मंदसौरमध्यप्रदेश

पुलिस और कानून का भय समाप्त.,आँख मूंदे बैठे जनप्रतिनिधि!

मोहन राज के मंदसौर में बेलगाम अपराधी…?

 

बलवंत भट्ट

मन्दसौर। कभी शांति का टापू रहा मन्दसौर जिला संगठित अपराधों का गढ़ बनता जा रहा है? ऐसा लग रहा है जैसे अपराधियों को खुला संरक्षण मिला हुवा है! दिन प्रतिदिन अपराधिक घटनाएं बढ़ती जा रही है और पुलिस केवल एनडीपीएस में इंट्रेस्ट लेने में लगी हुई है। जवाबदार असल पुलिसिंग छोड़ कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर थानों को चला रहे है!

कहने को तो मन्दसौर मध्यप्रदेश सरकार के उप मुख्यमंत्री श्री जगदीश देवड़ा का गृह जिला है, जिले की केवल एक विधानसभा को छोड़ दिया जाए, तो बाकी सभी जगह सत्ताधारियों का ही राज है, लेकिन ऐसा लगता है कि वोट लेकर भारतीय जनता पार्टी ने आम जनता को उनके हाल पर ही छोड़ दिया है।

ताजा उदाहरण गरोठ थाना क्षेत्र में हुई घटना का है। यह हादसा पुलिस की लापरवाही और अकर्मण्यता को स्पष्ट करने वाला है। एक ओर जिले भर में रोज चोरिया हो रही है, यहां तक कि चोरों ने पुलिस थानों में बने मंदिरों को भी नही छोड़ा है। कृषि मंडी सहित संभ्रात इलाको से लेकर ग्रामीण अंचल ओर खेत-कुवो को लगातार चोर अपना निशाना बना रहे है। जिले के सभी थाना क्षेत्रों में हो रही वाहन चोरियां किसी से छुपी नही है। मन्दसौर शहर से लेकर ग्रामीण अंचल तक कई बड़ी चोरियां ऐसी हैं, जिनके खुलासे अब तक नही हो पाए है।

कई मामलों में तो अपराध कायम किया जा रहे है, तो कई मामलों में बिना कागजो को रंगे ही आवेदन लेकर जांच की बात कही जाती है।

लगातार जिले में बढ़ रही आपराधिक घटनाएं पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है! हाल ही में कंजरों का मूवमेंट भी लगातार बढ़ता जा रहा है, चोरी करने आये कंजर कई जगह तो अपने मकसद में कामयाब हो गए है और कुछ जगह ग्रामीणों और कंजरों का आमना-सामना भी हुआ है एवं हवाई फायर भी हुवे है। कंजरों के हौसले इतने बुलन्द हो चुके है कि वे जेसीबी लेकर स्टापडेम तोड़ने तक चले जाते है, ऐसा लगता है जैसे गश्त केवल डोडाचूरा की निगहबानी तक सिमट गई है!

बीती रात गरोठ थाना क्षेत्र में पवन चक्की के कर्मचारी की चोरों द्वारा सिर कुचलकर की गई हत्या खाकी को आँख दिखाते हुए कारित की गई है। इस घटनाक्रम में पुलिस की लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना रवैया सबके सामने है। पुलिस की लापरवाही तो अपनी जगह लेकिन जिले के जनप्रतिनिधियों का धृतराष्ट्रीय रवैया भी समझ से परे है। न जाने किस समझौते में जनप्रतिनिधि अपनी जुबान पर ताले लगाए बैठे है।

अधिकारी और जनप्रतिनिधियों को सोचना चाहिए कि जनता के सब्र की इतनी परीक्षा न ली जाए, कि मौन जनता मुखर होने पर मजबूर हो जाए।

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