आलेख/ विचारउज्जैनमध्यप्रदेश

शास्त्र, परंपरा और तमाशा: रावण दहन के पाखंड पर एक वैचारिक प्रहार!

शास्त्र, परंपरा और तमाशा: रावण दहन के पाखंड पर एक वैचारिक प्रहार!

उज्जैन के सुप्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर से जुड़े महेश पुजारी (महाकाल सेना के संरक्षक) ने समाज के सामने एक ऐसा ज्वलंत प्रश्न खड़ा किया है, जिसने हमारी सदियों पुरानी रूढ़ियों की बुनियाद हिला दी है। महेश पुजारी ने समाज और उत्सव समितियों को कानूनी नोटिस भेजकर सीधे तौर पर चुनौती दी है कि वे किसी भी हिंदू धर्मग्रंथ से ‘रावण दहन’ (पुतला जलाने) का धार्मिक प्रमाण प्रस्तुत करें।

यह प्रश्न केवल एक रस्म पर आपत्ति नहीं है, बल्कि सनातन धर्म के नाम पर फैलाई जा रही अज्ञानता और शास्त्र-विरोधी आचरण पर एक तीखा प्रहार है। यदि हम इतिहास और शास्त्रों को खंगालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जिसे हम आज धर्म समझ रहे हैं, वह वास्तव में सिर्फ एक लोक-तमाशा बनकर रह गया है।

सनातन धर्म के आधार स्तंभ माने जाने वाले ग्रंथ—महर्षि वाल्मीकि रचित ‘वाल्मीकि रामायण’ और गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘श्रीरामचरितमानस’—में कहीं भी रावण का पुतला बनाकर उसे अग्नि के हवाले करने का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इन महान ग्रंथों में केवल ‘रावण वध’ का वर्णन है, यानी अधर्म के प्रतीक लंकापति रावण का युद्धक्षेत्र में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम द्वारा अंत किया जाना।

शास्त्र केवल सत्य की असत्य पर विजय गाथा गाते हैं, वे किसी मृत व्यक्ति के बार-बार पुतले बनाकर उसे हर साल जलाने की किसी विकृत विधा का समर्थन नहीं करते। जब स्वयं मूल शास्त्रों में ही इस कृत्य की कोई आज्ञा नहीं है, तो इसे हिंदू धर्म का अनिवार्य अंग मानना केवल हमारी वैचारिक संकीर्णता को दर्शाता है।

मर्यादा की बात करने वाले समाज को यह याद रखना चाहिए कि स्वयं भगवान श्री राम ने रावण की मृत्यु के बाद उसके प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया था। रामायण के अनुसार, रावण युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ!

श्री राम का स्पष्ट मत था कि “मरणान्तानि वैराणि” अर्थात् मृत्यु के साथ ही सारे वैर समाप्त हो जाते हैं। आज का समाज किस अधिकार से हर साल उसका पुतला बनाकर उसका सार्वजनिक अपमान करता है? यह कृत्य मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों के पूर्णतः विपरीत और अशास्त्रीय है।

गंभीरता से विचार करें तो आधुनिक दौर में रावण दहन का यह आयोजन धर्म से पूरी तरह कटकर शुद्ध रूप से ‘मनोरंजन, राजनीति और व्यापार’ का जरिया बन चुका है। भव्य मेले, लाखों रुपये के पटाखे, वीआईपी अतिथियों के राजनीतिक भाषण और भीड़ का हुड़दंग:-

“क्या यही सनातन धर्म की संस्कृति है?”

बार-बार कागज़ और बारूद के पुतले जलाना केवल पर्यावरण को प्रदूषित करता है और सामाजिक धन का अपव्यय करता है। धर्म के नाम पर होने वाला यह शोर-शराबा और भव्य तमाशा जनमानस को आध्यात्मिक चेतना देने के बजाय केवल खोखले आडंबर की ओर धकेल रहा है, जिसे अब बंद किया जाना बेहद ज़रूरी है।

इतिहास साक्षी है कि रावण दहन की यह प्रथा प्राचीन काल से नहीं चली आ रही है, बल्कि यह बहुत बाद के कालखंड में शुरू हुई एक ‘प्रतीकात्मक लोक परंपरा’ मात्र है। भारत के कई हिस्सों जैसे राजस्थान के कुछ गांवों में आज भी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि वहां सदियों पुरानी मूर्तियों के समक्ष केवल प्रतीकात्मक ‘रावण वध’ की लीला की जाती है।

मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में भी विद्वान और ब्राह्मण समाज इस अशास्त्रीय प्रथा का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। जब देश का एक बड़ा प्रबुद्ध वर्ग और स्वयं शास्त्रों के ज्ञाता पुजारी इसे गलत मान रहे हैं, तो समाज को अपनी हठधर्मिता छोड़कर इस पर आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए।

रावण, अपने तमाम अवगुणों और अहंकार के बावजूद, एक परम शिव भक्त, प्रकांड वेदों का ज्ञाता, अद्वितीय ज्योतिषी और महापंडित था। उसका अंत उसके अहंकार और अनैतिक कृत्य के कारण हुआ, जिसका न्याय स्वयं भगवान राम ने त्रेतायुग में ही कर दिया था।

किसी भी व्यक्ति को बार-बार, युगों-युगों तक इस तरह सार्वजनिक रूप से जलाना सनातन संस्कृति की ‘उदारता और क्षमा’ के सिद्धांतों के खिलाफ है। हिंदू धर्म पुनर्जन्म और कर्मों के फल में विश्वास रखता है, किसी मरे हुए शत्रु को अनंत काल तक प्रताड़ित करने की आसुरी वृत्ति में नहीं।

यदि हम वास्तव में समाज से बुराई का अंत करना चाहते हैं, तो हमें बाहर के पुतलों को फूंकने के बजाय अपने भीतर झांकना होगा। आज समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनाचार, महिलाओं के प्रति अपराध और वैचारिक प्रदूषण के रूप में लाखों रावण खुलेआम घूम रहे हैं। कागज़ के पुतले जलाकर आत्ममुग्ध होने वाला समाज असल जिंदगी के पापों पर मौन रहता है।

महेश पुजारी जी का यह कदम हमें जगाने के लिए एक शंखनाद है। अब समय आ गया है कि हम इस अशास्त्रीय, प्रदूषणकारी और राजनीतिक तमाशे को तिलांजलि दें और उत्सवों को शास्त्रों की मर्यादा के भीतर रहकर केवल ज्ञान, भक्ति और आंतरिक शुद्धि के रूप में मनाएं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
WhatsApp Icon
Whatsapp
ज्वॉइन करें
site-below-footer-wrap[data-section="section-below-footer-builder"] { margin-bottom: 40px;}