीं मानना और प्रदुषित करना यह अपराध है और धरती को नदि को मां मानना और प्रदुषित करना यह पाप है।
अगले आयाम स्वदेशी जो हमारे अपने देश क्षेत्र गांव शहर में बन रही है उसको खरीदना।
तिसरा स्व का बोध – अपने रिति रिवाज खान पान बदल गया। इसको कैसे वापस ला सकते हैं।
चौथा आयाम नागरिक कर्तव्य – सारे आंदोलन पाने के लिए होते हैं कुछ देने के निमित्त कर सकते हैं। देश के नागरिक होने के लिए हमें देश पर निर्भर रहना नहीं देश के समाज के लिए कार्य करना एक अच्छे नागरिक का परिचय देना है।हमसे ज्यादा टैक्स अमेरिका के नागरिक हैं।35करोड में 25करोड टेक्स देते हैं।
पांचवें आयाम कुटुंब प्रबोधन  को लेकर कहा कि विवाह में प्रिवेडिग होने लगें विवाह विवाह नहीं रहा इवेंट हो गया। हमारे रिति रिवाज बदल गये परिवार साथ होकर साथ नहीं है। हमको इस सबके लिए सोचना पड़ेगा इन पांच बातों पर समाज को चिंतन मनन कर बदलाव लाना होगा तभी श्रेष्ठ भारत कर सकते हैं। इस अवसर पर विभिन्न समाजों संगठनों के दायित्ववान एवं वरिष्ठ जनों के साथ संघ के अनुसांगिक संगठन के दायित्ववान स्वयं सेवक उपस्थित रहें।

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