नीलगाय रोजड़ों से किसान परेशान,झुंड के झुंड खेतों से निकलते, जहां पैर लगे वहां फसल नष्ट हो जाती, किसानों ने कहा नहीं कर रही उपाय

*********************************
सरकार का 2017 में बोमा पद्धति से पकड़ने का प्रयास असफल हुआ,इसके बाद कोई योजना नहीं बनी
कुचड़ौद । (दिनेश हाबरिया) अंचल क्षेत्र के किसान पिछले 3 सालों से कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि की प्राकृतिक मार झेल रहा है। साथ ही एक अलग ही मार जो हमेशा किसानों के सर पड़ रही है। वह रोजड़ों की है। यह रोजडे हर वक्त किसानों की फसल को पैरों तले रौंदकर फसलों को चौपट करते जा रहे। हालात ऐसे हैं कि अंचल की सीमा में 150 से 200 के करीब रोजडें विचरण कर रहे। यह दिन रात किसानों के खेतों में खड़ी फसलों को खा रहे या पैरों तले रौंद रहे। यह रोजडें दर्जनों की संख्या में झुंड के झुंड खेतों से दौड़ लगाकर निकलते। किसान भगाने का प्रयास भी करते, तो भी नहीं भागते। कई बार तो किसान इधर से भगाए और उधर फिर से आ जाए। यह हालत दिन में कई बार होते है। इनके पैरों से फसल पूरी तरह से नष्ट हो जाती। कहा जाए तो वर्तमान में सबसे बड़े किसानों की फसलों के दुश्मन कोई हे, तो यह रोजड़े। सरकार भी इन पर अब तक कोई भी योजना नहीं बना सकी।
सरकार ने 2017 में बोमा पद्धति से पकड़ने का जरूर प्रयास किया था। पर उस समय मात्र 15 से 20 की संख्या में ही पकड़ पाए थे। लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी इन पर नियंत्रण नहीं हो पाया। जिसके बाद अब तक सरकार ने इन रोजड़ों के निदान के लिए कोई योजना नहीं बनाई। दिनों दिन इनकी तादाद बढ़ रही है। जानकारी अनुसार एक मादा रोजड़ा साल में दो बार बच्चे देती है। इस तरह एक के पांच हर साल बढ़ रहे। इस तरह पिछले 3 सालों में इनकी तादाद में कईं गुना वृद्धि हो गई। 2018 में तात्कालिक कांग्रेस सरकार ने वचन पत्र में हर खेत में किसानों को तार फेंसिंग के लिए 50% अनुदान देने का वादा किया था। पर सरकार बदलने के बाद वह योजना भी अधर में लटक गई। अंचल क्षेत्र में हालात इतने खराब हो गए, की कई बार इनसे हादसे भी हो रहे। पिछले वर्ष सीतामऊ से गांव आ रहे व्यक्ति इकबाल मंसूरी की कार के सामने नकेड़िया – सरगसेदरा के बिच, शाम के समय सड़क पर अचानक रोजड़े के आने से हादसे का शिकार हो गए थे। हालांकि व्यक्ति को मामूली चोट आई थी। पर वाहन में करीब 30 हजार का नुकसान हो गया था। किसान वर्ग सरकार से काफी नाराज है। किसानों का कहना है कि सरकार जानबूझकर के इन रोजड़ों को नीलगाय नाम देकर बचा रही है। कुचड़ोद के किसान बाबूलाल परमार, लक्ष्मीनारायण कुंडेल, महेश गुजरिया आदि ने बताया गांव की सीमा में सैकड़ों की तादाद में रोजडे विचरण कर रहे। इन्हें भगाने का प्रयास भी करते तो भागने का नाम नहीं लेते। इधर से भगाओ और उधर से फिर खेतों में आ जाते। दिन में दो दो बार खेतों से होकर निकल जाते। यह खाते उससे ज्यादा नुकसान दौड़ लगाने से करते हैं। यह जहां से निकलते हैं, इनके पांव के नीचे फसल पूरी तरह से चौपट हो जाती। वर्तमान में सबसे ज्यादा किसानों की परेशानी रोजड़ों को लेकर है।
सरकार इन्हें बेवजह नीलगाय का नाम देकर बचाने का प्रयास कर रही। हकीकत में यह घोड़ारोज-रोजड़े हैं। सरकार को तुरंत ही इनके खात्मे की या पकड़ने की योजना बनाना चाहिए। या तो पकड़ कर अन्यत्र ले जाए या इन्हें मारने का आदेश जारी करें। ताकि हम किसान अपनी फसलों को इनके आतंक से सुरक्षित रख सके। पकी पकाई फसल को नष्ट कर देते। यह रोजडे़ दर्जनों की तादाद में झुंड के झुंड खेतों से निकलते हैं। तो पगडंडी बना देते हैं। किसानों ने इनके आतंक के कारण मक्का की फसल एवं अरहर तुवर एवं कपास की फसल लगाना ही बंद कर दिया। क्योंकि यह इन तीनों पर ज्यादा अटैक करते हैं। अब यह फसल नहीं होने के कारण अन्य फसल भी या तो खाकर या पैरों तले रौंदकर पूरी तरह से चौपट कर रहे। सरकार को तुरंत ही इनके पकड़ने या मारने की कार्य योजना बनाना चाहिए। ताकि हम किसान सुरक्षित फसल ले सके।