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महान प्रजातंत्र-लोकतंत्र का सच्चा स्वरूप संविधान यदि कहीं देखना, जानना हो तो वह है रामराज्य बंशीलाल टांक

राम नवमी विशेष-
महान प्रजातंत्र-लोकतंत्र का सच्चा स्वरूप संविधान यदि कहीं देखना, जानना हो तो वह है रामराज्य
बंशीलाल टांक
त्रेतायुग जिसमें मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम अवतीर्ण हुए थे 9 लाख से अधिक वर्ष व्यतीत हो चुके है। राम के जीवन का बचपन से लेकर साकेत गमन तक जीवन के अंतिम क्षणों का मनन करे तो राम को जहां एक ओर शास्त्रों में अवतारी पुरूष माना गया है भारत ही नहीं विदेशों में यहां तक कि इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देशों में भी राम के मंदिर होकर रामनवमी आदि पर्वों पर उत्सव-महोत्सव पूजा अर्चना भारत की ही तरह मनाये जाते है। राम यद्यपि ईश्वर के अवतार थे परन्तु जब उन्होंने एक मानव के रूप में संसार में आये तो उन्होंने अपने को एक साधारण मनुष्य के रूप में ही अपना परिचय कराया।
वर्तमान में जहां लोकतंत्र-प्रजातंत्र की चर्चा तो राजनैतिक गलियारों में खूब बढ़ चढ़कर की जाती है परन्तु वास्तव में सच्चा लोकतंत्र क्या है इसका सच्चा स्वरूप गो स्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस के अंतिम सोपान उत्तरकांड के दोहा क्रमांक 42 के बाद 6 चौपाई से दर्शाया गया है।
लंका विजय के पश्चात् राम जब अयोध्या के राजा हुए तो सर्वपथम समस्त प्रजा को आमंत्रित कर अपने राज्य के संविधान का प्रथम सूत्र इन तीन चोपाईयों
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।।
सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।।
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।।
रामायण से दर्शाया है।
राज्य संचालन राज्य की व्यवस्था राजा का प्रजा से संबंध प्रजा के प्रति राजा का कर्तव्य का सच्चा स्वरूप देखना हो तो रामचरित मानस के उत्तर कांड के दोहा क्र. 19 (ग) के बाद चौपाई राम राज बैठे त्रैलोका हरर्षि भये सब सोका से लेकर दोहा क्र. 23 का अध्ययन सभी राजनायिकों को अवश्य करना चाहिए। तभी सच्चे लोकतंत्र का स्वरूप समझ में आयेगा। एक वाक्य मंे कहा जाये तो राम राज्य तोड़ने का नहीं जोड़ने का काम करता है।
राम राज्य का सबसे बड़ा गुण विनम्रता राम ने अपनी प्रिया सीता का अपहरण करने के बाद भी उस पर क्रोध करने के बदले पहले उसे प्रेम से समझाने का भरसक प्रयास किया। लंका में रहने से सीता की अग्नि परीक्षा होने के बावजूद अयोध्या आने पर एक रजक के आरोप लगाने पर धोबी पर क्रोध कर दण्ड देने के बदले सीता का त्याग कर दिया। यदि विनम्रता वर्तमान सियासत करने वालों में आ जाये तो लोकतंत्र का पवित्र मंदिर दंगल अखाड़ा बनने से बच जायेगा।
रामचरित मानस के तीन शब्दों के बीच का शब्द है चरित। चरित अर्थात चरित्र- हमारा दूसरे के लिये अनुकरणीय हमारा चित्र नहीं हमारा चरित्र होगा। परन्तु हो रहा है इसका उल्टा चरित्र हमारा चाहे जो कुछ हो परन्तु मोबाइल के कैमरे में हमारा चित्र दिन में 10 बार दिखना चाहिए।
यदि जीवन में मर्यादा चरित्र अनुशासन तीन में से एक भी उतर जाये तो रामनवमी-रामराज्य की कल्पना-महोत्सव मनाना सार्थक हो जायेगा।
रामनवमी को सबको पतंजलि परिवार की ओर से बहुत बहुत हार्दिक मंगल शुभकामनाएं।
वर्तमान में जहां लोकतंत्र-प्रजातंत्र की चर्चा तो राजनैतिक गलियारों में खूब बढ़ चढ़कर की जाती है परन्तु वास्तव में सच्चा लोकतंत्र क्या है इसका सच्चा स्वरूप गो स्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस के अंतिम सोपान उत्तरकांड के दोहा क्रमांक 42 के बाद 6 चौपाई से दर्शाया गया है।
लंका विजय के पश्चात् राम जब अयोध्या के राजा हुए तो सर्वपथम समस्त प्रजा को आमंत्रित कर अपने राज्य के संविधान का प्रथम सूत्र इन तीन चोपाईयों
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।।
सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।।
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।।
रामायण से दर्शाया है।
राज्य संचालन राज्य की व्यवस्था राजा का प्रजा से संबंध प्रजा के प्रति राजा का कर्तव्य का सच्चा स्वरूप देखना हो तो रामचरित मानस के उत्तर कांड के दोहा क्र. 19 (ग) के बाद चौपाई राम राज बैठे त्रैलोका हरर्षि भये सब सोका से लेकर दोहा क्र. 23 का अध्ययन सभी राजनायिकों को अवश्य करना चाहिए। तभी सच्चे लोकतंत्र का स्वरूप समझ में आयेगा। एक वाक्य मंे कहा जाये तो राम राज्य तोड़ने का नहीं जोड़ने का काम करता है।
राम राज्य का सबसे बड़ा गुण विनम्रता राम ने अपनी प्रिया सीता का अपहरण करने के बाद भी उस पर क्रोध करने के बदले पहले उसे प्रेम से समझाने का भरसक प्रयास किया। लंका में रहने से सीता की अग्नि परीक्षा होने के बावजूद अयोध्या आने पर एक रजक के आरोप लगाने पर धोबी पर क्रोध कर दण्ड देने के बदले सीता का त्याग कर दिया। यदि विनम्रता वर्तमान सियासत करने वालों में आ जाये तो लोकतंत्र का पवित्र मंदिर दंगल अखाड़ा बनने से बच जायेगा।
रामचरित मानस के तीन शब्दों के बीच का शब्द है चरित। चरित अर्थात चरित्र- हमारा दूसरे के लिये अनुकरणीय हमारा चित्र नहीं हमारा चरित्र होगा। परन्तु हो रहा है इसका उल्टा चरित्र हमारा चाहे जो कुछ हो परन्तु मोबाइल के कैमरे में हमारा चित्र दिन में 10 बार दिखना चाहिए।
यदि जीवन में मर्यादा चरित्र अनुशासन तीन में से एक भी उतर जाये तो रामनवमी-रामराज्य की कल्पना-महोत्सव मनाना सार्थक हो जायेगा।
रामनवमी को सबको पतंजलि परिवार की ओर से बहुत बहुत हार्दिक मंगल शुभकामनाएं।