03 दिसंबर तक दौड़ते रहेंगे आंकड़ो के दम पर जीत हार के कागज़ी घोड़े, अब होइए सोई,जो राम रची राखा

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कांग्रेस-भाजपा दोनो कर रहे सत्ता में आने का दांवा, 8 दिन बाद सही फैसला
76 प्रतिशत मतदान को भाजपा बता रही आरएसएस की मेहनत, कांग्रेस को पहली बार हुए बूथ मैनेजमेंट पर भरोसा
✍🏻विकास तिवारी
होइये वही, जो राम रची राखा। यानी होगा वही, जो भगवान रामजी ने पहले से रच रखा हैं। रामायण की ये चौपाई इन दिनों प्रदेश में चरितार्थ हो रही हैं। कारण है परिणाम, जो इस बार लम्बे खिंचा गए हैं। वोट डालने ओर परिणाम पाने में प्रदेशवासियों के बीच 16 दिन का लम्बा फासला खींच दिया गया। इस बीच दोनो प्रमुख दल ही नही, आमजन भी असमंजस में हैं कि सत्ता में कौन आ रहा है?
क्या कांग्रेस “विश्वासघात” का बदला ले पाएगी या भाजपा की सत्ता अक्षुण्ण रहेगी? 66 साल के प्रदेश के इतिहास में इस बार सबसे ज्यादा हुआ मतदान इन दोनों दलों को भी डरा रहा हैं। कोई भी डंके की चोट आश्वस्त नही। भाजपा मोदी, सनातन औऱ लाडली बहना योजना के बल पर सत्ता में लौटने का दांवा कर रही है। कांग्रेस नेता फिर वही दोहरा रहे है, जो 6 महीने से बोल रहे थे कि हमारा चुनाव जनता ने लड़ा है। यानी एक तरफ मोदी ही जीत का आधार तो दूजी तरफ जनता ही सहारा बनी हई है। अब ये फैसला 8 दिन बाद हो जाएगा कि प्रदेश के नाथ “कमल” होंगे या फिर “कमल” का ही राज कायम रहेगा।
उंगलियों पर स्याही लगे 8 दिन हो गए और अभी 8 दिन औऱ शेष है ये जानने को की उंगलियों पर लगी स्याही ने किस राजनीतिक दल का भविष्य आने वाले 5 साल के लिए स्याह किया हैं और किसका उजला? लेकिन दांवे दोनो तरफ़ से उजाले का ही हो रहा है कि 3 दिसम्बर के बाद वे ही चमकेंगे। कोई स्वयम को “स्याह पक्ष” का नही मान रहा। दोनो प्रमुख दल स्वयम को “शुक्ल पक्ष” का अधिकारी मानकर सत्ता का स्वयमेव दावेदार बता रहे हैं। दावों का दम 3 दिसम्बर को सामने आ जायेगा। दिसम्बर तय करेगा कि मध्यप्रदेश की सत्ता से कौन रफ़ूचक्कर होता हैं।
आठ दिन बाद पतां चलेगा कि “आठ के ठाठ” किसके बने रहते हैं। सत्ता का सुख आखरी समय तक हाँफती दौड़ती रही कांग्रेस उठा ले जाएगी या साढ़े 3 साल से सत्ता के लिए सतत “साधनारत” भाजपा बाज़ी मार ले जाएगी। इसका इंतजार न केवल सत्ता को लालायित कांग्रेस-भाजपा में हो रहा है बल्कि प्रदेश की जनता भी बेसब्री से इंतजार कर रही है।
तब तक दोनो दल आंकड़ो के कागजी घोड़ो पर सवार होकर स्वयम को सत्ता सुंदरी के वरण का पात्र बताते थक नही रहे। सत्ता सुंदरी भी कम नही। वो अपनी बेतहाशा हुए मतदान की भावभंगिमाओं से दोनो को रिझा रही हैं। एक को लगता है कि ये मतदान सत्ता विरोधी लहर का परिणाम है जो प्रदेश में साल, सवा साल से बह रही थी। जो सतह पर भले ही नजर नही आई लेकिन पॉलिन बूथ पर कतारों में नजर आई हैं। ये दांवा भी कांग्रेस का है कि मतदाताओं में शिवराज सरकार ही नही, स्वयम शिवराज के खिलाफ भी नाराज़गी, गुस्सा था जो वोट में तब्दील हो गया।
18 साल से प्रदेश की सत्ता की एकछत्र साधना में रत भाजपा, कांग्रेस के इस “गणित ज्ञान” को फीलगुड करार दे रही हैं। उसका कहना है “कुर्ता फाड़” कांग्रेस 3 दिसम्बर के बाद एक दूसरे के वाकई कपड़े फाड़ेंगी। भाजपा का ये दांवा भी है कि आखरी समय मे कमलनाथ को उनके ही दल और दल के नेताओ ने अकेला छोड़ दिया था। मतदान वाला दिन आते आते नाथ, अपने ही दल में अनाथ हो गए थे। इस बात की गवाह दिसम्बर की 3 तारीख़ कर देगी।
मोदी नाम ही जग अधारा
जैसे जन सामान्य के लिए राम नाम ही जग का आधार होता हैं, वैसे ही इस चुनाव में भाजपा के लिए मोदी रहे। मोदी नाम ही उनकी चुनावी वैतरणी को पार करने का आधार रहा। मोदी का नाम और काम ही इस चुनाव में गूंजा। प्रदेश में, प्रदेश के मामा से ज्यादा गुणानुवाद तो मोदी का रहा। और वो भी पूरी प्लानिंग के साथ। *प्रदेश की जनता ही नही, स्वयम मामा ने भी देखा कि वो कैसे प्रचार सामग्री में छोटे, छोटे होते गए। प्रचार सामग्री में एक समय बाद वे प्रदेश की तमाम नेताओ के “फोटो वाली भीड़” का हिस्सा हो गए। उनसे बड़े फोटो तो पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और पार्टी राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के नजर आ रहे थे। यानी मोदी नाम ही तारणहार मानकर प्रदेश में भाजपा ने मिशन 2023 की लड़ाई को मुक्कमल किया। लिहाजा समूची पार्टी को पूर्ण भरोसा है कि मोदी के नाम और काम से हम चुनावी चुनोती से पार पा जाएंगे और विजयश्री को वरण करेंगे।
प्रदेश की जनता ही हमारा सहारा
एक तरफ मोदी नाम ही सत्ता का आधार रहा तो दूजी तरफ यानी कांग्रेस के पास प्रदेश की जनता ही सहारा हैं। यानी हारे का सहारा की तर्ज पर पार्टी के रणनीतिकारों का साफ कहना है कि हमारा चुनाव जनता लड़ रही थी जो शिवराज के “कु-राज” से त्रस्त हो चुकी थी। इस जनता में बड़ी संख्या में युवा, शिक्षित बेरोजगार, कर्मचारी औऱ व्यापारी शामिल हैं। ये वर्ग भाजपा की नीतियों और शिवराज सरकार की रीतियों से बुरी तरह से त्रस्त हो चुके थे। पार्टी को इस बार अपने बूथ प्रबंधन पर भी खूब भरोसा हैं।
उसका कहना है कि पहली बार आरएसएस पैटर्न पर बूथ संभाले गए है जिसके परिणाम सुखद रहे हैं। अब ये तो मशीनों के आंकड़े उगलने पर पता चलेगा कि क्या वाकई कांग्रेस का बूथ मैनेजमेंट आरएसएस की तर्ज पर था। तब तक कांग्रेस के दावे दम दिखा रहे है क्योंकि वाकई पहली बार कांग्रेस बूथ के मामले में सालभर से न केवल सक्रिय थी बल्कि ठोस काम भी कर रही थी।